तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन्यायबोधिनी-कलासंवलितः ८१ न्यायबोधिनी कृष्णावलम्बिनो गाः पूषा गोवर्धनस्तमभ्यर्चन् । विपुलाभीरसभाजनजितविबुधेन्द्रस्तवाभिरचनाभिः ॥ २ ॥ ॥ इति तर्कसंग्रह-न्यायबोधिनी समाप्ता ॥ हिन्दी- "हे कृष्ण ! सच्चिदानन्दघन परमात्मन् ! मेरी समस्त इन्द्रियों को अपने चरणारविन्द में लगाते हुए रक्षा करो" इस बुद्धि से समस्त संसार के प्रकाशक भगवान् भास्कर के समान जिज्ञासुजन को न्यायशास्त्र के व्याख्यान से समस्त पदार्थों का बोध कराने वाले गोवर्धन सुधी, रसों के शिरोमणिभूत भक्तिरस से पूरित होने के कारण महापण्डितों द्वारा की गई स्तुतियों को भी जीतने वाले अपने प्रशस्त वाणी- विलासों द्वारा उस परमात्मभूत भगवान् कृष्ण की अभ्यर्चंना करते हैं । इति न्यायवेदान्तसांख्ययोगाचार्यश्रीकेदारनाथत्रिपाठि- प्रणीतायां तर्कसंग्रहन्यायबोधिन्याः 'हिन्दी-कला' व्याख्यायामवशिष्टपरिच्छेदः पूर्णः ।