तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः उत्क्षेपणापक्षेपणाकुञ्चनप्रसारणगमनानि पञ्च कर्माणि । परमपरञ्चेति द्विविधं सामान्यम् । नित्यद्रव्यवृत्तयो विशेषा- स्त्वनन्ता एव । समवायस्त्वेक एव । अभावश्चतुर्विधः प्रागभावः, प्रध्वंसाभावोऽत्यन्ताभावोऽन्यो- न्याभावश्चेति । इत्युद्देशग्रन्थः । उत्क्षेपण-अपक्षेपण-आकुञ्चन-प्रसारण और गमन ये पाँच कर्म हैं । पर और अपर दो प्रकार के सामान्य ( जाति ) होते हैं । नित्य द्रव्य में ही रहने वाले विशेष हैं और वे अनन्त हैं । समवाय एक ही है । अभाव चार प्रकारका होता है, प्रागभाव-प्रध्वंसाभाव-अत्यन्ताभाव और अन्योन्या- भाव । यहाँ तक उद्देशग्रन्थ है । अर्थात् यहाँ तक पदार्थों के नाममात्र का कथन किया गया । इनका लक्षण और विशेष विचार आगे होगा । न्यायबोधिनी न च विनिगमनाविरहात् तेज एव तमोऽभावरूपमस्त्विति वाच्यम्, तेज- सोऽभावरूपत्वे सर्वानुभूतोष्णस्पर्शाश्रयद्रव्यान्तरकल्पने गौरवात् । तस्मा- दुष्णस्पर्शगुणाश्रयतया तेजसो द्रव्यत्वं सिद्धम् । तमसि नीलत्वादिप्रतीतिस्तु भ्रान्तिरेव, दीपापसरणक्रियाया एव तत्र भानात् । हिन्दी-कला तम का इन दोनों में भी अन्तर्भाव नही हो सकता है । अतः दशम द्रव्य के रूप में तम सिद्ध हो जाता है । समाधान—तम को तेज का अभावरूप मान लेने से ही काम चल जायगा, अतः अतिरिक्त द्रव्य के रूप में उसकी कल्पना करने में कोई प्रमाण नहीं है । यह नहीं कह सकते कि एकतरपक्षपातिनी युक्ति के अभाव में तेज ही तम का अभाव रूप है और तम द्रव्य है । क्योंकि तेज यदि स्वतन्त्र द्रव्य न होकर तम का अभाव रूप हो तो सभी को अनुभूयमान उष्णस्पर्श का आश्रय कौन होगा ? अर्थात् तब उष्णस्पर्श के आश्रय के रूप में तेज से अतिरिक्त किसी दूसरे द्रव्य की कल्पना करनी पड़ जायगी और वैसा करने में गौरवदोष होगा । इसलिये प्रतीयमान उष्णस्पर्श-गुण के आश्रय के रूप में तेज को तो द्रव्य मानना ही होगा और तम उसका अभावरूप होगा । तम में नीलता की प्रतीति भ्रम है तथा क्रिया की प्रतीति भी दीपक के चलने के कारण भ्रान्ति ही है ।