भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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न्यायबोधिनी-कलासंवलितः १७ एकत्वादिव्यवहारहेतुः संख्या। सा नवद्रव्यवृत्तिः, एकत्वादि- परार्धपर्य्यन्ता। एकत्वं नित्यमनित्यञ्च। नित्यगतं नित्यमनित्यग- तमनित्यम्। द्वित्वादिकन्तु सर्वत्रानित्यमेव। मानव्यवहारासाधारणं कारणं परिमाणम्। नवद्रव्यवृत्ति। तच्चतुर्विधम्—अणु, महत्, दीर्घं, ह्रस्वं चेति। पृथग्व्यवहारासाधारणकारणं पृथक्त्वम्। सर्वद्रव्यवृत्ति। संयुक्तव्यवहारहेतुः संयोगः सर्वद्रव्यवृत्तिः। संयोगनाशको गुणो विभागः। सर्वद्रव्यवृत्तिः। एकत्व द्वित्व आदि व्यवहार का हेतुभूत गुण संख्या है। वह पृथिवी आदि नवों द्रव्यों में रहती है। एकत्व से लेकर परार्धपर्य्यन्त संख्या व्यवहार में आती है। एकत्व-संख्या नित्य भी है और अनित्य भी है। नित्य में रहने वाली एकत्व-संख्या नित्य है तथा अनित्य में रहने वाली एकत्व-संख्या अनित्य है। द्वित्व आदि संख्या तो सर्वत्र अनित्य ही है, क्योंकि द्वित्वादि-संख्या अपेक्षाबुद्धि से जन्य होती है। मान-(माप-) व्यवहार का असाधारण कारण जो गुण, वह परिमाण है। वह नवों द्रव्यों में रहता है, परिमाण चार प्रकार का होता है—अणु-महत्-दीर्घ और ह्रस्व। पृथक्-व्यवहार का असाधारण कारण जो गुण, वह पृथक्त्व है। पृथक्त्व-गुण सभी द्रव्यों में रहता है। संयुक्त व्यवहार का हेतुभूत गुण संयोग है। वह सभी द्रव्यों में रहने वाला है। संयोग का नाश करने वाला गुण विभाग है। विभागनामक गुण सभी द्रव्यों में रहता है। न्यायबोधिनी विभागं लक्षयति संयोगेति। संयोगनाशकत्वविशिष्टगुणत्वं विभागस्य लक्षणम्। विशेषणमात्रोपादाने क्रियाया अपि संयोगनाशकत्वात् तत्राति- हिन्दी-कला और वैसे परमाणु से वैसा ही दुग्ध का द्व्यणुक पैदा होता है। और वैसे द्व्यणुक से वैसा ही त्र्यणुक चतुरणुकादि क्रम से महादुग्ध का आरम्भ हो जाता है। ऐसे दुग्धा- रम्भक परमाणुओं से ही दधिका आरम्भ और पाक की महिमा से दधि के आरम्भक परमाणुओं से नवनीत घृत आदि उत्पन्न होते हैं। संयोगनाशकत्वविशिष्ट-गुणत्व विभाग का लक्षण है। लक्षण में विशेषणमात्र कहने पर क्रिया भी संयोग की नाशिका होती है, अतः उसमें विभागलक्षण की अति- २