तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन्यायबोधिनी-कलासंवलितः रूपरहितस्पर्शवान् वायुः । स द्विविधः । नित्योऽनित्यश्च । नित्यः परमाणुरूपः । अनित्यः कार्यरूपः । पुनस्त्रिविधः शरीरेन्द्रिय- विषयभेदात् । शरीरं वायुलोके । इन्द्रियं स्पर्शग्राहकं त्वक् सर्वशरीरवर्ति । विषयो वृक्षादिकम्पनहेतुः । शरीरान्तःसञ्चारी वायुः प्राणः । स चैकोऽप्युपाधिभेदात् प्राणापानादिसंज्ञां लभते । रूप से रहित हो और स्पर्श वाला हो, ऐसा द्रव्य वायु है । वह दो प्रकार का होता है – नित्य और अनित्य । नित्य वायु परमाणु रूप है और अनित्य वायु कार्यरूप है । कार्यरूप अनित्य वायु का फिर तीन भेद है- शरीर-इन्द्रिय और विषय । शरीरात्मक वायु वायु लोक में होता है । वायवीय इन्द्रिय त्वचा है, जो स्पर्श का ग्राहक है और समस्त शरीर में व्याप्त है । विषय के रूप में वायु वह है, जो वृक्षादि के कम्पन का हेतु बनता है । वह शरीर के अन्दर सञ्चरण करने वाली विषयभूत वायु प्राण है । वह प्राणवायु एक होता हुआ भी हृदय आदि उपाधि के भेद से पांच प्रकार का होता है और प्राण-अपान-समान-व्यान और उदान संज्ञा को प्राप्त कर जाता है । न्यायबोधिनी एवं पृथिव्यादित्रिकं निरूप्य वायुं निरूपयति- रूपरहितेति । रूप- रहितत्वे सति स्पर्शवत्त्वं वायोर्लक्षणम् । सति सप्तम्या विशिष्टार्थकत्वात् सामानाधिकरण्यसम्बन्धेन रूपत्वावच्छिन्नप्रतियोगिताकाभावविशिष्ट- स्पर्शवत्त्व वायोर्लक्षणम् । विशेषांशानुपदाने स्पर्शवत्त्वमात्रस्य लक्षणत्वे पृथिव्यादित्रिकेऽतिव्याप्तिः, तद्वारणाय विशेषणोपादानम् । तावन्मात्रो- पादाने आकाशादावतिव्याप्तिः, तद्वारणाय विशेष्योपादानम् । हिन्दी-कला इस प्रकार पृथिवी आदि तीन का स्वरूप बताने के बाद मूलकार वायु का स्वरूप बताते हैं- "रूपरहितस्पर्शवान् वायुः" इत्यादि द्वारा । अर्थात् "रूपरहितत्वे सति स्पर्शवत्त्वम्" यह वायु का लक्षण हुआ । यहाँ रूपरहितत्व का अर्थ है- रूपाभाव, अर्थात् रूपत्वावच्छिन्न-प्रतियोगिताकअभाव । 'सति' इस सप्तम्यन्त पद का अर्थ है- विशिष्ट, जिसका स्पर्श पदार्थ के साथ अन्वय होगा । यहाँ रूपाभाव-विशिष्ट स्पर्श का अभिप्राय है- सामानाधिकरण्यसम्बन्ध से रूपभाव-विशिष्ट स्पर्श । अर्थात् समान अधिकरण में रूपाभाव और स्पर्श का रहना अभिप्रेत है । वायु अधिकरण में रूपाभाव के साथ स्पर्श रहता है, इसलिये रूपाभाव-विशिष्ट स्पर्शवत्त्व अर्थात् 'रूपत्वावच्छिन्नप्रतियोगिताकाभाव-विशिष्ट स्पर्शवत्त्व' यह वायु का परिष्कृत लक्षण निष्पन्न हुआ । विशेष संस्कृत-कला व्याख्या में देखिये ।