तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन्यायबोधिनी-कलासंबलितः २१ संस्कारमात्रजन्यं ज्ञानं स्मृतिः । तद्भिन्नं ज्ञानमनुभवः । स द्विविधः—यथार्थोऽयथार्थश्च । संस्कारमात्र से उत्पन्न होने वाला ज्ञान स्मृति है । और स्मृति से भिन्न ज्ञान अनुभव है । अनुभव दो प्रकार का होता है—यथार्थ और अयथार्थ । न्यायबोधिनी स्मृतिं लक्षयति—संस्कारेति । संस्कारमात्रजन्यत्वविशिष्टज्ञानत्वं स्मृते- र्लक्षणम् । विशेषणानुपादाने प्रत्यक्षानुभवेऽतिव्याप्तिरतस्तद्वारणाय विशे- षणोपादानम् । संस्कारध्वंसेऽतिव्याप्तिवारणाय विशेष्योपादानम् । ध्वंसं प्रति प्रतियोगिनः कारणत्वात् संस्कारध्वंसेऽपि संस्कारजन्यत्वस्य सत्त्वात् । प्रत्यभिज्ञायामतिव्याप्तिवारणाय मात्रपदम् । अनुभवं लक्षयति—तद्भिन्नमिति । तद्भिन्नत्वं नाम स्मृतिभिन्नत्वम् । तथा च स्मृतिभिन्नत्वविशिष्टज्ञानत्वमनुभवस्य लक्षणम् । तत्र विशेषणानु- पादाने स्मृतावतिव्याप्तिः, * विशेष्यानुपादाने घटादावतिव्याप्तिरतस्तद्- वारणाय विशेषणविशेष्ययोरुभयोरुपादानम् । अनुभवं विभजते—स द्विविध इति । हिन्दी-कला 'संस्कारमात्रजन्यत्वविशिष्ट ज्ञानत्व' यह स्मृति का लक्षण है । यहाँ विशेषण का ग्रहण न करने पर प्रत्यक्ष अनुभव में अतिव्याप्ति हो जायगी, अतः उसे रोकने के लिये 'संस्कारमात्रजन्यत्व' विशेषण दिया । संस्कार के ध्वंस में स्मृतिलक्षण की अतिव्याप्ति न हो जाय, इसके लिये 'ज्ञानत्व' इस विशेष्य का उपादान किया । कारण, ध्वंस के प्रति प्रतियोगी कारण होता है, इसलिये संस्कार-ध्वंस में भी संस्कार- जन्यत्व के होने से उसमें स्मृति-लक्षण की अतिव्याप्ति हो जाती । अतः 'ज्ञान' पद देना आवश्यक है । प्रत्यभिज्ञा भी संस्कारजन्य होती है, अतः उसमें अतिव्याप्ति- वारण के लिये मात्रपद दिया । प्रत्यभिज्ञा के प्रति संस्कार के साथ-साथ बहिरिन्द्रियाँ भी कारण होती हैं, अतः प्रत्यभिज्ञा संस्कारमात्रजन्य नहीं हुई । संस्कारमात्र- जन्यत्व का अर्थ है—"बहिरिन्द्रियाजन्यत्वे सति संस्कारजन्यत्व ।” स्मृति से भिन्न ज्ञान अनुभव है । इस प्रकार 'स्मृतिभिन्नत्वविशिष्ट ज्ञानत्व' अनुभव का लक्षण है। इसमें 'स्मृतिभिन्नत्व' विशेषण नहीं देने पर स्मृति में लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । 'ज्ञानत्व' रूप विशेष्य न देने पर घटादि में अतिव्याप्ति हो जायगी । इसलिये इन अतिव्याप्तियों का वारण करने के लिये विशेषण-विशेष्य दोनों का उपादान किया गया । अनुभव दो हैं—यथार्थानुभव और अयथार्थानुभव ।