तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआ. २ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ११ प्रमाणित नहीं किये जा सकते । ( अथच ) काल से प्रमाण तक विषयों के अवभासक तथा उनकी इच्छा से वे भी ( काल आदि ) उनके स्वरूप लाभ का हेतु हैं। वह स्वतन्त्र आनन्दघन तत्त्व हैं—मैं भी वही हूँ। उन्हीं में जो मेरे हृदय के अन्त स्थल में यह विश्व प्रतिबिम्बित हो रहा है। इस प्रकार दृढ़ विचार करने वाले का परमेश्वर सम्बन्धी समावेश बिना उपाय से ही होता है, ऐसे पुरुष को मन्त्र, पूजा, ध्यान, चर्चा आदि किसी प्रकार नियन्त्रण नहीं रहता । उपाय समूहों से शिव प्रकाशित नहीं होता, क्या सहस्र किरण सूरज जड़ घट से प्रकाशित होता ? उदार दृष्टि वाले इस प्रकार विचार करते हुए स्वयंप्रकाश शिवसमावेश क्षण भर में ही प्राप्त करते हैं ॥६॥ जो कुछ स्फुरण स्फुरित हो रहे हैं वही मेरे भीतर सकल अथच अमल परमेश्वर ही भासित हो रहे हैं। वही मेरी आत्मा हैं। परमार्थरूप से इस प्रकार जानकर मुझे और कुछ कार्य करना नहीं है। इति तन्त्रसार द्वितीय आह्निक