तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्ष परिच्छेदः तद्वति तत्प्रकारकोऽनुभवो यथार्थः । सैव प्रमेत्युच्यते । तद्वान् ( उससे युक्त ) में तत्प्रकारक ( उसे विशेषण बनाने वाला ) अनुभव यथार्थानुभव है । जैसे, रजत में ( रजतत्व से युक्त में ) "इदं रजतम्" यह रजतत्व- प्रकारक ( रजतत्व-धर्म को विशेषण बनाने वाला ) ज्ञान ( अनुभव ) यथार्थानुभव है । यथार्थ अनुभव ही प्रमा शब्द से कहा जाता है । न्यायबोधिनी यथार्थानुभवं लक्षयति—तद्वतीति । तद्वतीत्यत्र सप्तम्यर्थो विशेष्य- त्वम् । तच्छब्देन प्रकारीभूतो धर्मो धर्तव्यः । तथा च तद्वद्विशेष्यकत्वे सति तत्प्रकारकानुभवत्वं यथार्थानुभवस्य लक्षणमित्यर्थः । उदाहरणम्-रजते 'इदं रजतमिति' ज्ञानम् । अत्र रजतत्ववद्विशेष्यकत्वे सति रजतत्वप्रकारकत्वस्य सत्त्वाल्लक्षणसमन्वयः । तद्वन्निष्ठविशेष्यतानि- रूपिततन्निष्ठप्रकारताशालित्वमिति तु निष्कर्षः । अन्यथा यथाश्रुते रङ्गरजतयोरिमे रजतरङ्गे इत्याकारकसमूहालम्बन- भ्रमेऽतिव्याप्तिः, तत्रापि रजतत्ववद्विशेष्यकत्वरजतत्वप्रकारकत्वयोः रङ्ग- त्ववद्विशेष्यकत्वरङ्गत्वप्रकारकत्वयोः सत्त्वात् । हिन्दी-कला तद्वति तत्प्रकारक अनुभव यथार्थ अनुभव कहाता है । 'तद्वति' यहां सप्तमी- विभक्ति का अर्थ विशेष्यत्व है । तथा 'तत्' शब्द से प्रकारीभूत ( विशेषणीभूत ) धर्म लेना चाहिये । इस प्रकार "तद्वद्विशेष्यकत्वे सति तत्प्रकारकानुभवत्व" यह यथार्थानुभव का लक्षण बना । इसका उदाहरण—रजत में 'इदं रजतम्' यह ज्ञान है । अर्थात् यह ज्ञान यथार्थ अनुभव है । क्योंकि रजतत्ववद्विशेष्यक होते हुए रजतत्व- प्रकारक होने से इस ज्ञान में यथार्थानुभव का उपर्युक्त लक्षण समन्वित ( घटित ) हो जाता है । नव्यन्याय की पद्धति में उक्त लक्षण का निष्कर्ष यों होता है—तद्वत्-निष्ठ- विशेष्यता-निरूपिता जो तन्निष्ठ प्रकारता, तादृश प्रकारताशाली जो ज्ञान, वह यथार्थानुभव है। इसका विशेष विवेचन 'संस्कृत-कला' व्याख्या में द्रष्टव्य है । लक्षण के इस निष्कृष्ट स्वरूप के न मानने पर अर्थात् मूलोक्त लक्षण को ही ज्यों का त्यों स्वीकार कर लेने पर क्रमशः सम्मुख वर्तमान रङ्ग (रांगा) और रजत में उलट कर 'इमे रजतरङ्गे' इस समूहालम्बन भ्रमज्ञान में यथार्थानुभवलक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । क्योंकि भले ही इस ज्ञान में रङ्ग को रजत समझ लिया गया है, और रजत को रङ्ग समझ लिया गया है ( कारण दोनों की चमक एक सी है ) फिर भी सामूहिक रूप में यह ज्ञान रजतत्वद्विशेष्यक भी है और रजतत्व- प्रकारक भी है तथा रङ्गत्ववद्विशेष्यक भी है और रङ्गत्वप्रकारक भी है ।