तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
पृष्ठ 42, कुल 199 में से
संदर्भ में पढ़ेंन्यायबोधिनी-कलासंवलित २१ तदभाववति तत्प्रकारकोऽनुभवोऽयथार्थः । उसके अभाव वाले मे अर्थात् जहाँ उसका अभाव है, उसी में तत्प्रकारक (उसे विशेषण बनाने वाला) अनुभव अयथार्थ अनुभव कहलाता है। अयथार्थ अनुभव ही 'अप्रमा' शब्द से व्यवहृत होता है। न्यायबोधिनी उक्तनिष्कर्षे तु नातिव्याप्तिः, तज्ज्ञानस्य रजतत्वप्रकारताया रजतत्व- वद्विशेष्यतांनिरूपितत्वाभावात्, एवं रङ्गत्वप्रकारताया रङ्गत्ववद्विशेष्य- तानिरूपितत्वाभावात्। किन्तु समूहालम्बनभ्रमस्य रङ्गांशे रजतत्वावगा- हित्वेन रजतत्वप्रकारताया रङ्गत्ववद्विशेष्यतानिरूपितत्वात् । एवं रजतांशे रङ्गत्वावगाहित्वेन रङ्गत्वप्रकारताया रजतत्ववद्विशेष्यतानिरूपितत्वा- च्चेति। नानामुख्यविशेष्यताशालिज्ञानं समूहालम्बनम् । अयथार्थानुभवं लक्षयति—तदभाववतीति । अत्रापि पूर्ववन् तदभावव- न्निष्ठविशेष्यतानिरूपिततन्निष्ठप्रकारताशालिज्ञानत्वं विवक्षणीयम् । अन्यथा रङ्गरजतयोरिमे रङ्गरजते इत्याकारकसमूहालम्बनप्रमायामतिव्याप्तिः । हिन्दी-कला उक्त प्रकार का लक्षण का निष्कर्ष होने पर यहाँ अतिव्याप्ति नहीं होगी। क्योंकि उक्त ज्ञान में अपनी अपनी प्रकारता अपनी अपनी विशेष्यता में निरूपित न होकर एक दूसरे की विशेष्यता से निरूपित हो गयी है। अर्थात् रजतत्वनिष्ठा प्रकारता रजतत्ववद्विशेष्यता से निरूपित नहीं है और रङ्गत्वनिष्ठप्रकारता रङ्गत्ववद्- विशेष्यता से निरूपित नही हैं। बल्कि इस समूहालम्बन भ्रम के अन्तर्गत रङ्गांश में रजतत्वप्रकार का अवगाहन होने से रजतत्ववाली प्रकारता रङ्गत्ववदन्निष्ठ विशेष्यता से निरूपित हो गयी है। तथा रजतांश मे रङ्गत्वरूप प्रकार का अवगाहन होने से रङ्गत्व- वाली प्रकारता रजतत्ववदन्निष्ठ विशेष्यता से निरूपित हो गयी है। इस प्रकार उक्त समूहालम्बन ज्ञान में प्रकार-विशेष्य का परस्पर अदला-बदली हो जाने के कारण यह ज्ञान यथार्थानुभव नहीं है। अनेक मुख्य-विशेष्यता वाला ज्ञान समूहालम्बन ज्ञान कहाता है। जैसे “इमे रजतरङ्गे" यहाँ रजत और रङ्ग दो विशेष्य हैं, इसलिये यह ज्ञान समूहालम्बन ज्ञान है। विशेष जानकारी के लिये 'संस्कृत-कला' द्रष्टव्य है। अयथार्थानुभव का लक्षण करते हैं—तदभाववति तत्प्रकारकोऽनुभवो अयथार्थ.' यह। यहाँ भी पूर्वके समान सप्तमी-विभक्ति का अर्थ 'विशेष्यता' है और 'तत्' पदसे प्रकारीभूत (विशेषणीभूत) धर्म लेना चाहिये। इसलिये पूर्व सरणी के अनुसार तदभाववान् में रहने वाली जो विशेष्यता उससे निरूपिता जो तत् में (प्रकारीभूत धर्म में) रहने वाली प्रकारता, तादृश प्रकारताशालिज्ञानत्व" अयथार्थानुभव का लक्षण है। इस प्रकार यदि विशेष्यता और प्रकारता को परस्पर निरूप्यनिरूपक-