तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन्यायबोधिनी-कलासंवलित ९ शब्दगुणकमाकाशम् । तच्चैकं, विभु नित्यञ्च । शब्द जिसका गुण है, ऐसा द्रव्य आकाश है। वह एक, विभु और नित्य है। न्यायबोधिनी आकाशं लक्षयति—शब्दगुणकमिति । गुणपदमाकाशे शब्द एव विशेषगुण इति द्योतनाय न त्वतिव्याप्तिवारणाय, समवायेन शब्दवत्त्वमात्र- स्य सम्यक्त्वात् । तच्चैकमिति । अनेकत्वे मानाभावादिति भावः । विभ्विति । सर्वमूर्तद्रव्य- संयोगित्वं विभुत्वम् । मूर्तत्वं च क्रियावत्त्वम् । पृथिव्यप्तेजोवायुमनांसि मूर्तानि । पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशेतिपञ्चकं भूतपदवाच्यम् । भूतत्वं नाम बहिरिन्द्रियग्राह्यविशेषगुणवत्त्वम् । हिन्दी-कला के अधिकरण में रहते हुए लक्ष्यतावच्छेदकावच्छिन्नप्रतियोगिताक-भेद के अधिकरण में भी लक्षण का रहना अतिव्याप्ति है। अर्थात् लक्ष्य में रहते हुए लक्ष्य से भिन्न में भी लक्षण का रहना अतिव्याप्ति है। लक्ष्यतावच्छेदक के अधिकरण में रहनेवाला जो अभाव, उसका प्रतियोगी होना अव्याप्ति है। अर्थात् लक्ष्य में ही कहीं लक्षण का अभाव रहना अव्याप्ति है। और लक्ष्यतावच्छेदक का व्यापकीभूत जो अभाव, उसका प्रतियोगी होना असंभवदोष है। अर्थात् लक्ष्यमात्र में जिस लक्षण का अभाव हो, वह लक्षण असंभवदोष से ग्रस्त है। ‘शब्दगुणकत्व’ आकाश का लक्षण है। अर्थात् शब्द जिसका गुण है, वह आकाश है। यद्यपि ‘शब्द गुण है’ यह बात सुप्रसिद्ध ही है, अतः शब्द को गुण शब्द से यहाँ उल्लेख करना अनावश्यक है, तथापि “आकाश में शब्द ही एकमात्र विशेषगुण है” यह सूचित करने के लिये ही गुण पद कहा है, न कि कहीं अतिव्याप्ति का वारण करने के लिये। क्योंकि अतिव्याप्तिवारण के लिये तो ‘समवायसम्बन्ध से शब्दाश्रयत्व’ मात्र ही लक्षण पर्याप्त होता। वह आकाश एक है और विभु है, क्योंकि अनेक होने में कोई प्रमाण नहीं है। सभी मूर्त-द्रव्यों के साथ संयुक्त होना विभुत्व है। क्रियायुक्त होना मूर्तत्व है। क्रिया- युक्त होने के कारण पृथिवी, जल, तेज, वायु और मन ये पांच मूर्त द्रव्य कहे जाते हैं। अब तक पृथिवी-जल-तेज-वायु और आकाश के लक्षण किये गये। पृथिवी आदि पांच ‘भूत’ पद से कहे जाते हैं। जिसका विशेषगुण बहिरिन्द्रिय से (चक्षुरादि से) ग्राह्य हो, वह भूत है। जैसे, पृथिवी का विशेषगुण गन्ध घ्राणरूप-बाह्येन्द्रिय से गृहीत होने के कारण पृथिवी भूत है। इसी प्रकार जल, तेज, वायु और आकाश को भी भूत सम- झना चाहिये।