भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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पृष्ठ 91

१० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. २ अब अनुपाय१ की व्याख्या करेंगे । जब कोई पुरुष जिसमें तीव्र शक्तिपात हुआ हो केवल एक ही बार गुरु के वचन से सत्य स्वरूप को हृदयंगम करते हुए इस प्रकार विचार करने लगता है, उस समय बिना किसी उपाय से ही उसे नित्योदित समावेश प्राप्त हो जाता है। इस विषय में शंका उठती है कि तर्क ही यहाँ योग का अङ्ग है—तब ग्रन्थकार कहते हैं—जो स्वप्रकाश परमेश्वर निज आत्मस्वरूप है उस विषय में उपाय क्या कर सकता है—उस से ( उपाय से ) स्वरूप का लाभ नहीं होता क्योंकि ( स्वरूप ) नित्य है, स्वरूप का ज्ञान भी उससे नहीं होता क्योंकि वह स्वयं प्रकाशमान हैं, न तो आवरण को दूर हटाना है क्योंकि किसी प्रकार आवरण की सत्ता की भी सम्भावना नहीं है, उसमें ( स्वरूप में ) अनुप्रवेश करने वाला उनसे भिन्न किसी की उपपत्ति नहीं हो सकती। इसलिए यह जो कुछ है वह एक मात्र चिद्रूप तत्त्व है जो काल के कलन के अतीत, देश के द्वारा अपरिच्छिन्न तथा उपाधि से अमलिन, कोई नियत आकार के द्वारा अनियन्त्रित, शब्द के द्वारा कहे जाने के अयोग्य हैं, वे प्रमाणों से १. परमार्थ स्वरूप की प्राप्ति का साधन ही उपाय शब्द का अर्थ है। उपाय ही उपेय प्राप्ति का सहायक है। इन उपायों में कुछ अनायास उपेय वस्तु को उपलब्ध कराता है और कुछ उतनी सरलता से नहीं, इसका कारण शक्ति- पात की तीव्रता का तर तम भाव है। भगवत् कृपाशक्ति का संचार जिन आधारों में तीव्र-तीव्र रूप में होता है उनमें विकल्प कलंक का लेश भी नहीं रहता, इसलिए उन्हें भावना आदि की आवश्यकता नहीं रहती। जो परम तत्त्व है वही अपना स्वरूप है-गुरु के उपदेश से एक बार यह सुनने से योगी में स्वरूप सम्बन्धी परम निष्ठा उत्पन्न हो जाती है और इसके फलस्वरूप पूर्णानन्द-चमत्कारघन आनन्दशक्ति में योगी विश्रान्त हो जाते हैं। उन्हें किसी प्रकार मन्त्र, ध्यान, जप, प्राणायाम आदि की आवश्यकता नहीं होती। वे अपने स्वरूप में ही समग्र विश्व को दर्शन करते हैं। बिना किसी क्रम के उन्हें तत्त्व-साक्षात्कार हो जाता है। इस प्रकार अनुपाय समावेश प्राप्त भाग्यशाली योगी के निकट समग्र भावमण्डल ऐसा लगता है कि यह सब मुझसे ही उदित और मुझमें विलीन हो रहा है और यह मेरा ही स्वरूप है।