तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन्यायबोधिनी-कलासंवलित ३ तत्र द्रव्याणि पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशकालदिगात्ममनांसि नवैव । रूपरसगन्धस्पर्शसंख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागपरत्वापर- त्वगुरुत्वद्रवत्वस्नेहशब्दबुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मसंस्कारा- श्चतुर्विशतिगुणाः । पदार्थों के अन्तर्गत द्रव्य नव ही होते हैं, पृथिवी-अप् (जल)-तेज-वायु-आकाश- काल-दिक् (दिशा) आत्मा और मन । रूप-रस-गन्ध-स्पर्श-संख्या-परिमाण-पृथक्त्व-संयोग-विभाग-परत्व-अपरत्व-गुरुत्व- द्रवत्व-स्नेह-शब्द-बुद्धि-सुख-दुःख-इच्छा-द्वेष-प्रयत्न-धर्म-अधर्म और संस्कार ये चौबीस गुण हैं। न्यायबोधिनी द्रव्याणि विभजते—पृथिवीति । नन्वन्धकारस्य दशमद्रव्यस्य सत्त्वात् कथं नवैवेति ? तथाहि नीलं तमश्चलतीति प्रतीतेर्नीलरूपाश्रयत्वेन क्रिया- श्रयत्वेन च द्रव्यत्वं सिद्धम् । न च कॢप्तद्रव्येष्वन्तर्भावात् कुतो दशमद्रव्य- त्वमिति वाच्यम् । तमसो रूपवत्त्वात् आकाशादिपञ्चकस्य वायोश्च नीरूप- त्वान्न तेष्वन्तर्भावः । तमसो निर्गन्धत्वान्न पृथिव्यामन्तर्भावः । जलतेजसोः शीतोष्णस्पर्शवत्त्वान्न तयोरन्तर्भावः । तस्मात्तमसो दशमद्रव्यत्वं सिद्धमिति चेत्, न, तेजोऽभावरूपत्वेनैवोपपत्तावतिरिक्ततत्कल्पनायां मानाभावात् । हिन्दी-कला शक्ति नष्ट हो जाती है और मणि के हट जाने पर उसमें पुनः दाहानुकूल शक्ति उत्पन्न हो जाती है । इससे सिद्ध होता है कि शक्तिनामक अतिरिक्त आठवां पदार्थ भी है । समाधान—दाह के प्रति मणि के प्रतिबन्धक होने से प्रतिबन्धकाभाव के रूप में मण्यभाव को भी सहकारी कारण मानने से ही काम चल जायगा । ऐसी स्थिति में बार-बार मणि के समवधान और असमवधान के कारण अनन्तशक्ति की तथा उसके अनन्त ध्वंस की और अनन्त प्रागभाव की कल्पना अनुचित है । अतः सात ही पदार्थ हैं, यह सिद्ध है । शङ्का—अन्धकार भी दशम द्रव्य है, तब नव ही द्रव्य है, यह कैसे कहा ? क्योंकि "नीलं तमश्चलति" ऐसी प्रतीति होने से नीलरूप एवं चलन क्रिया का आश्रय होने के कारण अन्धकार में भी द्रव्यत्व सिद्ध है । यहाँ ऐसा नहीं कह सकते कि निश्चित पृथिवी आदि नव द्रव्यों में ही तम का भी अन्तर्भाव होने से वह दशम द्रव्य कैसे होगा ? क्योंकि अन्धकार के रूपयुक्त होने से तथा आकाशादि पांच तथा वायु के रूपरहित होने से इनमें अन्धकार का समावेश नहीं हो सकता है । एवं जल और तेज के क्रमशः शीत और उष्ण स्पर्शवाला होने के कारण स्पर्शहीन