तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआ. ३ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १५ यह जो प्रकाश रूपी शिवतत्त्व की बात कही गयी है उस१ अखण्ड मण्डल स्वरूप में प्रवेश करने में समर्थ न होने पर स्वातन्त्र्य शक्ति२ को उससे अतिरिक्त समझकर (योगी) निर्विकल्पक भैरवसमावेश का अनुभव करते हैं। इस विषय का उपदेश इस प्रकार है : यह समग्र भाव समूह बोध रूपी आकाश में प्रतिबिम्ब मात्र है क्योंकि वह (भाव-समूह) प्रतिबिम्ब के लक्षण के द्वारा लक्षित है। प्रतिबिम्ब३ का यह लक्षण है— जो वस्तु भिन्न होकर भासित होने में समर्थ नहीं अपितु दूसरे के साथ मिश्रित होकर भासता है वही प्रतिबिम्ब है—जैसे मुख का रूप दर्पण में, जैसे रस दन्तोदक में, नासिका में गन्ध, आनन्देन्द्रिय में यौन स्पर्श, शूल बरछा का स्पर्श अन्तःस्थ स्पर्शनेन्द्रिय में, आकाश में प्रतिध्वनि की तरह १. पूर्ण स्वरूप अखण्ड है। पूर्ण होने के नाते उन्हें मण्डलाकृति रूप में चिन्तन करने का विधान है, जैसे 'अखण्ड मण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरं' इत्यादि गुरु प्रणाम में गुरु उस परमस्वरूप जो अखण्डमण्डलाकार हैं उसके प्रदर्शक के रूप में वर्णित किये गये हैं। अनुपाय समावेश प्राप्त योगी के सम्मुख पूर्ण स्वरूप अखण्डमण्डलाकार रूप में प्रतीत होता है। और वह अखण्डमण्डल भैरवाग्नि में विलीन हो जाता है। २. स्वातन्त्र्य शक्ति परमेश्वर की इच्छाशक्ति है। पूर्णस्वरूप प्रकाशरूपी है लेकिन वह प्रकाश विमर्श विहीन नहीं है अर्थात् प्रकाश प्रकाशन रूप क्रिया का कर्त्ता है, यही कर्तृत्व ही स्वातन्त्र्य है। वह क्या है ? वे अपने ही स्वरूप की भित्ति पर अपनी इच्छा से सब कुछ प्रकाशित करते हैं। यही प्रकाश सब कुछ अपने में अपने से अभिन्न रखकर प्रकाशित करते हैं। तुलनीय—'तस्य भासा सर्वमिदं विभाति।' ३. परप्रकाश निर्मल आकाश रूप है। वही चिदाकाश है या बोधरूपी आकाश है। उनकी स्वातन्त्र्य शक्ति के खेल से ही समग्र विश्व प्रकाशित हो उठता है। यह विश्व परस्पर एक दूसरे से भिन्न होकर प्रतिबिम्ब की तरह भासता है। प्रतिबिम्ब में एक रहस्य यह है कि आधार की निर्मलता के अनुसार भिन्न-भिन्न वस्तुओं के प्रतिबिम्ब भिन्न-भिन्न वस्तु पर पड़ते हैं। दर्पण, स्वच्छ जल और आंखें रूप के प्रतिबिम्ब, स्पर्श का प्रतिबिम्ब आनन्देन्द्रिय, इमली के रस का प्रतिबिम्ब दन्तोदक ग्रहण करते हैं, कोई एक वस्तु सब वस्तु के प्रतिबिम्ब धारण में अक्षम है, लेकिन बोधरूपी प्रकाश समग्र विश्व के प्रतिबिम्ब धारण करते हैं।