भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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न्यायबोधिनी-कलासंबलितः १९ चूर्णादिपिण्डीभावहेतुर्गुणः स्नेहः । जलमात्रवृत्तिः । श्रोत्रग्राह्यो गुणः शब्दः । आकाशमात्रवृत्तिः । स द्विविधः- में अग्निसंयोग से द्रवत्व उत्पन्न होता है तथा सुवर्ण आदि तेज में भी अत्यन्त अग्नि- संयोग से द्रवत्व उत्पन्न होता है । चूर्ण आदि के पिण्डीभाव ( बन्धन ) का हेतु जो गुण, वह स्नेह है । वह जलमात्र में रहता है । श्रोत्र-इन्द्रिय से ग्रहण-योग्य गुण शब्द है । वह आकाशमात्र में रहता है । न्यायबोधिनी पूर्ववदेव योज्यम् । स्नेहं लक्षयति-चूर्णादीति । चूर्णादिपिण्डीभावहेतुत्वे सति गुणत्वं स्नेहस्य लक्षणम् । पिण्डीभावो नाम-चूर्णादेर्धारणाकर्षणहेतुभूतो विलक्षणः संयोगः । तादृशसंयोगे स्नेहस्यैवासाधारणकारणत्वं न तु जलादिगतद्रवत्वस्य । तथा सति द्रुतसुवर्णादिसंयोगेन चूर्णादेः पिण्डीभावापत्तेरतः स्नेह एवासाधारणं कारणम् । विशेषणमात्रोपादाने कालादावतिव्याप्तिरतस्तद्वारणाय विशेष्योपादानम् । वस्तुतस्तु द्रुतजलसंयोगस्यैव पिण्डीभावहेतुत्वं, स्नेहस्य हेतुत्वे मानाभावात् । जले द्रुतत्वविशेषणात् करकादिव्यावृत्तिः । शब्दं लक्षयति-श्रोत्रेति । शब्दत्वेऽतिव्याप्तिवारणाय 'गुण' इति । हिन्दी-कला चूर्णादि के पिण्डीभाव का हेतु होते हुए गुणत्व स्नेह का लक्षण है। पिण्डीभाव का अर्थ है- चूर्णादि को एक में परस्पर बाँधने और उसके आकर्षण का हेतुभूत विलक्षण संयोग । ऐसे विलक्षण संयोग के प्रति स्नेह ही असाधारण कारण है, न कि जला- दिगत द्रवत्व कारण है । क्योंकि द्रवत्व के कारण होने पर पिघले हुए सुवर्णादि के संयोग से भी चूर्ण में पिण्डीभाव होना चाहिये, किन्तु वैसा नहीं होता है। अतः पिण्डी- भाव के प्रति स्नेह ही असाधारण कारण है। इस लक्षण में यदि विशेषणमात्र का उपादान हो तो कालादि में भी स्नेह लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी, अतः उसके वारण के लिये 'गुणत्व' इस विशेष्यपद का ग्रहण किया गया । काल में गुणत्व-धर्म नहीं है। वस्तुतः तो पिघले हुए जल का संयोग ही पिण्डीभाव का हेतु है, क्योंकि स्नेह के हेतु होने में प्रमाण नहीं है। कारण, यदि स्नेह पिण्डीभाव का हेतु हो तो ओले में भी जल होने से स्नेह है, तब ओले से भी सक्तु आदि का पिण्ड बन जाना चाहिये । जल में 'द्रुतत्व' इस विशेषण के देने से ओले आदि की व्यावृत्ति हो जायगी । ऐसी स्थिति में स्नेह का कुछ और ही लक्षण करना होगा । मूलोक्त शब्दलक्षण में गुणपद का उपादान शब्दत्व में अतिव्याप्ति का वारण