भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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पृष्ठ 99

८० तर्कसंग्रहः [ अवशिष्टपरिच्छेदः काणादन्यायमतयोर्बालव्युत्पत्तिसिद्धये । अन्नम्भट्टेन विदुषा रचितस्तर्कसंग्रहः ॥ कणादमुनिद्वारा प्रतिपादित वैशेषिक एवं गौतममुनिद्वारा प्रतिपादित न्यायमतों में बालकों की व्युत्पत्ति ( बोध ) सिद्धि के लिए विद्वान् अन्नम्भट्ट ने इस तर्कसंग्रहनामक ग्रन्थ की रचना की । ॥ इति श्रीमन्महामहोपाध्यायान्नम्भट्टविरचितस्तर्कसंग्रहः समाप्तः ॥ न्यायबोधिनी सर्वेषामिति । प्रमाण-प्रमेय-संशय-प्रयोजन-दृष्टान्त-सिद्धान्तावयव-तर्क- निर्णय-वादजल्प-वितण्डा-हेत्वाभास-च्छल-जाति-निग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञा- नान्निःश्रेयसाधिगम' इति न्यायस्यादिमसूत्र उक्तानां प्रमाणप्रमेयादीना- मित्यर्थः । तद्भिन्नत्वविशिष्टतद्गतभूयोधर्मरूपसादृश्यस्यापि घटपटादिरूपत्वेन नातिरिक्तत्वम् । एवमन्येषामप्यूह्यम् । काणादेति । कणादस्येदं काणादम् । काणादन्यायमते इति द्वन्द्वगर्भकर्म- धारयः । कणादप्रोक्तगौतमप्रोक्तमतयोरिति यावत् । काणादन्यायाभिन्नम- तद्वयविषय ( क ) बालसमवेताभिन्नव्युत्पत्तिसिद्धिप्रयोजकान्नंभट्टविद्वन्निष्ठभूत- कालीनकृतिविषयाभिन्नस्तर्कसंग्रहाख्यग्रन्थ इत्यन्वयबोधः । हिन्दी-कला समाधान— न्यायसूत्रोक्त प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनादि का यथायोग्य इन्हीं सात पदार्थों में अन्तर्भाव होने से न्यूनता नहीं है । इसी प्रकार "तद्भिन्नत्वे सति तद्गत- भूयोधर्मवत्त्वरूप सादृश्य भी घट-पटादि द्रव्यरूप होगा तथा कहीं गवादिरूप होगा, अतः यह सप्तातिरिक्त नहीं है । विशेष स्पष्टीकरण 'संस्कृत-कला' व्याख्या में द्रष्टव्य है । ग्रन्थ के अन्त में उल्लिखित "काणादन्यायमतयोः" इस श्लोक में काणादपद कणादप्रोक्तपरक है, तथा न्यायपद गौतमप्रोक्तपरक है । अतः पहले काणादपद और न्यायपद में द्वन्द्वसमास होगा, जिसका अर्थ होगा "दोनों महर्षियों द्वारा प्रोक्त । पुनः काणादन्यायपद का द्विवचनान्त 'मते' इस पद के साथ कर्मधारयसमास होगा । इस प्रकार काणाद और न्याय से अभिन्न जो मतद्वय अर्थात् कणादप्रोक्त ओर गौतम- प्रोक्त से अभिन्न जो मतद्वय, तद्विषयक बालक में समवेत ( समवायसम्बन्ध से वर्तमान ) जो व्युत्पत्ति, उसकी सिद्धि की प्रयोजिका जो अन्नंभट्टनामक विद्वान् में स्थित भूतकालीना कृति, उसका विषय यह तर्कसंग्रहनामक ग्रन्थ है । इस प्रकार का अन्वयबोध उक्त श्लोक से होता है ।