तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
१६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ३ यह रस मुख्य नहीं क्योंकि उसका परिणाम व्याधि प्रशमन आदि उससे नहीं होता। न तो गन्ध या स्पर्श को मुख्य ( बिम्ब ) कहा जा सकता, क्योंकि गुणी के असंनिधान से उनका भी अभाव आ जाता है। और परिणाम की शृङ्खलाओं का आरम्भ नहीं होता। यह भी नहीं कहा जा सकता है कि ये दोनों ( गन्ध और स्पर्श ) भी नहीं हैं क्योंकि शरीर का कम्पन और रेतःस्खलन आदि भी दिखाई पड़ती है इस प्रकार आने वाली जैसी प्रतिध्वनि सुनाई पड़ती है। अतः जैसे ये सब प्रति- बिम्बित होकर आभासित होते हैं उसी प्रकार परमेश्वररूप प्रकाश में विश्व प्रतिबिम्ब सदृश है। प्रश्न—अगर ऐसा ही है तो इस विषय में बिम्ब क्या है ? न हो कुछ, प्रश्न—क्या तब यह कारणविहीन हैं ? आः, क्या यह कारण सम्बन्धी प्रश्न है ? तो बिम्ब सम्बन्धी चतुर वार्तालाप की क्या जरुरत हैं, हेतु तो परमेश्वर शक्ति है जिसका दूसरा पर्याय स्वातन्त्र्यशक्ति ही होगा। वही विश्वरूप प्रतिबिम्ब की धारिका है और वही भगवान् की विश्वात्मकता निभाती है। संविन्मय विश्व ही चैतन्य की अभिव्यक्ति¹ का स्थान है। वही विश्व है। यह विश्व विपरीत क्रम में इस में स्थित है ( दर्पण में प्रतिबिम्ब के सदृश ), इसलिए भगवान प्रतिबिम्ब का आधार है। परमेश्वर के इस विश्वात्मक स्वरूप अनामृष्ट² नहीं हो सकती, क्योंकि चित्स्वभाव के स्वरूप का अनामर्शन अनुपपन्न है, स्वरूप के विमर्शन के अभाव से उसकी जड़ता आ जायगी। यह विमर्शन सांकेतिक नहीं है अपि तु अन्य किसी के व्यवधान बिना ही केवल चित् स्वभाव से विमर्शन करने वाला परनाद स्वरूप है—ऐसा कहा गया है। यह विमर्शन विश्व के व्यवस्थापिका परमेश्वर की जितनी शक्तियाँ हैं उन सब का विमर्शन इससे होता है। उन में उनकी तीन मुख्य शक्तियाँ हैं जो अनुत्तर, इच्छा और उन्मेष १. चित् शक्ति अखण्ड प्रकाश है। जिन्हें हम जड़ कहते हैं वह भी चित् के प्रकाश से प्रकाशित है लेकिन वह प्रकाशित होकर भी चेतन नहीं क्योंकि उसमें 'मैं चेतन हूँ' इस प्रकार स्वात्मविमर्शन नहीं हैं। यह समग्र विश्व परमेश्वर प्रकाश में स्थित होकर 'यह तो मैं ही हूँ' इस प्रकार स्वात्मविमर्श रूपी होकर चैतन्यमय होता है। २. विमर्श का अभाव अनामर्शन शब्द का अर्थ है। आमर्शन परावाक् रूपी है उसे परनाद भी कहा जाता है।
आ. ३ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १७ हैं, इनका परामर्श भी तीन हैं जो अ, इ और उ है। इन तीनों से शक्ति समूह का विस्तार हुआ है। अनुत्तर में ही विश्राम आनन्द है, इच्छा में विश्राम ईशान तथा उन्मेष में ही विश्राम ऊर्मि है जहाँ क्रियाशक्ति का प्रारम्भ है। यही तीन परामर्श आ, ई और ऊ हैं। इन पूर्ववर्ती तीन परामर्शों १ में प्रकाश अंश ही सारभूत है इसलिए यह सूर्यात्मक हैं, और अन्तिम परामर्शत्रय २ विश्रान्ति स्वभाव ३ है इसलिए यह आनन्द प्रधान है, अतः यह सोमात्मक हैं। इतने तक क्रियांश का अनुप्रवेश नहीं हुआ। जब इच्छा और ईशान में क्रिया का अनुप्रवेश होता है ४ तब ये इष्यमान और ईश्यमान कहलाते हैं। तब इनमें दो भेद उत्पन्न १. अनुत्तर, इच्छा और उन्मेष ये तीन अर्थात् वर्णमाला के प्रथम तीन वर्ण सूर्यात्मक है। २. आनन्द, ईशान तथा ऊर्मि, ये तीन आ, ई और ऊ हैं जो सोमात्मक हैं। ३. सूर्य प्रकाश स्वभाव है। जैसे 'अ' वर्ण प्रकाशरूपी सूर्य का रूप है, आ उसी प्रकार आनन्द स्वभाव है इसलिए आनन्द अनुत्तर अ का विश्राम, ईशान इच्छा का, ऊर्मि उन्मेष का विश्राम हैं। अनुत्तर जब दूसरे अनुत्तर को अपने सामने देखता है तब वही आ या आनन्दरूप प्राप्त करता है। अ वर्ण चिद्भाव का प्रतीक है। यही चिद्भाव जब अपने अभिमुख होता है दर्पण में मुख के प्रतिबिम्ब के सदृश, तब वह अनुकूल संवेदन के रूप में प्रकाशमान होता है, शास्त्रीय वर्ण 'आ' इसी आनन्द का प्रतीक है। ४. साहित्य में जिसे इच्छा रूप में वर्णित किया गया है वर्णमाला में वही तृतीय वर्ण 'इ' है जो खोये हुए आनन्द का ही अन्वेषण कर रहा है। इच्छा और ईशान तथा उन्मेष और ऊर्मि जो क्रमशः इच्छाशक्ति ( इ-ई ), ज्ञान- शक्ति ( उ-ऊ ) के प्रतीक हैं। इनमें स्फुट या अस्फुट किसी भी तरह क्रिया- शक्ति का प्रवेश नहीं हुआ है। जब इन दो स्थितियों में क्रिया का अनुप्रवेश होता है तब चार नपुंसक वर्ण का उदय होता हैं। ऋ, ॠ, ये दो वर्ण व्यंजन के र के अनुरूप है ऌ ॡ ये दो व्यंजन का ल के सदृश है। व्यंजन के र और ल के अनुरूप होते हुए भी ये नपुंसक वर्ण वास्तविकतया उनके सदृश स्फुट वर्णरूप नहीं है अपितु बिजली के चकित प्रकाश के समान ये वर्ण की छाया या आभास धारण करते हैं। अगर उनमें स्फुटरूपता होती तो वस्तु का निर्माण हो जाता। इन चार वर्ण दोनों की छाया धारण किये हुए हैं अर्थात् एक ओर ये स्वर वर्ण के अन्तर्गत हैं लेकिन व्यंजन के २
१८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ३ हो जाते हैं, जब प्रकाशमात्रता प्रधान है तब रश्रुति, विश्रान्ति आने में ल श्रुति होती है। र और ल ये दोनों के प्रकाश और स्तम्भ ( स्थैर्य ) स्वभाव है। इष्यमाण होने पर भी बाहर की वस्तु के समान स्फुट नहीं क्योंकि स्फुट होने पर वस्तु की उत्पत्ति हो जाती, उसी प्रकार इच्छा और ईशान भी ( स्फुट नहीं ) अतः अस्फुट होने के कारण र और ल श्रुतिमात्र हैं, ये व्यञ्जन वर्ण की तरह नहीं हैं। ये चार वर्ण उभयों ( पुरुष और स्त्री ) का आभास धारण करते हैं नपुंसक कहते हैं। ये चार ऋ-ॠ-ऌ-ॡ हैं। अनुत्तर और आनन्द जब इच्छा की ओर प्रसृत होते हैं तब ए, ओ ये दो वर्णों का, फिर इन दोनों में अनुत्तर आनन्द के संघट्ट होने पर ऐ और औ का उदय होता है। यही क्रियाशक्ति ए, ऐ, ओ, औ चार वर्णों का रूप है। इसके अनन्तर क्रियाशक्ति के अवसान होने पर समग्र कार्यभूत ( वर्ण ) पुनः अनुत्तर में प्रवेश करेंगे। तब सम्बेदनसार अर्थात् प्रकाश स्वभाव बिन्दु के रूप में वे स्थित हो जाते हैं—जिसे वर्ण माला के 'अं' कहते । इसके बाद उसी में ( बिन्दु में ) अनुत्तर का विसर्ग होता है—वही अः है।१ ये सोलह सब परामर्शों का बीजस्वरूप हैं ऐसा कहा जाता है। उससे उत्पन्न योनिरूप व्यञ्जन हैं। उनमें ( व्यंजनों में ) अनुत्तर से क वर्ग, अकर्मक इच्छा से च वर्ग, सकर्मक इच्छा से ट तथा त वर्ग, उन्मेष से प वर्ग का उदय होता हैं। पाँच शक्ति के योग से सभी वर्ग पाँच होते हैं। तीन प्रकार इच्छा से य, र, ल, उन्मेष से व, तीन प्रकार इच्छा से श, ष, स, विसर्ग से ह् कार, योनि के संयोग से क्ष कार का उदय होता है। इस प्रकार यह अनुत्तर भगवान् ही कुलेश्वररूपी हैं उन्हीं की एकमात्र कौलिकी विसर्ग शक्ति जो आनन्दरूप को प्राप्तकर उसी से प्रारम्भ होकर बाहरी सृष्टि तक स्पन्दित होती है और वर्ग आदि परामर्शात्मक बनकर र और ल का आभास भी प्राप्त करते हैं, इसलिए इन्हें नपुंसक वर्ण कहते हैं। १. वर्णमाला के क्रियाशक्ति के प्रतीक चार वर्ण हैं जो ए, ऐ, ओ और औ हैं। स्पन्द के बहिर्मुख गति औ तक आने के बाद समाप्त हो जाती है। बहिर्मुख धारा की पूर्णता ही गति की समाप्ति है, इसके बाद बहिर्मुख गति के स्पन्दन से शक्ति की सब कलाएँ एक बनकर बिन्दुभाव प्राप्त करती हैं।
आ. ३ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १९ बाहर के तत्त्वरूप धारण करती है। यही विसर्ग तीन प्रकार हैं¹ आणव जो चित्तविश्रामरूप है, शाक्त जो चित्तसंबोध रूप और शाम्भव वह जो चित्त-प्रलयरूप है। अतः विसर्ग ही भगवान् की सृष्टि विषयक शक्ति है। इस प्रकार जब अनन्त विस्तृत स्वरूप को किसी प्रकार विभाग रहित रूप में परामर्श किया जाता है, भगवान एक ही है, ( लेकिन ) बीज और योनि इन दो विभक्त रूप में परामर्श होने पर वह शक्तिमान और शक्ति हैं। चक्रेश्वर के साथ आठों के समूह के अलग अलग परामर्श होने पर नौ वर्ग हैं। एक एक वर्ण के परामर्श जब प्रधान है तब वह पचास है।२ इनमें भी सम्भाव्य भेद के परामर्श होने पर इक्यासी १. विसर्ग तीन प्रकार हैं (१) आणव, (२) शाक्त, (३) शाम्भव, जो भेद, भेदाभेद और अभेदात्मक हैं। आणव विसर्ग से प्रमाता और प्रमेयरूपी विश्व जो चित्त के सम्मुख इदं रूप में भासित होता है उसे समझना चाहिए। इस परिदृश्यमान संसार में एक ओर चित् है और दूसरी ओर है चेत्य । चेतनभाव जब सीमित हो जाता तब चित् ही चित्त बन जाता है, उस समय भेदमय संसार ही दृष्टिगोचर होता है। आणव विसर्ग ही मायिक सृष्टि है। शाक्त विसर्ग इससे भिन्न है जो भेदाभेद प्रधान है। इसमें संकुचित प्रमातृभाव शान्त हो जाता है, उस समय अनुभव होने लगता है चित्त भी स्वात्म-संवित् में ही भासमान है। इसमें भेद का आभास रहते हुए भी अभेदभाव प्रधान है। शाम्भव विसर्ग में चित्त सर्वथा विलीन हो जाता है जिसके फल- स्वरूप संकुचित ज्ञान पूर्णज्ञान के रूप में प्रकट होता है। उस समय जो भी कुछ भासता है वह स्वात्मसंविद् रूप में ही भासता है। यह आनन्दरूप विसर्ग है लेकिन पहले दो में एक ज्ञान और दूसरा क्रियारूप हैं। २. वर्णों की संख्या पचास है अ से ह तक विभिन्न वर्ण शैव छत्तीस तत्त्वों के वाचक हैं। अ से अः शिवशक्ति तत्त्वों के, क से ङ तक पृथ्वी से आकाश, च से ञ तक गन्ध से शब्दतन्मात्र पंचक, ट से ण तक पाद से वाक् कर्मेन्द्रिय पंचक, त से न तक घ्राण से श्रोत्र ज्ञानेन्द्रिय पंचक, प से म तक मन, बुद्धि, अहंकार प्रकृति और पुरुष, य से व तक राग, विद्या, कला, माया आदि तत्त्व, श, ष, स, शुद्ध विद्या ईश्वर और सदाशिव के वाचक हैं। चक्रेश्वर क्ष कार है।
२० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ३ रूप बन जाता है। वास्तविकता छः ही परामर्श हैं। उनका प्रसर्पण और प्रतिसंचरण¹ होने से बारह बन जाते हैं और वे परमेश्वर की विश्वशक्ति रूप परिपूर्णता की पुष्टि करते हैं। ये सब परामर्श रूप होने के कारण परमेश्वर की शक्तिरूपिणी भगवती हैं और उनका नाम श्रीकालिका हैं²। ये शक्तिरूप शुद्ध परामर्श शुद्धविद्याभूमि में माया के उन्मेष मात्र संकोच से स्फुट भेदमय बनकर विभक्त हो जाते हैं और मायिक वर्ण रूप धारण करते हैं। ये पश्यन्ती, मध्यमा तथा वैखरी आदि वाणियों के रूप में व्यावहारिकता को प्राप्त करते हुए बाह्य तत्त्वस्वभाव प्राप्त करते हैं तब ये मायिक वर्ण ( जीवन हीन ) शरीर के समान दीख पड़ते हैं, जब पूर्वोक्त रीति से शुद्ध परामर्श के द्वारा जो उनके जीवन रूपी है, फिर से उन्हें जीवित कर दिए जाते हैं तब वे वीर्यशाली हो जाते हैं। तब वे उस प्रकार जीवनाधान से उस प्रकार रहते हुए भी भोग तथा मोक्ष के प्रदान करनेवाले बनते हैं। इस प्रकार सब परामर्शों के विश्राम ही जिसका एकमात्र स्वभाव है और जिसमें विभिन्न तत्त्व तथा भुवन प्रतिबिम्बित हो रहे हैं उस आत्म-स्वरूप को देखने पर निर्विकल्पक शाम्भव समावेश³ से जीवन्मुक्ति की प्राप्ति होती है। इसमें भी पहले की तरह मन्त्र आदि का कष्ट⁴ नहीं है। १. जब अनुत्तर आनन्द में, इच्छा ईशान में, उन्मेष ऊर्मि में प्रसृत होते हैं तब उन्हें प्रसरण और जब अ + इ, अ + उ, इ + अ, उ + अ, अ + बिन्दु, अ + विसर्ग तब जो जो वर्ण बनते हैं वे प्रतिसंचरण से बनते हैं। २. कालिका बारह हैं। 'कलयन्ति क्रमन्ते इति कालिका' कलन करते हैं इसलिए ये कालिका हैं। ३. स्वात्मरूप चिदाकाश में विश्व की जो भासना है वह मैं ही हूँ। वर्ण, मंत्र, पद तथा कला तत्त्व और भुवन रूप जो छः अध्वाएँ हैं वह सब मेरे स्वरूप में ही प्रतिबिम्बित, स्वरूप में उदित तथा उनका विलयन भी मेरे बोधरूपी अनल में हो रहा है इसप्रकार बोध में स्थित योगी शाम्भव समावेश में समाविष्ट ऐसा कहा जा सकता है। उनके बोध में सृष्टि आदि विभाग-रहित होकर अखंड बोध रूप में भासते हैं। ४. साधन मार्ग में स्नान, व्रत, देहशुद्धि, धारणा, मंत्र, याग, होम आदि बहु आयाससाध्य कर्तव्य हैं। शाम्भव उपाय में प्रविष्ट योगी के लिए ये अनावश्यक हैं।
आ. ३ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ २१ इस आत्मरूपी दर्पण के स्वच्छ तल में समग्र विश्व भास रहा है, परबोध स्वभाव परमेश्वर अपने विमर्शरूप चमत्कार रस का आस्वादन करते हुए विश्व का परामर्शन कर रहे हैं, लेकिन जड़ दर्पण अपने तल में जिन विचित्र रचनाओं का निर्माण करता है उस विषय में उसका परामर्शन नहीं होता । संवेदनशील बोधरूपी इस निर्मल दर्पण में सभी अपने स्वसंवेद्य स्वरूप लेकर ही भासते हैं क्योंकि आमर्शन रस से उनका विमर्शन होने से वे सत्य ही प्रतीत होते हैं । इस प्रकार अपने निर्मल आत्मा जो सब वस्तुओं का रूप हैं इसकी योजना ( सम्बन्ध ) कर सकने या वह पर भैरव स्वरूप होकर परमानन्द को प्राप्त करता है । इति तृतीय आह्निक ।
चतुर्थमाह्निकम् अथ शाक्तोपायः । तत्र यदा विकल्पं क्रमेण संस्करुते समनन्तरोक्तस्वरूपप्रवेशाय, तदा भावनाक्रमस्य सत्तर्कसदागमसद्गुरूपदेशपूर्वकस्य अस्ति उपयोगः । तथाहि—विकल्पबलात् एव जन्तवो बद्धम् आत्मानम् अभिमन्यन्ते, स अभिमानः संसारप्रतिबन्धहेतुः, अतः प्रतिद्वन्द्विरूपो विकल्प उदितः संसारहेतुं विकल्पं दलयति इति अभ्युदयहेतुः । स च एवं-रूपः समस्तेभ्यः परिच्छिन्नस्वभावेभ्यः शिवान्तेभ्यः तत्त्वेभ्यो यत् उत्तीर्णम् अपरिच्छिन्न- संविन्मात्ररूपं तदेव च परमार्थः, तत् वस्तुव्यवस्थास्थानं, तत् विश्वस्य ओजः, तेन प्राणिति विश्वम्, तदेव च अहम्, अतो विश्वोत्तीर्णो विश्वात्मा च अहम् इति । स च अयं मायानन्धानां न उत्पद्यते सत्तर्कादीनाम् अभा- वात् । वैष्णवाद्या हि तावन्मात्र एव आगमे रागवत्त्वेन नियमिता इति न ऊर्ध्वदर्शनेऽपि तदुन्मुखतां भजन्ते, ततः सत्तर्कसदागमसद्गुरूपदेशद्वेषिण 'वैष्णवाद्याः समस्तास्ते विद्यारागेण रञ्जिताः । न विन्दन्ति परं तत्त्वं सर्वज्ञज्ञानवर्जिताः ॥' इति एव । यथोक्तं पारमेश्वरे इति। तस्मात् शाम्भवदृढशक्तिपाताविद्धा एव सदागमादिक्रमेण विकल्पं संस्कृत्य परं स्वरूपं प्रविशन्ति । ननु इत्थं परं तत्त्वं विकल्परूपं स्यात् ? मैवम्—विकल्पस्य द्वैताधिवास- भङ्गमात्रे चरितार्थत्वात्, परं तत्त्वं तु सर्वत्र सर्वरूपतया स्वप्रकाशमेव इति न तत्र विकल्पः कस्यैचित् उपक्रियायै खण्डनायै वा । तत्र अतिदृढ- शक्तिपाताविद्धस्य स्वयमेव सांसिद्धिकतया सत्तर्क उदेति, योऽसौ देवीभिः दीक्षित इति वक्ष्यते । अन्यस्य आगमक्रमेण इत्यादि सविस्तरं शक्तिपातप्रकाशने वक्ष्यामः । किं तु गुरोरागमादिश्रवणे व्यापारः, आगमस्य च निःशङ्कसजातीयतत्प्रबन्धप्रसवस्निबन्धनसमुचितविकल्पोदये व्यापारः, तथाविधविकल्पप्रबन्ध एव सत्तर्क इति उक्तः, स एव च भावना भण्यते अस्फुटत्वात् भूतमपि अर्थम् अभूतमिव स्फुटत्वापादनेन भाव्यते यया इति । न च अत्र सत्तर्कात् शुद्धविद्याप्रकाशरूपात् ऋते
आ. ४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ २३ अन्यत् योगाङ्गं साक्षात् उपायः,—तपःप्रभृतेः नियमवर्गस्य, अहिंसादेश्च यमप्रकारस्य, पूरकादेः प्राणायामवर्गस्य वेद्यमात्रनिष्ठत्वेन क इव संविदि व्यापारः । प्रत्याहारोऽपि करणभूमिमेव सातिशयां कुर्यात्, ध्यानधारणा- समाधयोऽपि यथोत्तरम् अभ्यासक्रमेण निर्वर्त्यमाना ध्येयवस्तुतादात्म्यं ध्यातुः वितरेयुः । अभ्यासश्च परे तत्त्वे शिवात्मनि स्वस्वभावे न सम्भवत्येव । संविद्रूढस्य प्राणबुद्धिदेहानिष्ठीकरणरूपो हि अभ्यासः— भारोद्वहनशास्त्रार्थबोधनृत्ताभ्यासवत्, संविद्रूपे तु न किञ्चित् आदातव्यं न अपसरणीयम् इति कथम् अभ्यासः । किं तर्केणापि इति चेत्, उक्तमत्र द्वैताधिवासनिऱासप्रकार एव अयं न तु अन्यत् किञ्चिदिति । लौकिकेऽपि वा अभ्यासे चिदात्मत्वेन सर्वरूपस्य तस्य तस्य देहादेः अभिमतरूपता- प्रकटीकरणं तदितररूपन्यग्भावनं च इति एष एव अभ्यासार्थः । परतत्त्वे तु न किञ्चित् अपास्यम् इति उक्तम् । द्वैताधिवासोऽपि नाम न कश्चन पृथक् वस्तुभूतः अपि तु स्वरूपाख्यातिमात्रं तत्, अतो द्वैतापासनं विकल्पेन क्रियत इत्युक्तः । अथ परमार्थः—स्वरूपं प्रकाशमानम् अख्यातिरूपत्वं स्वयं स्वातन्त्र्यात् गृहीतं क्रमेण प्रोज्झ्य विकासोन्मुखम् अथ विकसद्, अथ विकसितम् इत्यनेन क्रमेण प्रकाशते, तथा प्रकाशन- मपि परमेश्वरस्य स्वरूपमेव, तस्मात् न अत्र योगाङ्गानि साक्षात् उपायः । तर्कस्तु अनुगृह्णीयुर्यदि, सत्तर्क एव साक्षात् तत्र उपायः, स एव च शुद्धविद्या, सा च बहुप्रकारतया संस्कृतो भवति, तद्यथा—यागो होमो जपो व्रतं योग इति, तत्र भावानां सर्वेषां परमेश्वर एव स्थितिः, नान्यत् व्यतिरिक्तम् अस्ति इति विकल्पारूढिसिद्धये परमेश्वर एव सर्व- भावार्पणं यागः, स च हृद्यत्वात् ये संविदनुप्रवेशं स्वयमेव भजन्ते तेषां सुशकं परमेश्वरे अर्पणम् इत्यभिप्रायेण हृद्यानां कुसुमतर्पणगन्धादीनां बहिरुपयोग उक्तः । सर्वे भावाः परमेश्वरतेजोमया इति रूढविकल्पप्राप्त्यै परमेशसंविदनलतेजसि समस्तभावग्रासरसिकताभिमाने तत्तेजोमात्राव- शेषत्वसहसमस्तभावविलापनं होमः । तथा उभयात्मकपरामर्शोदयार्थं बाह्याभ्यन्तरादिप्रमेयरूपाभिन्नभावानपेक्षयैव एवं-विधं तत् परं तत्त्वं स्वस्वभावभूतम् इति अन्तः परामर्शनं जपः । सर्वत्र सर्वदा निरुपाय- परमेश्वराभिमानलाभाय परमेश्वरतमताभिमानेन देहस्यापि घटादेरपि अवलोकनं व्रतम् । यथोक्तं श्रीनन्दिशिखायाम् ॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰ 'सर्वसाम्यं परं व्रतम् ।'
२४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ४ इति। इत्थं विचित्रैः शुद्धविद्यांशरूपैः विकल्पैः यत् अनपेक्षितविकल्पं स्वाभाविकं परमार्थतत्त्वं प्रकाशते तस्यैव सनातनतथाविधप्रकाश- मात्रतारूढये तत्स्वरूपानुसन्धानात्मा विकल्पविशेषो योगः। तत्र परमेश्वरः पूर्णसंवित्स्वभावः, पूर्णतैव अस्य शक्तिः,—कुलं सामर्थ्यं ऊर्मिः हृदयं सारं स्पन्दः विभूतिः त्रिशिका काली कर्शणी चण्डी वाणी भोगो दृक् नित्या इत्यादिभिः आगमभाषाभिः तत्तदन्वर्थप्रवृत्ताभिः अभिधीयते, तेन तेन रूपेण ध्यायिनां हृदि आस्ताम् इति। सा च समग्रशक्तितादर्शनेन पूर्णतासंवित् प्रकाशते। शक्तयश्च अस्य असंख्येयाः। किं बहुना, यत् विश्वं ता अस्य शक्तयः, ताः कथम् उपदेष्टुं शक्याः इति। तिसृषु तावत् विश्वं समाप्यते, यया इदं शिवाद्धरण्यन्तम् अविकल्प्यसंविन्मात्ररूपतया बिभर्ति च पश्यति च भासयति च परमेश्वरः सा अस्य श्रीपराशक्तिः। यया च दर्पणहस्त्यादिवत् भेदाभेदाभ्यां सा अस्य श्रीपरापराशक्तिः। यया परस्परविविक्तात्मना भेदेनैव सा अस्य श्रीमदपराशक्तिः। एतत् त्रिविधं यथा धारणम् आत्मन्येव क्रोडीकारेण अनुसन्धानात्मना ग्रसते, सा अस्य भगवती श्रीपरैव श्रीमन्मातृसद्भावकालकर्षिण्यादिशब्दान्तरनिरुक्ता। ता एताः चतस्रः शक्तयः स्वातन्त्र्यात् प्रत्येकं त्रिधैव वर्तन्ते। सृष्टौ स्थितौ संहारे च इति द्वादश भवन्ति। तथाहि—१ संवित् पूर्वम् अन्तरेव भावं कलयति, २ ततो बहिरपि स्फुटतया कलयति, ३ तत्रैव रक्तिमयतां गृहीत्वा ततः तमेव भावम् अन्तरुपसंहिहीर्षया कलयति, ४ ततश्च तदुप- संहारविघ्नभूतां शङ्कां निर्मिणोति च ग्रसते च, ५ ग्रस्तशङ्कांशं भावभागम् आत्मनि उपसंहारेण कलयति, ६ तत उपसंहर्तृत्वं ममेदं रूपमित्यपि स्वभावमेव कलयति, ७ तत उपसंहर्तृस्वभावकलने कस्यचिद्भावस्य वासनात्मना अवस्थितिं कस्यचित् तु संविन्मात्रावशेषतां कलयति, ८ ततः स्वरूपकलनानान्तरीयकत्वेनैव करणचक्रं कलयति, ९ ततः करणेश्वरमपि कलयति, १० ततः कल्पितं मायीयं प्रमातृरूपमपि कलयति, ११ सङ्को- चत्यागोन्मुखविकासग्रहणरसिकमपि प्रमातारं कलयति, १२ ततो विकसितमपि रूपं कलयति इति एता द्वादश भगवत्यः संविदः प्रमातॄन् एकं वापि उद्दिश्य युगपत् क्रमेण द्विशः त्रिश इत्यादिस्थित्यापि उदय- भाजिन्यः चक्रवदावर्तमाना बहिरपि मात्रकलाराश्यादिक्रमेण अन्ततो वा घटपटादिक्रमेणापि भासमानाः चक्रेश्वरस्य स्वातन्त्र्यं पुष्णन्त्यः श्रीका- लीशब्दवाच्याः। कलनं च—गतिः क्षेपो ज्ञानं गणनं भोगीकरणं शब्दनं स्वात्मलयीकरणं च। यदाहुः श्रीभूतिराजगुरवः:
आ. ४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ २५ 'क्षेपाज्ज्ञानाच्च काली कलनवशतयाथ...।' इति । एष च अर्थः तत्र तत्र मद्विरचिते विवरणे प्रकरणस्तोत्रादौ वितत्य वीक्ष्यः । न अतिरहस्यम् एकत्र ख्याप्यं न च सर्वथा गोप्यम् इति हि अस्मद्गुरवः । तदेवम् यदुक्तं यागहोमादि तत् एवं-विधे महेश्वर एव मन्तव्यम् । सर्वे हि हेयमेव उपादेयभूमिरूपं विष्णोतः प्रभृति शिवान्तं परमशिवतया पश्यन्ति, तच्च मिथ्यादर्शनम् अवश्यत्याज्यम् अनुत्तरयो- गिभिरिति, तदर्थमेव विद्याधिपतेः अनुभवस्तोत्रे महान् संरम्भः, एवं- विधे यागादौ योगान्ते च पञ्चके प्रत्येकं बहुप्रकारं निरूढिः यथा यथा भवति तथैव आचरेत्, न तु भक्ष्याभक्ष्यशुद्धाशुद्ध्यादिविवेचनया वस्तुधर्मोज्झितया कल्पनामात्रसारया स्वात्मा खेदनीय इति उक्तं श्रीपूर्वादौ, न हि शुद्धिः वस्तुनो रूपं नीलत्ववत्, अन्यत्र तस्यैव अशुद्धि- चोदनात्, दानस्येव दीक्षितत्वे, चोदनातः तस्य तत् तत्र अशुद्धम् इति चेत् चोदनान्तरेऽपि तुल्यं, चोदनान्तरम् असत्—तद्बाधितत्वात् इति चेत् न, शिवचोदनाया एव बाधकत्वं युक्तिसिद्धं सर्वज्ञानोत्तराद्यनन्ता- गमसिद्धं च इति वक्ष्यामः । तस्मात् वैदिकात् प्रभृति पारमेश्वरसिद्धान्त- तन्त्रकुलोच्छुष्मादिशास्त्रोक्तोऽपि यो नियमो विधिः वा निषेधो वा सोऽत्र यावदकिंचित्कर एव इति सिद्धम् । तथैव च उक्तं श्रीपूर्वादौ, वितत्य तन्त्रालोकात् अन्वेष्यम् । यो निश्चयः पशुजनस्य जडोऽस्मि कर्म- संपाशितोऽस्मि मलिनोऽस्मि परेरितोऽस्मि । इत्येतदन्यदृढनिश्चयलाभसिद्ध्या सद्यः पतिर्भवति विश्ववपुश्चिदात्मा ॥ यथा यथा निश्चय ईदृगाप्यते तथावधेयं परयोगिना सदा । न वस्तुयाथात्म्यविहीनया दृशा विशङ्कितव्यं शिशुदेशनागणैः ॥ जह जह जस्सु जहिं चिव पफुरइ अज्जवसाउ । तह तह तस्सु तहिं चिव तारिसु होइ पहाउ ॥ हतं मलिणउ हतं पसु हतं आ अह सअलभावपडलवत्तिरित्तउ ।
२६ तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ४ इअ दढनिच्छअ णिअ लिअ हिअअह फुरइ णाम कह जिस्स परतत्तउ ॥ परसिवतरणिकिरण-दढपातविकासिअ हिअअ कमलए । सरहस्स फुरिअ णिअ अइसुन्दरपरिमलबोहकरमए ॥ हतं सिवणाहु निहिल जअतत्त सुनिब्भरओत्ति विहुरी । फुरइ विमरिसभमरि पपलाअ णिअ लच्छि विभइरी ॥ इति श्रीमद्भिनव गुप्ताचार्य विरचिते तन्त्रसारे शाक्तोपायप्रकाशनं नाम चतुर्थ माह्निकम् ।
आ. ४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ २७ शाक्तोपाय इन उपायों में जब विकल्प¹ का संस्कार आगे² उल्लिखित स्वरूप में प्रवेश करने के लिए किया जाता है, तब सत् तर्क सदागम और सद्गुरु के उपदेश पूर्वक भावना के क्रम की उपयोगिता दिखाई पड़ती है। क्योंकि विकल्प के कारण ही पशुजीव अपने को बद्ध जैसा अभिमान³ करता है। यही अभिमान संसार रूप बन्धन का कारण है, इसलिए इसके प्रतियोगी विकल्प का उदय ही संसार के कारणरूपी विकल्प का नाश करता है और अभ्युदय⁴ का कारण बन जाता है। यह (शुद्ध विकल्प) इस प्रकार है—शिवतक सब प्रकार परिच्छिन्न-स्वभाव वाले तत्त्वों से जो उत्तीर्ण (परे) अपरिच्छिन्न संविन्मात्ररूप (अखण्ड प्रकाश) हैं वही परमार्थ है, वही वस्तु व्यवस्थापक है, वही विश्व का ओजः है। उन्हीं के द्वारा विश्व प्राणमय है, मैं भी वही हूँ इसलिए मैं विश्वोत्तीर्ण १. विकल्प दो प्रकार हैं, एक शुद्ध और दूसरा अशुद्ध है। शुद्ध विकल्प परमार्थ प्राप्ति का सहायक है और अशुद्ध विकल्प जीवों को संसार की ओर ढकेलता है। अशुद्ध विकल्प के कारण आत्मा अपने को संकुचित रूप में ग्रहण करता है। २. अन्य प्रकार गुणों का आधान करना ही संस्कार शब्द का तात्पर्य है। जिसे स्वरूप कहा जाता है वह स्वभाव है जो निर्विकल्प रूप है। बारम्बार उस स्वभाव के सम्बन्ध में श्रवण, चिन्तन और मनन होने से विकल्प का संस्कार होता है। प्राथमिक स्थिति में विकल्प की शुद्धि स्फुट न होकर अस्फुट रहती है, उसके अनन्तर स्फुटतम स्थिति का उदय होता है। यह याद रखने योग्य है कि परमतत्त्व विकल्पों का विषय नहीं है, शुद्ध विकल्पों से अशुद्ध द्वैतवासना की निवृत्ति होती है, परमतत्त्व के प्रकाशन में उसकी कोई कारणता नहीं है। विकल्पों के यथावत संस्कार होने पर वही शुद्ध अविकल्पक संविद् रूप में प्रकाशित होता है। ३. अनादिकाल से प्रत्येक जीव के हृदय में 'मैं बद्ध हूँ' इस प्रकार सुदृढ़ धारणा वर्तमान है, इस प्रकार बद्धमूल धारणा के कारण वह संसारी जीव है, यही अभिमान है। ४. 'मैं बद्ध हूँ' इस प्रकार बद्धमूल धारणा के प्रतिकूल विचार ही संसार के कारणरूपी विकल्पों के नाश करने में सहायक है। उस प्रकार शुद्ध विकल्प का स्वरूप 'स च एवं रूपः' इस प्रकार कथन से प्रदर्शित किया गया है।
२८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ४ तथा विश्वात्मक हूँ। इस प्रकार विकल्प मायान्ध पशुओं में उत्पन्न नहीं होता क्योंकि उनमें सत् तर्क¹ आदि का अभाव है। वैष्णव आदि (सम्प्रदाय में स्थित) अपने प्रदर्शित आगमों में रागतत्त्व के द्वारा नियन्त्रित रहकर ऊर्ध्वदर्शनों में प्रतिपादित विषयों की ओर उन्मुख नहीं होते, इसलिए वे सत् तर्क, सदागम और सद् गुरु के उपदेश के द्वेषी होते हैं। जैसे पारमेश्वर आगम² में कहा गया है। 'वे सभी वैष्णव आदि सम्प्रदाय विद्याराग से रंजित होकर सर्वज्ञ परमेश्वर के ज्ञान से वर्जित रहते हैं और परम तत्त्व को प्राप्त नहीं करते।' अतः शिव सम्बन्धी शक्तिपात के द्वारा आविद्ध जीव ही सदागम के क्रम से विकल्पों का संस्कार करते हुए पर-स्वरूप में प्रवेश करते हैं। अब प्रश्न यह है—इस प्रकार होने से क्या परम तत्त्व विकल्प का विषय नहीं हुआ? नहीं, द्वैत संस्कार का निराकरण करना ही विकल्प संस्कार की सार्थकता है, क्योंकि परम तत्त्व सर्वत्र सर्वरूप होने के कारण स्वप्रकाश रूप है—इसलिए विकल्प न तो किसी के उपकार के लिए या खण्डन के लिए उपयोगी है। अत्यन्त तीव्र शक्तिपात जिस जीव पर होता है उसमें स्वभाव से ही सत् तर्क का उदय होता है—जो देवियों के द्वारा दीक्षा प्राप्त हुआ ऐसा कहा जाता है। इससे भिन्न जीवों को १. शक्तिपात की मात्रा कम होने पर माया के द्वारा मलिन जीवों में स्वभाव से सत् तर्कों का उदय नहीं होता, किन्तु आगमों के उपदेश से धीरे-धीरे सत् तर्क उदित होता है। २. आगम शंकाहीन अर्थात् सन्देहरहित सजातीय विकल्पात्मक है। उसी से समुचित विकल्प उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार समुचित विकल्पों के प्रवाह ही विशुद्ध विकल्प है—वही सत् तर्क का स्वरूप है। उसे ही भावना कहते हैं। भावना को सर्वकामदुधा कहा गया है। इस शास्त्र में तर्क योग के छः अंगों के अन्यतम है। प्राणायाम, ध्यान, प्रत्याहार, धारणा और तर्क इन छः अंगों में तर्क को उत्तम कहा गया है, क्योंकि यह हेय और यह उपादेय है, इस प्रकार विचार करता हुआ योगी शीघ्र ही तत्त्वज्ञ बन जाते हैं। इस प्रकार तर्क के द्वारा ही मोक्ष प्राप्ति के उपाय रूपी अन्य शास्त्रों को हेय कोटि में रखकर उपादेयरूपी सर्वोत्तीर्ण परम प्रकाशमय तत्त्व में प्रविष्ट होते हैं।
आ. ४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ २९ आगम के अनुसार ( दीक्षा मिलती है ), इसकी सविस्तार आलोचना शक्तिपात प्रकाशन नामक अध्याय में करेंगे । गुरु आगम के ( अर्थ ) निरूपण में व्यापार है, फिर आगम का कार्य शंकाहीन ( सन्देह रहित ) सजातीय ज्ञान की श्रृंखलाओं के उत्पादन के द्वारा उचित विकल्प (शुद्ध विकल्प ) को उदित करना है । उन विकल्पों की श्रृंखला को ही सत् तर्क कहते हैं । वैसे तर्कों को भावना कहते हैं जो अस्फुट भूत-विषय ( अतीत विषय ) को भी वर्तमान की तरह स्फुटता का आधान करते हुए उसकी भावना की जाती है। इस विषय में शुद्धविद्या प्रकाशरूपी सत् तर्क के अतिरिक्त अन्य कोई साक्षात् योगांग नहीं है । तपः¹ प्रभृति नियम समूह, अहिंसा आदि यम के प्रकार, पूरक आदि प्राणायाम समूह केवल वेद्य वस्तुओं में ही सीमित हैं अतः संवित् में उनका कोई उपयोग नहीं है । प्रत्याहार² भी करण भूमि ( इन्द्रिय आदि ) में ही उत्कर्षता का आधान करता है, ध्यान, धारणा, समाधि भी उत्तरोत्तर क्रम से अभ्यास³ के द्वारा सम्पादित होने पर ध्येय वस्तु के साथ ध्यान करने वाले को तदात्मता प्रदान करते हैं । लेकिन अभ्यास शिवस्वरूप परम तत्त्व जो निज स्वभाव है उसमें सम्भव नहीं । संवित् में स्थित होकर ही प्राण, बुद्धि, देह आदि में उत्कर्ष का आपादन ही अभ्यास का तात्पर्य १. अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह ये पाँच यम के अन्तर्गत हैं । यम साक्षात् रूप से संवित् में उपयोगी नहीं है । बोध-स्वभाव शिव-स्वरूप के अधिगम के लिए प्राणायाम आदि की भी उपयोगिता स्वीकृत नहीं है । इस शास्त्र में इन सबको बाहरी आडम्बर कहा गया है । २. किसी विषय से अर्थात् रूपादि विषयों से इन्द्रियों को निवृत्त कराकर चित्त स्वरूप में स्थित करना ही प्रत्याहार का लक्ष्य है, लेकिन संवित् सर्वव्यापक है । अतः उसकी उपलब्धि सर्वत्र होना सम्भव है । इसी प्रकार धारणा, ध्यान एवं समाधि भी नियताकार होने से परिच्छिन्न है, इसलिए ये अपरिच्छिन्न संवित् के साक्षात्कार में उपयोगी नहीं हैं । ३. हृदय में सचेतनता के साथ प्राण, बुद्धि और शरीर में जो-जो क्रियाएँ होती हैं उसे अभ्यास कहते हैं । भारी वस्तु को उठाना, शास्त्रों का अनुशीलन और उनका आशय ज्ञात करना, नृत्य और संगीत की चर्चा करने से उत्तरोत्तर उनमें कुशलता उत्पन्न होती है । लेकिन बोध-स्वभाव संवित् सदा ही एकरूप है । इसलिए अभ्यास से उसकी वृद्धि या ह्रास नहीं होती ।
३० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ४ है—जैसे भार का ढोना, शास्त्रार्थ का बोध और नृत्त का अभ्यास की तरह, संवित् स्वरूप में न तो किसी का ग्रहण करना है, न किसी को हटाना है, इसलिए अभ्यास कैसे होगा ? तब तर्क से भी क्या होगा ? द्वैत बोध की वासना को हटाने का यह एक उपाय मात्र है यहाँ यही कहा गया है—इसका अन्य कुछ उद्देश्य नहीं है। या लौकिक अभ्यास में भी सब रूप चिदात्मक है, अतः भिन्न भिन्न शरीरों में इष्ट रूप को प्रकट करना, उससे भिन्न रूप को गौण कोटि में रखना—यही अभ्यास का तात्पर्य है। परम तत्त्व के विषय में तो किसी का भी निराकरण नहीं करना है। द्वैत विषयक वासना भी कोई अलग वस्तु नहीं है अपितु वह केवल स्वरूप की ही अख्याति मात्र हैं, इसलिए द्वैत का निराकरण विकल्प से किया जाता है—ऐसा ही कहा गया है। परमार्थ यह है कि जो प्रकाशमान स्वरूप हैं जिसने अपनी स्वतन्त्रता से अख्याति रूप को धारण कर लिया है क्रम से उसे त्याग करते हुए विकसोन्मुख, विकसित होने वाला और अन्त में विकसित इस क्रम से प्रकाशित होते हैं। ऐसा प्रकाशन भी परमेश्वर का स्वरूप ही है, इसलिए इस विषय में (प्रकाशन में) योगांग साक्षात् उपाय नहीं है। तर्क को (योगांग) उपकार करते हैं, तो भी सत् तर्क ही साक्षात् उसमें (स्वरूप के प्रकाशन में) उपाय है, वही शुद्ध विद्या है। (विकल्प) नाना प्रकार से संस्कृत होता है— जैसे याग, १ होम, जप, व्रत और योग आदि है। सब भावों की स्थिति परमेश्वर में ही है—उनसे भिन्न कोई वस्तु नहीं है—इस प्रकार विकल्प विषयक दृढ़ निष्ठा की सिद्धि के लिए परमेश्वर में सब भावों का अर्पण करना ही याग है। यह (याग) हृदयहारी है अतः जो कुछ संवित् स्वरूप में स्वतः ही अनुप्रविष्ट होते हैं उन्हें परमेश्वर को अनायास अर्पित किये जा सकते हैं इस अभिप्राय से मनोहर कुसुम और गन्ध आदि का बाहर भी उपयोग होता है ऐसा कहा गया है। सब भावराशि परमेश्वर के तेजः स्वरूप हैं इस प्रकार दृढ़ विकल्प की सिद्धि के लिए परमेश्वररूपी संविदनल शिखा जो सब भावमण्डल के ग्रसन के रसिक हैं उसमें उनके तेजः स्वरूप हो अन्त में शेष रहे इस प्रकार से विलयन करना ही होम है। उसी प्रकार बाह्य और आभ्यन्तर प्रमेयों के रूप में भिन्न-भिन्न भावों की अपेक्षा न करते हुए इस प्रकार वह परमतत्त्व १. यहाँ याग आदि का जो उल्लेख हुआ है वह भी सत्तर्करूपी है।
आ. ४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ३१ जो स्वाभावरूप है हृदय में उसका अनुसन्धान ही जप है। सब जगह, सर्वदा उपाय रहित (उपायों के अगम्य) परमेश्वर विषयक अभिमान की प्राप्ति के लिए शरीर तथा घट आदि परमेश्वर का ही तुल्य स्वरूप है—इस प्रकार अभिमान से देखना ही व्रत है। श्री भर्गशिखा में जैसे कहा गया है— 'सब के साथ समता ही उत्तम व्रत है।' शुद्धविद्या के अंशरूपी विभिन्न प्रकार के विकल्पों के द्वारा अन्य- निरपेक्ष विकल्प जो स्व-भाविक है और जिससे परमार्थ तत्त्व प्रकाश में आ जाता है, वह नित्य वैसे ही प्रकाशमान हैं इस प्रकार दृढ़ प्रतिपत्ति के लिए उसके स्वरूप का अनुसन्धानात्मक विकल्प विशेष योग है। इसमें परमेश्वर पूर्ण संवित्स्वभाव हैं, पूर्णता ही उनकी शक्ति हैं जो कुल, सामर्थ्य, ऊर्मि, हृदय, सार, स्पन्द, विभूति, त्रिशीका, काली, कर्षणी, चण्डी, वाणी, भोग, दृक, नित्या इत्यादि आगम भाषाओं से तत्तत् शब्दों की सार्थकता प्रतिपादित करती हुई कही जाती हैं, जो उन विभिन्न रूपों में ध्यान करनेवालों के हृदय में विराजती हैं। वह समग्र शक्तिरूपिणी है इस प्रकार दृष्टि में आ जाने से पूर्णतारूपिणी संवित् का प्रकाशन होता है। परमेश्वर की शक्तियाँ असंख्य हैं। अधिक क्या, जो विश्व है वह उन्हीं की शक्तियाँ हैं, अतः इस विषय में उपदेश करना सम्भव नहीं। यह विश्व तीन शक्तियों १ से समाप्त हो जाता है। शिव से पृथिवी तक
१. समग्र विश्व तीन शक्तियों का विलास है। एक श्री पराशक्ति जिसके द्वारा शिव से पृथ्वी तक तत्त्वराशि निर्विकल्प संविद् रूप में भासित होता है, दूसरी परापराशक्ति है जिससे दर्पण में हस्ती की छाया के सदृश दर्पण रूप में अभिन्न होकर भी हस्ती रूप में उससे भिन्न प्रतीत होता है और तीसरी भेदमय मायिक स्थिति है जहाँ भेद ही प्रधान है। इन तीनों के शक्ति के अन्तराल में जो शक्ति सब में अनुस्यूत है वह भी पराशक्ति का ही एक रूप है जिसके पर्याय मातृसद्भाव, कालकर्षिणी आदि है। प्रत्येक शक्ति सृष्टि, स्थिति और संहार के क्रम से तीन-तीन होने के कारण कुल बारह बनती हैं। पूर्ण चैतन्य की अभिव्यक्ति जिस शक्ति के द्वारा होती है और जिससे काल का क्रमिक धारा चिरकाल के लिए अस्तमित हो जाती है वही कालसंकर्षणी की स्थिति है। सभी प्रमाताओं में प्रमिति क्रिया का कर्तृत्व रूप प्रमातृत्व इस मातृसद्भाव रूप शक्ति के कारण ही सम्भव होता है।
३२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ४ (समग्र तत्त्व) को जिस शक्ति से विकल्प विरहित केवल संवित् रूप में परमेश्वर धारण करते हैं, दर्शन करते हैं और प्रकाशित करते हैं वह उनकी श्री पराशक्ति हैं। जिस शक्ति से दर्पण में स्थित हस्ती के समान भेदाभेद रूप में भासित करते हैं वह उनकी श्री मदपरा शक्ति हैं। जिस शक्ति से परस्पर पृथग् रूप में अर्थात् परस्पर भेद से प्रकाशित करते हैं वह उनकी श्रीमदपरा शक्ति हैं। इन त्रिविध को जिस शक्ति के द्वारा धारण किया जाता है अर्थात् अपने स्वरूप में ही स्थापित करते हुए अनुसंधानात्मक व्यापार से ग्रसते हैं वह उनकी भगवती श्रीपरा शक्ति ही श्रीमातृसद्भाव कालकर्षिणी आदि अन्य शब्दों से वर्णित की जाती हैं। इन चार शक्तियों के प्रत्येक स्व- तन्त्रतावश तीन तीन रूप से उदित होती है। अतः सृष्टि स्थिति तथा संहार में ये बारह १ बनती हैं। जैसे— १. संवित् पहले भाव को अन्तः ही कलना करती है, २. इसके अनन्तर बाहर स्फुट रूप से कलना करती है, ३. बाहर ही उसे रंजनात्मक रूप से ग्रहण करने बाद उस भाव को अन्तः संहार करने की अभिलाषा से कलना करती है, १. परम संवित् रूप प्रमाता भेदरूप इन्धन के दहन करने के कारण अग्निरूपी है। वे स्वरूपतः अहं प्रतीति मात्र है जो अपने स्वातन्त्र्य से बुद्धि मन और दस इन्द्रिय के रूप धारण कर द्वादश भाव से स्फुरित होते हैं। प्रमाता जो अग्निरूपी है वही प्रमाणरूप स्थिति प्राप्त करते हैं—उस समय उन्हें सूर्य कहते हैं—अहंकार ही उनके उस समय का रूप है। जिसे हम प्रमाण कहते हैं वह प्रमाता का ही बाहरी रूप है। अब प्रमेय की बात है। प्रमाण बिना किस आधार के प्रमाण नहीं कहलायेगा। अतः सूर्य ही सोम अर्थात् मेयरूपी विश्व का रूप धारण करता है। प्रमाता से प्रमेय तक की स्थितियों में प्रत्येक के चार-चार क्रम हैं जो सृष्टि, स्थिति, संहार और अनाख्या नाम से परिचित है इसलिए उनकी संख्या कुल बारह है। ये जो भासनाएँ हैं वे संवित् की ही भासना है। अतः बोधभूमि में संचरणशील योगी किसी भी स्थिति में इन चारों का अनुसन्धान करते हुए उसमें तल्लीन हो सकते हैं।
आ. ४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ३३ ४. तदनन्तर उसके उपसंहरण के विघ्नरूपी शंका का निर्माण करती है, उसका संहरण भी करती है, ५. शंका के अंश जो ग्रसित हो चुका है भाव के उस भाग को अपने स्वरूप में संहरण से कलना करती है, ६. यह जो उपसंहार करनेवाला है यह मेरा ही स्वरूप है इस प्रकार से भी अपने स्वभाव की कलना करती है, इसके अनन्तर उपसंहार करनेवाले के स्वभाव की कलना में किसी भाव को वासना रूप में स्थापित करती है और किसी भाव को संवित् मात्रा शेष रूप से कलना करती है, ८. इसके बाद स्वरूप की कलना के अनन्तर उत्पन्न करणचक्र की कलना करती है, ९. इसके उपरान्त करणेश्वर की कलना भी करती है, १०. इसके बाद कल्पित मायिक प्रमाता रूप की भी कलना करती है, ११. तब संकोच त्याग के प्रति उन्मुखता और विकास रूप चमत्कार रस के आस्वादन करनेवाले प्रमाता रूप की कलना करती है । १२. इसके बाद ( प्रमाता के ) विकसित स्वरूप की भी कलना करती है । अतः भगवती संवित् देवियाँ सब प्रमाताओं के प्रति अथवा किसी एक प्रमाता के प्रति दो या तीन आदि के क्रम से या अक्रम से उदित होती है और चक्र के सदृश आवर्तित होती रहती हैं । बाहर भी मास, कला, राशि के क्रम से और भीतर घट पटादि के क्रम से भी आभासित होती हैं, इस प्रकार भासित होती हुई चक्रेश्वर की स्वतन्त्रता का पोषण करती हैं इसलिए वे श्रीकाली १ शब्दवाच्या हैं । कलना का अर्थ गति, १. यहाँ जो कलना की चर्चा हुई उसके विभिन्न प्रकार के अर्थ हैं जो ग्रन्थकार ने अपने तन्त्रालोक में स्पष्ट किया है । कलना करने वाली संवित् को काली कहते हैं । इन कालियों की संख्या बारह हैं जो भिन्नप्रकार हैं—१ सृष्टि- काली, २. स्थितिकाली, ३. संहारकाली, ४. रक्तकाली, ५. स्वकाली ( सुकाली ), ६. यमकाली, ७. मृत्युकाली, ८. रुद्रकाली ( भद्रकाली ), ३
३४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. ४ क्षेप, ज्ञान, भोगीकरण, शब्दन, स्वात्मलयीकरण हैं। इस विषय में भूतिराज गुरु का कथन है— ‘क्षेप और ज्ञान के कलना के कारण काली इत्यादि’ यही अर्थ मेरे द्वारा विरचित विभिन्न ग्रन्थ जैसे विवरण और प्रकरण- स्तोत्र आदि में विस्तृत रूप से देखने योग्य हैं। गम्भीर बातें एक जगह नहीं खोल देना चाहिए, सर्वथा उसका गोपन भी नहीं करना चाहिए— यही हमारे गुरुचरणों का निर्देश है। अतः याग होम आदि के विषयों में जो कुछ कहा गया है वह इस प्रकार महेश्वर स्वरूप में ही स्थित है, ऐसा जानना चाहिए। जो वस्तु हेय है सभी लोग उसे ही उपादेय भूमिका के रूप में ग्रहण करते हैं, और विष्णु से लेकर शिव तक सभी को परमशिव रूप में देखते हैं, ऐसी मिथ्यादृष्टि अनुत्तर योगी के द्वारा सर्वथा त्याज्य है। विद्याधिपति ने इसलिए अपने अनुभव स्तोत्र में विशेष विचार किया है। इस प्रकार याग से योग तक पाँचों विषय पृथक्-पृथक् रूप में नाना प्रकार है अतः उनमें जैसे सुदृढ़ निष्ठा उत्पन्न हो वैसा आचरण ( अभ्यास ) करना चाहिए। यह भक्ष्य है और यह अभक्ष्य तथा यह शुद्ध है और यह अशुद्ध है इस प्रकार विचारों से जो वस्तुओं का सहज धर्म नहीं है और कल्पना मात्र ही उनका वास्तविक तथ्य या सार है आत्मा ( शरीर ) का क्लेश उत्पन्न नहीं करना चाहिए—श्रीपूर्व आदि ग्रन्थों में ऐसा कहा गया है। शुद्धि नीलत्व धर्म के सदृश वस्तु का धर्म नहीं है, अन्य स्थलों में उसी की अशुद्धता का निर्देश दिया गया है—जैसे ९. परमार्ककाली, १०. मार्तण्ड काली, ११. कालाग्नि रुद्रकाली, १२. महा- काली ( पराकाली, महाकाल काली, कालकाली ), यह जो काली की कलना आदि की बातें कही गयी हैं वह प्रमेय, प्रमाण और प्रमाता के साथ सम्बन्धित है और प्रमेय, प्रमाण और प्रमाता के प्रत्येक स्थिति सृष्टि, स्थिति, संहार और अनाख्यारूपी हैं इसलिए संविद् देवियों की कुल संख्या बारह है। वास्तव में कोई भी वस्तु अपने से भिन्न न होते हुए भी अपनी स्वतन्त्रता से उसे बाहर अवभासित करता है, ऐसा करना ही सृष्टि है। उसी प्रकार प्रमाता से अभिन्न जो संवित् है वह प्रमाण दशा को प्राप्त करती हुई प्रमेय बन जाती है।
आ. ४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ३५ दान दीक्षित पुरुष के लिए—प्रवर्तक वाक्य से ( दान ) वहाँ अशुद्धता का निर्देश हुआ ऐसा कहा जाय, अन्य प्रकार प्रवर्तक वाक्य से ( जो शिव के द्वारा कहा गया है ) तुल्य हो जाता है, इस प्रकार दूसरा प्रवर्तक वाक्य असत् ( अलीक ) है और उस प्रकार वाक्य बाध दोष से बाधित है—ऐसा कहा जाय तो यह ठीक नहीं क्योंकि शिव के द्वारा कथित वाक्य ही अन्य प्रवर्तक वाक्यों का बाधक है जो युक्तिसिद्ध है और सर्वज्ञानोत्तर आदि अनन्त प्रकार आगमों के द्वारा प्रमाणित हैं—इस विषय में आगे आलोचना करेंगे। अतः वैदिक से आरम्भ कर पारमेश्वर सिद्धान्त रूपी तन्त्र जैसे कुलोच्छुष्मादि शास्त्रों में कथित जो नियमरूपी विधि या निषेधात्मक बातें हैं वे सभी यहाँ अकिञ्चित्कर हैं ! श्रीपूर्व आदि ग्रन्थों में ऐसा ही कहा गया है—इसका विस्तृत विवरण तन्त्रालोक में अन्वेषण करना चाहिए। × × × मैं जड़ हूँ, कर्मपाश से बद्ध हूँ, मलिन हूँ, दूसरे के द्वारा संचलित होता हूँ पशु जीव का इस प्रकार जो निश्चय है इसके विपरीत सुदृढ़ निश्चयात्मक निष्ठा की प्राप्तिरूपी सिद्धि आने पर वह उसी क्षण विश्वशरीर चिदात्मक पतिस्वभाव को प्राप्त करता है । इस प्रकार निश्चय जैसे आ सकता है पर योगी सतत उस प्रकार अनुसन्धान के लिए अवहित रहे । वस्तु के यथार्थरूप से हीन जो दृष्टि है उससे शंकित होना नहीं चाहिए अर्थात् सन्देह में नहीं पड़ना चाहिए न तो मूढ़ों के उपदेशों से भ्रमित होना चाहिए । × × × किसी का अध्यवसाय जैसे-जैसे स्फुट होता जायगा, उसका प्रभाव भी तब उसी प्रकार होगा ॥ × × × मैं मलिन हूँ, मैं पशु हूँ, अथवा मैं सब भावमण्डल से भिन्न हूँ, इस प्रकार दृढ़ निश्चय ने जिसके हृदय को मलिन कर रखा है उसमें कैसे परत्व का प्रतिभास होगा ? × × × परम शिवरूपी सूर्य किरणों से जिसके हृदय कमल तीव्र शक्तिपात