तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः परापरव्यवहारासाधारणकारणे परत्वापरत्वे । पृथिव्यादिच- तुष्टयमनोवृत्तिनी । ते च द्विविधे दिक्कृते कालकृते चेति । दूरस्थे दिक्कृतं परत्वम् । समीपस्थे दिक्कृतमपरत्वम् । ज्येष्ठे कालकृतं परत्वम् । कनिष्ठे कालकृतमपरत्वम् । आद्यपतनासमवायिकारणं गुरुत्वम् । पृथिवीजलवृत्ति । आद्यस्यन्दनासमवायिकारणं द्रवत्वम् । पृथिव्यप्तेजोवृत्ति । तद्द्विविधम्—सांसिद्धिकं नैमित्तिकञ्च । सांसिद्धिकं जले । नैमित्तिकं पृथिवीतेजसोः । पृथिव्यां घृतादावग्निसंयोगजं द्रवत्वम् । तेजसि सुवर्णादौ । पर-( दूर या ज्येष्ठ-) व्यवहार का असाधारण कारण परत्व है और अपर- ( समीप या कनिष्ठ-) व्यवहार का असाधारण कारण अपरत्व है । वे परत्व और अपरत्व-गुण पृथिवी आदि ( पृथिवी-जल-तेज-वायु ) चार एवं मन में रहते हैं। परत्व-अपरत्व दो दो प्रकार के होते हैं — दिक्कृत और कालकृत । दूरस्थ वस्तु में दिक्कृत परत्व होता है । समीपस्थ वस्तु में दिक्कृत अपरत्व होता है । ज्येष्ठ में कालकृत परत्व होता है । कनिष्ठ में कालकृत अपरत्व होता है । आद्यपतन का असमवायिकारण गुण गुरुत्व है । वह पृथिवी और जल में रहता है । आद्यस्यन्दन का असमवायिकारण गुण द्रवत्व है । वह पृथिवी, जल और तेज में रहता है । द्रवत्व दो प्रकार का होता है—सांसिद्धिक और नैमित्तिक । सांसिद्धिक- द्रवत्व जल में और नैमित्तिक-द्रवत्व पृथिवी और तेज में रहता है । घृत आदि पृथिवी न्यायबोधिनी व्याप्तिस्तद्वारणाय गुणत्वमिति विशेष्योपादानम् । गुरुत्वं लक्षयति आद्येति । द्वितीयपतनक्रियायां वेगस्यासमवायिका- रणत्वात्तत्रातिव्याप्तिवारणायाद्येति । उत्तरत्र स्यन्दने आद्यविशेषणमपि हिन्दी-कला व्याप्ति हो जायगी, इसके निवारण के लिये 'गुणत्व' इस विशेष्य का उल्लेख किया । क्रिया में गुणत्वधर्म नहीं होने से अतिव्याप्ति नहीं हुई । आद्यपतन का असमवायिकारण होते हुए गुणत्व गुरुत्व का लक्षण है । द्वितीय पतन का असमवायिकारण गुण वेग भी है, अतः वेग में लक्षण की अतिव्याप्ति का वारण करने के लिये 'आद्य' यह पतन का विशेषण दिया । आगे द्रवत्व के लक्षण में भी स्यन्दन में 'आद्य' विशेषण देने का प्रयोजन समझना चाहिये ।