तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआ. ३ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १७ हैं, इनका परामर्श भी तीन हैं जो अ, इ और उ है। इन तीनों से शक्ति समूह का विस्तार हुआ है। अनुत्तर में ही विश्राम आनन्द है, इच्छा में विश्राम ईशान तथा उन्मेष में ही विश्राम ऊर्मि है जहाँ क्रियाशक्ति का प्रारम्भ है। यही तीन परामर्श आ, ई और ऊ हैं। इन पूर्ववर्ती तीन परामर्शों १ में प्रकाश अंश ही सारभूत है इसलिए यह सूर्यात्मक हैं, और अन्तिम परामर्शत्रय २ विश्रान्ति स्वभाव ३ है इसलिए यह आनन्द प्रधान है, अतः यह सोमात्मक हैं। इतने तक क्रियांश का अनुप्रवेश नहीं हुआ। जब इच्छा और ईशान में क्रिया का अनुप्रवेश होता है ४ तब ये इष्यमान और ईश्यमान कहलाते हैं। तब इनमें दो भेद उत्पन्न १. अनुत्तर, इच्छा और उन्मेष ये तीन अर्थात् वर्णमाला के प्रथम तीन वर्ण सूर्यात्मक है। २. आनन्द, ईशान तथा ऊर्मि, ये तीन आ, ई और ऊ हैं जो सोमात्मक हैं। ३. सूर्य प्रकाश स्वभाव है। जैसे 'अ' वर्ण प्रकाशरूपी सूर्य का रूप है, आ उसी प्रकार आनन्द स्वभाव है इसलिए आनन्द अनुत्तर अ का विश्राम, ईशान इच्छा का, ऊर्मि उन्मेष का विश्राम हैं। अनुत्तर जब दूसरे अनुत्तर को अपने सामने देखता है तब वही आ या आनन्दरूप प्राप्त करता है। अ वर्ण चिद्भाव का प्रतीक है। यही चिद्भाव जब अपने अभिमुख होता है दर्पण में मुख के प्रतिबिम्ब के सदृश, तब वह अनुकूल संवेदन के रूप में प्रकाशमान होता है, शास्त्रीय वर्ण 'आ' इसी आनन्द का प्रतीक है। ४. साहित्य में जिसे इच्छा रूप में वर्णित किया गया है वर्णमाला में वही तृतीय वर्ण 'इ' है जो खोये हुए आनन्द का ही अन्वेषण कर रहा है। इच्छा और ईशान तथा उन्मेष और ऊर्मि जो क्रमशः इच्छाशक्ति ( इ-ई ), ज्ञान- शक्ति ( उ-ऊ ) के प्रतीक हैं। इनमें स्फुट या अस्फुट किसी भी तरह क्रिया- शक्ति का प्रवेश नहीं हुआ है। जब इन दो स्थितियों में क्रिया का अनुप्रवेश होता है तब चार नपुंसक वर्ण का उदय होता हैं। ऋ, ॠ, ये दो वर्ण व्यंजन के र के अनुरूप है ऌ ॡ ये दो व्यंजन का ल के सदृश है। व्यंजन के र और ल के अनुरूप होते हुए भी ये नपुंसक वर्ण वास्तविकतया उनके सदृश स्फुट वर्णरूप नहीं है अपितु बिजली के चकित प्रकाश के समान ये वर्ण की छाया या आभास धारण करते हैं। अगर उनमें स्फुटरूपता होती तो वस्तु का निर्माण हो जाता। इन चार वर्ण दोनों की छाया धारण किये हुए हैं अर्थात् एक ओर ये स्वर वर्ण के अन्तर्गत हैं लेकिन व्यंजन के २