भारतकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

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पृष्ठ 97

१६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ३ यह रस मुख्य नहीं क्योंकि उसका परिणाम व्याधि प्रशमन आदि उससे नहीं होता। न तो गन्ध या स्पर्श को मुख्य ( बिम्ब ) कहा जा सकता, क्योंकि गुणी के असंनिधान से उनका भी अभाव आ जाता है। और परिणाम की शृङ्खलाओं का आरम्भ नहीं होता। यह भी नहीं कहा जा सकता है कि ये दोनों ( गन्ध और स्पर्श ) भी नहीं हैं क्योंकि शरीर का कम्पन और रेतःस्खलन आदि भी दिखाई पड़ती है इस प्रकार आने वाली जैसी प्रतिध्वनि सुनाई पड़ती है। अतः जैसे ये सब प्रति- बिम्बित होकर आभासित होते हैं उसी प्रकार परमेश्वररूप प्रकाश में विश्व प्रतिबिम्ब सदृश है। प्रश्न—अगर ऐसा ही है तो इस विषय में बिम्ब क्या है ? न हो कुछ, प्रश्न—क्या तब यह कारणविहीन हैं ? आः, क्या यह कारण सम्बन्धी प्रश्न है ? तो बिम्ब सम्बन्धी चतुर वार्तालाप की क्या जरुरत हैं, हेतु तो परमेश्वर शक्ति है जिसका दूसरा पर्याय स्वातन्त्र्यशक्ति ही होगा। वही विश्वरूप प्रतिबिम्ब की धारिका है और वही भगवान् की विश्वात्मकता निभाती है। संविन्मय विश्व ही चैतन्य की अभिव्यक्ति¹ का स्थान है। वही विश्व है। यह विश्व विपरीत क्रम में इस में स्थित है ( दर्पण में प्रतिबिम्ब के सदृश ), इसलिए भगवान प्रतिबिम्ब का आधार है। परमेश्वर के इस विश्वात्मक स्वरूप अनामृष्ट² नहीं हो सकती, क्योंकि चित्स्वभाव के स्वरूप का अनामर्शन अनुपपन्न है, स्वरूप के विमर्शन के अभाव से उसकी जड़ता आ जायगी। यह विमर्शन सांकेतिक नहीं है अपि तु अन्य किसी के व्यवधान बिना ही केवल चित् स्वभाव से विमर्शन करने वाला परनाद स्वरूप है—ऐसा कहा गया है। यह विमर्शन विश्व के व्यवस्थापिका परमेश्वर की जितनी शक्तियाँ हैं उन सब का विमर्शन इससे होता है। उन में उनकी तीन मुख्य शक्तियाँ हैं जो अनुत्तर, इच्छा और उन्मेष १. चित् शक्ति अखण्ड प्रकाश है। जिन्हें हम जड़ कहते हैं वह भी चित् के प्रकाश से प्रकाशित है लेकिन वह प्रकाशित होकर भी चेतन नहीं क्योंकि उसमें 'मैं चेतन हूँ' इस प्रकार स्वात्मविमर्शन नहीं हैं। यह समग्र विश्व परमेश्वर प्रकाश में स्थित होकर 'यह तो मैं ही हूँ' इस प्रकार स्वात्मविमर्श रूपी होकर चैतन्यमय होता है। २. विमर्श का अभाव अनामर्शन शब्द का अर्थ है। आमर्शन परावाक् रूपी है उसे परनाद भी कहा जाता है।