भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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न्यायबोधिनी-कलासंवलितः १५ हिन्दी-कला इन्द्रिय से ग्राह्य होती है" इस नियम के अनुसार रूपत्व-जाति भी चक्षुर्मात्रग्राह्य है। अतः रूपत्व में रूपलक्षण की अतिव्याप्ति का वारण करने के लिये 'गुणत्व' यह विशेष्य कहा। रूपत्व तो गुण नहीं है, किन्तु एक जाति है। यहाँ रूपलक्षण में चक्षुर्मात्रग्राह्यत्व का अर्थ है—चक्षु से भिन्न जो रसना-घ्राण आदि इन्द्रियाँ हैं, उनसे अग्राह्य होते हुए चक्षु से ग्राह्य होना। इतना अर्थ मात्रपद के देने से निकलता है। यदि मात्रपद न दिया जाय तो संख्या आदि सामान्यगुणों में रूपलक्षण की अतिव्या प्त हो जायगी। क्योंकि 'चक्षुर्ग्राह्यगुणत्व' संख्यादि में भी है। अतः इस दोष के निवारणार्थ मात्रपद दिया। क्योंकि संख्यादि सामान्यगुण चक्षु से भिन्न त्वगिन्द्रिय से भी ग्राह्य होने से चक्षुर्मात्र ग्राह्य नहीं है। अतीन्द्रिय गुरुत्वादि- गुण में लक्षण की अतिव्याप्ति न हो, इसके लिए चक्षुर्ग्राह्यत्व पद दिया। गुरुत्वगुण तो चक्षुर्ग्राह्य नहीं है। इस लक्षण में ग्राह्यत्व का अर्थ है 'प्रत्यक्ष का विषय होना' तथा अग्राह्यत्व का अर्थ है 'प्रत्यक्ष का अविषय होना'। इस प्रकार "चक्षु से भिन्न जो घ्राणादि इन्द्रिय, उससे जन्य प्रत्यक्षका जिसमें अविषयत्व हो तथा चक्षुरिन्द्रियजन्य प्रत्यक्ष का विषयत्व जिस गुण में हो, वह रूप है। यह रूपलक्षण का फलितार्थ है। शङ्का—उक्त लक्षण की अतिव्याप्ति प्रभा-घट के संयोग में हो जायगी, क्योंकि प्रभाघट का संयोग भी चक्षुर्मात्रग्राह्य गुण है। समाधान—लक्षण में गुणपद के विशेषगुणपरक होने से यह दोष नहीं होगा। क्योकि संयोग विशेषगुण नहीं है। शङ्का—लक्षण में विशेषगुणत्व का निवेश करने पर संख्या आदि सामान्यगुण में स्वतः अतिव्याप्ति न होगी, ऐसी स्थिति में चक्षुर्मात्रग्राह्यत्व न कहकर 'चक्षुर्ग्राह्यत्व' इतना ही कहना चाहिये, मात्रपद व्यर्थ है। समाधान —जलमात्र में रहनेवाले सांसिद्धिकद्रवत्व में रूपलक्षण की अति- व्याप्ति के वारण के लिये मात्रपद का उपादान आवश्यक है। अन्यथा सांसिद्धिक- द्रवत्व के विशेषगुण होने से मात्रपद के बिना उसमें अतिव्याप्ति का निवारण न हो पाता। अथवा जो जाति चक्षुर्मात्र से ग्राह्य हो, तादृशजातिमद् ( जातिविशिष्ट ) गुणत्व रूप का लक्षण है। अतः गुणपद को विशेषगुणपरक माने बिना भी प्रभाघटसयोग में रूपलक्षण की अतिव्याप्ति न होगी। क्योंकि संयोगत्वजाति चक्षुर्मात्रग्राह्य जाति नहीं है। कारण, प्रभाघटसंयोग भले ही चक्षुर्मात्रग्राह्य हो किन्तु तद्गत संयोगत्व- जाति चक्षुर्मात्रग्राह्य नहीं है। क्योंकि घट और पट का संयोग चक्षु से भी ग्राह्य होता है ओर त्वगिन्द्रिय से भी ग्राह्य होता है। अतः उस संयोग में रहनेवाली संयोगत्वजाति भी त्वगिन्द्रिय ग्राह्य होगी। क्योंकि "जो गुण जिस इन्द्रिय से गृहीत होता है, उसमें रहनेवाली जाति भी उस इन्द्रिय से ग्राह्य होती है" यह नियम है।