भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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१६ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः न्यायबोधिनी तृणारम्भकपरमाणुषु विजातीयतेजःसंयोगात् पूर्वरूपादिचतुष्टयनाशे तदन- न्तरं दुग्धे यादृशं रूपादिकं वर्तते, तादृशरूपरसगन्धस्पर्शजनकास्तेजःसंयोगाः जायन्ते । तदुत्तरं तादृशरूपरसादय उत्पद्यन्ते । तादृशरूपरसादि- विशिष्टपरमाणुभिर्दुग्धद्वयणुकमारभ्यते, ततस्त्र्यणुकादिक्रमेण महादुग्धा- रम्भः । एवं दुग्धारम्भकैः परमाणुभिरेव दध्यारभ्यते । एवं पाकमहिम्ना दध्यारम्भकैरेव परमाणुभिर्नवनीतादिकमिति दिक् । हिन्दी-कला रूप-रस-गन्ध और स्पर्श ये चारों गुण पृथिवी में पाकज (पाक से होनेवाले) एवं अनित्य हैं । इसका स्पष्टीकरण यों है—विलक्षण तेज का संयोग पाक है। यह तेजः- संयोग भी विलक्षण ही होता है, जिससे रूप में ही नील-पीत आदि अनेकविध रूप की उत्पत्ति होती है । ऐसे ही रूपजनक तेज संयोग की अपेक्षा रसजनक तेजः- संयोग विलक्षण ही होता है । ऐसे ही गन्धजनक तेजःसंयोग उससे विलक्षण और स्पर्शजनक तेजःसंयोग उससे विलक्षण होता है । इस प्रकार कार्य की विलक्षणता को देखते हुए भिन्न-भिन्न जाति के विलक्षण पाकों ( तेजःसंयोगों ) की कल्पना की जाती है । जैसे, तृण की ढेर में रखे किसी आम आदि फल में ऊष्मानामक विलक्षण तेज के संयोग से पूर्व हरो रूप का नाश होकर पीले रूप की उत्पत्ति हो जाती है, किन्तु रस ज्यों का त्यों खट्टा ही रह जाता है, क्योंकि उसमें खट्टापन का ही अनुभव होता है । कहीं तो पूर्व हरितरूप ज्यों का त्यों रह जाता है और रस में परिवर्तन हो जाता है । क्योंकि वहाँ विजातीय तेजःसंयोगरूप पाक के कारण खट्टे रस के नाश से मधुर रस का ही अनुभव होता है । इससे यह स्वीकार करना पड़ता है कि रूपजनक पाक की अपेक्षा रसजनक पाक विलक्षण है । ऐसे ही गन्धजनक तेजःसंयोग भी विलक्षण ही होता है । क्योंकि रूप-रस के नहीं बदलने पर भी पूर्वगन्ध का नाश होकर सुरभिगन्ध की उत्पत्ति देखी जाती है । एवं स्पर्शजनक भी पाक विलक्षण ही है । क्योंकि वहाँ कठिनस्पर्श का नाश होकर मृदुस्पर्श की अनुभूति होती है । इसलिये रूपादि के जनक पाक विलक्षण ही होते हैं । इसीलिये पार्थिव परमाणु के समान होने पर भी पाक की महिमा से विजातीय द्रव्यान्तर का अनुभव होता है । जैसे गायद्वारा चर्वित तृण आदि का परमाणुपर्यन्त भंग हो जाने पर तृण के उत्पादक परमाणुओं में विजातीय तेजःसंयोग से पूर्व के रूप-रस-गन्ध और स्पर्श नष्ट हो जाते हैं और बाद में दूध के अनुरूप रूप-रस-गन्ध-स्पर्श के जनक तेजःसंयोग पैदा होने के बाद दूध के परमाणुओं में रूप-रस-गन्ध और स्पर्श पैदा हो जाते हैं ।