भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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ॐ तर्कसंग्रहः सानुवादः न्यायबोधिनी-कलाद्वयसंवलितः ( हिन्दीव्याख्यासहितपदकृत्योपेतश्च ) प्रत्यक्षपरिच्छेदः निधाय हृदि विश्वेशं विधाय गुरुवन्दनम् । बालानां सुखबोधाय क्रियते तर्कसंग्रहः ॥ हृदय में विश्व के स्वामी परमात्मा को रख कर तथा गुरु की वन्दना कर बालकों को सुखपूर्वक न्याय-पदार्थों का बोध कराने के लिए तर्कसंग्रहनामक ग्रन्थ की रचना की जा रही है । न्यायबोधिनी अखिलागमसञ्चारि श्रीकृष्णाख्यं परं महः । ध्यात्वा गोवर्धनसुधीस्तनुते न्यायबोधिनीम् ॥ चिकीर्षितस्य ग्रन्थस्य निर्विघ्नपरिसमाप्त्यर्थमिष्टदेवतानमस्कारात्मकं मङ्गलं शिष्यशिक्षायै ग्रन्थतो निबध्नाति - निधायेति । हिन्दी-कला यस्मिन् ध्याते भवेत् सिद्धिर्गणनाथे गजानने । सो ऽनुगृह्णातु नस्तूर्णं बुद्धिराशिर्गुणालयः ॥ समस्त आगमों के प्रतिपाद्यतत्त्व श्रीकृष्णनामक सर्वोत्कृष्ट ( लोकोत्तर ) तेज का ध्यान कर गोवर्धननामक न्यायशास्त्र के विद्वान् न्यायाभिमत पदार्थों का बोधक होने के कारण “न्यायबोधिनी” इस यथार्थनामवाली विस्तृत व्याख्या को निर्मित करते हैं । प्रस्तुत व्याख्येय ग्रन्थ तर्कसंग्रह की व्याख्या के प्रारम्भ में मूल ग्रन्थ के कर्ता श्रीअन्नंभट्टद्वारा किये गये इष्टदेवतानमस्कारात्मक मङ्गल का प्रयोजन दर्शाते हुए गोवर्धन सुधी कहते हैं कि चिकीर्षित ( निर्माण के लिए अभीष्ट )