भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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१५४ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः करणस्य किं लक्षणम् ?— असाधारणं कारणं करणम् । कारणस्य किं लक्षणम् ?— कार्यनियतपूर्ववृत्ति कारणम् । कार्यस्य किं लक्षणम् ?— कार्यं प्रागभावप्रतियोगि । पदकृत्यम् तज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनकः । ईश्वरेच्छादिवारणाय तज्जन्यत्वे सतीति । कुलालजन्यत्वे सति कुलालजन्यघटजनकत्वं कुलालपुत्रस्याप्यस्त्यतस्तत्राति- व्याप्तिवारणाय प्रथमं सत्यन्तम् । दण्डरूपादिवारणाय तज्जन्यजनक इति । कार्येति । कार्य्यान्नियताऽवश्यम्भाविनी पूर्ववृत्तिः पूर्वक्षणवृत्तिर्यस्य तत्तथे- त्यर्थः । अनियतरासभादिवारणाय नियतेति । कार्यवारणाय पूर्वेति । १दण्ड- त्वादिवारणायानन्यथासिद्धत्वविशेषणस्यावश्यकत्वेन तत एव रासभादि- वारणसम्भवे नियतपदमनर्थकमेव । एवं चानन्यथासिद्धकार्यपूर्ववृत्ति कारण- मिति फलितम् । अनन्यथासिद्धत्वमन्यथासिद्धिशून्यत्वम् । अन्यथासिद्धिश्चाव- श्यकॢप्तनियतपूर्ववर्तिनैव कार्यसम्भवे तत्सहभूतत्वम् । यथाऽवश्यकॢप्त- नियतपूर्ववर्तिभिर्दण्डादिभिरेव घटरूपकार्यसम्भवे तत्सहभूतत्वं दण्डत्वादौ, तदन्यथासिद्धत्वम् । प्रागभावेति । २कालादिवारणाय प्रागिति । ३असम्भववारणाय प्रतियोगीति । हिन्दी १. दण्डत्व भी घटकार्यके नियत पूर्ववृत्ति है, अतः उसमें घटके प्रति कारणता- का वारण करनेके लिये 'अनन्यथासिद्धत्व' विशेषण लगाना आवश्यक है । ऐसी स्थितिमें रासभमें भी इसी विशेषणसे घटकारणताका वारण हो जायगा । अतः नियत- पद वस्तुतः व्यर्थ है । तब लक्षणका निष्कर्ष यह हुआ -- अनन्यथासिद्ध हो और कार्यके पूर्ववृत्ति हो, वह कारण है । २. 'प्राक्'पद न देनेपर 'अभाव'पदसे अन्योन्याभाव भी गृहीत हो जायगा । ऐसी स्थितिमें अन्योन्याभावका प्रतियोगी होनेसे काल आदिमें कार्यलक्षणकी अतिव्याप्ति हो जायगी । 'प्राक्'पद देनेपर तो कालका प्रागभाव नहीं होनेसे प्रागभावप्रतियोगित्व- लक्षणकी कालमें अतिप्रसक्ति नहीं हुई ३. 'प्रतियोगी' शब्दका अर्थ है विरोधी । 'प्रतियोगी' शब्द न देनेपर प्रागभावका जो अविरोधी हो वह कार्य है, ऐसा लक्षण हो जायगा, जो असंभवदोषसे ग्रस्त है । क्योंकि कोई भी कार्य प्रागभावका अविरोधी नहीं होता, किन्तु विरोधी ही होता है । इसीलिए कार्य उत्पन्न होते ही उसका प्रागभाव नष्ट हो जाता है । अतः प्रतियोगी पद देना आवश्यक है ।