तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः शीतस्पर्शवत्य आपः । ता द्विविधाः । नित्याः अनित्याश्च । नित्याः परमाणुरूपाः अनित्याः कार्य्यरूपाः । पुनस्त्रिविधाः शरीरे- न्द्रियविषयभेदात् । शरीरं वरुणलोके । इन्द्रियं रसग्राहकं रसनं जिह्वाग्रवर्ति । विषयः सरित्समुद्रादिः । उष्णस्पर्शवत्तेजः । तच्च द्विविधम् । नित्यमनित्यञ्च । नित्यं परमाणुरूपम् । अनित्यं कार्य्यरूपम् । पुनस्त्रिविधं शरीरेन्द्रियविषय- भेदात् । शरीरमादित्यलोके प्रसिद्धम् । इन्द्रियं रूपग्राहकं चक्षुः कृष्णताराग्रवर्ति । विषयश्चतुर्विधो भौमदिव्योदर्य्याकरजभेदात् । भौमं वह्न्यादिकम् । अबिन्धनं दिव्यं विद्युदादि । भुक्तस्य परिणाम- हेतुरुदर्यम् । आकरजं सुवर्णादि । शीतल स्पर्श जिसका है, वह जल है । वह दो प्रकार का होता है—नित्य जल और अनित्य जल । नित्य जल परमाणुरूप है । अनित्य जल कार्यरूप है । शरीर-इन्द्रिय और विषय के भेद से कार्यरूप अनित्य जल फिर तीन प्रकार का होता । जल का शरीर वरुणलोक में होता है । रस को ग्रहण करने वाली तथा जिह्वा के अग्रभाग में रहने वाली रसना नामक इन्द्रिय जल की है । नदी समुद्र आदि विषयरूप जल है । जिसका उष्ण स्पर्श है, ऐसा द्रव्य तेज है । वह भी दो प्रकार का होता हैं— नित्य तेज और अनित्य तेज । नित्य तेज परमाणु रूप है । अनित्य तेज कार्यरूप होता है । कार्यरूप अनित्य तेज फिर तीन प्रकार का होता है—शरीर-इन्द्रिय और विषय के भेद से । शरीररूप अनित्य तेज अर्थात् तैजस शरीर आदित्य लोक में प्रसिद्ध (शास्त्र प्रसिद्ध) है । इन्द्रिय रूप तेज चक्षु है, जो रूप का ग्रहण करता है और चक्षुर्गोलक के अन्तर्गत कृष्णतारा के अग्रभाग में स्थित रहता है । विषय रूप तेज चार प्रकार का होता है—भौम-दिव्य-उदर्य और आकरज के भेद से । अग्नि आदि भौम तेज है जल ही जिसका इन्धन है, ऐसा विद्युत् आदि दिव्य तेज है । खाये हुए पदार्थ के परिपाक का हेतु तेज उदर्य तेज है । तथा सुवर्ण आदि आकरज (खान से पैदा हुआ, खनिज) तेज है । न्यायबोधिनी एवं शीतस्पर्शवत्वादिलक्षणेषु जलादीनां लक्ष्यता जलत्वादीनां लक्ष्यता- वच्छेदकत्वं च बोध्यम् । हिन्दी- इसी प्रकार "शीतस्पर्शवत्य आपः" आदि अग्रिम लक्षणों में जल और तेज में लक्ष्यता है तथा जलत्व और तेजसत्व धर्म में लक्ष्यतावच्छेदकत्व है, ऐसा समझना चाहिये ।