भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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२ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाभावाः सप्त पदार्थाः । द्रव्य-गुण-कर्म-सामान्य-विशेष-समवाय और अभाव ये सात पदार्थ हैं । न्यायबोधिनी अथ पदार्थान् विभजते—द्रव्येति । तत्र सप्तग्रहणं पदार्थत्वं द्रव्यादिस- प्तान्यतमत्वव्याप्यमिति व्याप्तिलाभाय । ननु शक्तिपदार्थस्याष्टमस्य सत्त्वात् कथं सप्तैवेति । तथाहि वह्निसंयुक्ते- न्धनादौ सत्यपि मणिसंयोगे दाहो न जायते, तच्छून्ये तु जायते । अतो मणिसमवधाने शक्तिर्नश्यति मण्यभावदशायां दाहानुकूला शक्तिरुत्पद्यत इति कल्प्यते । तस्मात् शक्तिरतिरिक्तः पदार्थ इति चेत्, न, मणेः प्रतिबन्धकत्वेन मण्यभावस्य कारणत्वेनैव निर्वाहे मणिसमवधानासमवधानाभ्यामनन्त- शक्ति-तद्ध्वंस-तत्प्रागभावकल्पनाया अन्याय्यत्वात् । तस्मात् सप्तैवेति सिद्धम् । हिन्दी-कला ग्रन्थ (तर्कसंग्रह) की निर्विघ्न परिसमाप्ति के लिए ग्रन्थकार श्रीअन्नंभट्ट मन में किये गये मङ्गल को शिष्यों की शिक्षा के लिये, अर्थात् शिष्यगण भी कार्यारम्भ में मंगल किया करें इस अभिप्राय से, ग्रन्थ के आदि में "निधाय हृदि विश्वेशम्" इस श्लोक के रूप में उल्लिखित करते हैं । अब पदार्थों का विभाग करते हैं—द्रव्य गुण कर्म इत्यादि । अर्थात् द्रव्य गुण- कर्म आदि पदार्थ सात होते हैं । यहाँ पदार्थों का विभाग-बोध तो द्रव्य-गुण आदि के पृथक्-पृथक् नामोल्लेख से ही हो जायगा, अतः 'सप्त' इस संख्यावाचक पद का उल्लेख व्यर्थ है—ऐसी शङ्का नहीं की जा सकती है । क्योंकि "पदार्थत्वधर्म द्रव्यादिसप्तान्य- तमत्व का व्याप्य है" इस व्याप्ति का बोध कराने के लिये मूलकार ने सप्त-ग्रहण किया है । अर्थात् "जहाँ-जहाँ पदार्थत्व है वहाँ-वहाँ द्रव्यादिसप्तान्यतमत्व है" इस व्याप्ति का लाभ होने से सभी पदार्थ द्रव्यादि सात के अन्तर्गत ही समाविष्ट हैं, इनसे अतिरिक्त कोई पदार्थ नहीं है, यह सूचित करने के लिये मूल में 'सप्त' पद का उल्लेख किया गया है । शङ्का—मीमांसक आदि को अभिमत शक्ति भी एक अष्टम पदार्थ है, अतः 'सप्तैव पदार्थाः यह कथन कैसे संगत है ? क्योंकि काष्ठादिरूप इन्धन में अग्नि का संयोग रहने पर भी यदि उसमें चन्द्रकान्तमणि का संयोग हो जाय, तो दाह नहीं होता है । किन्तु मणिसंयोग का अभाव रहने पर उस अग्नि से दाह हो जाता है । इसलिये यह कल्पना की जाती है कि मणिसन्निधान की दशा में अग्नि की दाहकता-