भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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८ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः न्यायबोधिनी अतिव्याप्तिर्नाम-अलक्ष्ये लक्षणसत्त्वम् । यथा गोः शृङ्गत्वं लक्षणं कृतञ्चेत्-लक्ष्यभूतगोभिन्नमहिष्यादावतिव्याप्तिः, तत्रापि शृङ्गित्त्वस्य विद्यमानत्वात् । अव्याप्तिर्नाम-लक्ष्यैकदेशावृत्तित्वम् । लक्ष्यैकदेशे = लक्ष्य- तावच्छेदकाश्रयीभूते क्वचिल्लक्ष्ये लक्षणासत्त्वमव्याप्तिरित्यर्थः । यथा गोर्नीलरूपवत्त्वं लक्षणं कृतं चेल्लक्ष्यतावच्छेदकाश्रयीभूतश्वेतगवि अव्याप्तिः, तत्र नीलरूपाभावात् । असंभवो नाम लक्ष्यमात्रे कुत्रापि लक्षणासत्त्वम् । यथा गोरेकशफवत्त्वम् । गोसामान्यस्य द्विशफवत्त्वेन एकशफवत्त्वस्य कुत्राप्यसत्त्वात् । अतिव्याप्त्यव्याप्त्यसंभवानां निष्कृष्टलक्षणानि— लक्ष्यतावच्छेदकसामानाधिकरण्यत्वे सति लक्ष्यतावच्छेदकावच्छिन्नप्रतियोगि- ताकभेदसामानाधिकरण्यमतिव्याप्तिः । अव्याप्तिस्तु लक्ष्यतावच्छेदकसमानाधिकरणात्यन्ताभावप्रतियोगित्वम् । असंभवस्तु लक्ष्यतावच्छेदकव्यापकीभूताभावप्रतियोगित्वम् । हिन्दी-कला इस लक्षण में 'रूपाभाव' विशेषण न दिया जाय और स्पर्शवत्त्वमात्र वायु का लक्षण किया जाय तो वायुलक्षण की पृथिवी जल और तेज में अतिव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि स्पर्शमात्र तो पृथिवी आदि में भी है । इसका वारण करने के लिये 'रूपाभाव' विशेषण दिया एवं रूपाभावमात्र वायु का लक्षण करने पर आकाश आदि में वायुलक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । अतः इसका वारण करने के लिये स्पर्शवत्स्वरूप विशेष्य का सन्निवेश किया गया । लक्षण के तीन दोष होते हैं--अतिव्याप्ति, अव्याप्ति और असंभव । अलक्ष्य में लक्षण की सत्ता अतिव्याप्ति है । जैसे, 'शृङ्गित्त्व' यदि गो का लक्षण किया जाय तो यह लक्षण गो से भिन्न महिषी आदि में भी चला जायगा । क्योंकि वहाँ भी शृङ्गित्त्व विद्यमान है । लक्ष्य के एक भाग में लक्षण का न रहना अव्याप्तिदोष है । अर्थात् लक्ष्यतावच्छेदक जो गोत्व, उसके आश्रयभूत किसी एक गो में लक्षण का नहीं रहना अव्याप्ति है । जैसे, गो का लक्षण यदि 'नीलरूपवत्त्व' किया जाय तो लक्ष्यतावच्छेदक- गोत्व का आश्रयीभूत श्वेत-गो में लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि उसमें नीलरूप का अभाव है । लक्ष्यमात्र में कहीं भी लक्षण का न रहना असंभव दोष है । जैसे, गो का लक्षण यदि 'एक शफवत्त्व' किया जाय, तो यह लक्षण असंभवदोष से ग्रस्त होगा । क्योंकि सभी गौओं के दो खुर होने से 'एकशफवत्त्व' किसी भी गो में नहीं है । नव्यन्याय की शैली में अतिव्याप्ति-अव्याप्ति एवं असंभव के निष्कृष्ट लक्षण यों हैं—लक्ष्यतावच्छेदक