भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ११ सुखाद्युपलब्धिसाधनमिन्द्रियं मनः । तच्च प्रत्यात्मनियतत्वा- दनन्तं परमाणुरूपं नित्यञ्च । चक्षुर्मात्रग्राह्यो गुणो रूपम् । तच्च शुक्ल-नील-पीत-रक्त- हरित-कपिश-चित्रभेदात् सप्तविधम् । पृथिवीजलतेजोवृत्ति । तत्र पृथिव्यां सप्तविधम् । अभास्वरशुक्लं जले । भास्वरशुक्लं तेजसि । सुख दुःख आदि की उपलब्धि ( प्रत्यक्ष ) का साधनभूत इन्द्रिय मन है । वह मन प्रत्येक आत्मा के साथ नियत ( संबद्ध ) होने के कारण अनन्त है, परमाणुरूप और नित्य है । केवल चक्षुरिन्द्रिय से ग्रहण किया जाने वाला गुण रूप है । वह रूप शुक्ल-नील- पीत-रक्त ( लाल ) हरित-कपिश ( भूरा ) और चित्र ( चितकबरा ) के भेद से सात प्रकार का होता है । रूप पृथिवी-जल और तेज में रहता है । पृथिवी में पूर्वोक्त सातों प्रकार का रूप रहता है । जल में नहीं चमकने वाला शुक्ल रूप रहता है और तेज में चमकने वाला शुक्ल रूप रहता है । न्यायबोधिनी आत्मानं निरूपयति—ज्ञानाधिकरणमिति । अधिकरणपदं समवायेन ज्ञानाश्रयत्वलाभार्थम् । मनो निरूपयति-सुखादीति । उपलब्धिर्नाम साक्षात्कारः । तथा च सुख- दुःखादिसाक्षात्कारकारणत्वे सति इन्द्रियत्वम् मनसो लक्षणम् । इन्द्रियत्वमा- त्रोक्तौ चक्षुरादावतिव्याप्तिरतः सुखादिसाक्षात्कारकारणत्वविशेषणम् । विशेष्यानुपादाने आत्मन्यतिव्याप्तिः, आत्मनः सुखादिकं प्रति समवायि- कारणत्वात् । अत इन्द्रियत्वरूपविशेष्योपादानम् । हिन्दी-कला 'ज्ञानाधिकरणत्व' यह आत्मा का लक्षण है । यहाँ अधिकरणपद देने से समवाय सम्बन्ध से ज्ञानाश्रयत्व का लाभ होता है। अन्यथा ज्ञान का सम्बन्धी तो विषय भी है, किन्तु वह आत्मा नहीं है । सुखादि के साक्षात्कार का साधन इन्द्रिय मन है। अर्थात् सुख दुःखादि के साक्षा- त्कार का कारण होते हुए इन्द्रिय होना मनका लक्षण है। यहाँ लक्षण में यदि इन्द्रित्व- मात्र कहा जाय तो चक्षुः आदि में भी मन का लक्षण अतिव्याप्त हो जायगा । अतः इस अतिव्याप्ति के निवारणार्थ "सुखादि-साक्षात्कार-कारणत्व" यह विशेषण दिया । यदि इन्द्रियत्वरूप विशेष्य का सन्निवेश न किया जाय तो आत्मा में भी मनलक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । क्योंकि सुखादि के प्रति आत्मा के समवायिकारण होने से वह भी सुखादि के साक्षात्कार में हेतु होता ही है । इस अतिव्याप्ति दोष के निवा-