तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः यथार्थानुभवश्चतुर्विधः — प्रत्यक्षानुमित्युपमितिशाब्दभेदात् । यथार्थानुभव चार प्रकार का होता है - प्रत्यक्ष-अनुमिति-उपमिति और शाब्द- ज्ञान के भेद से । न्यायबोधिनी एतत्समूहालम्बनस्य रङ्गरजतोभयविशेष्यकत्वेन रजतत्वरङ्गत्वोभयप्रकार- कत्वेन च रजतत्वाभाववद्रङ्गविशेष्यकत्वरजतत्वप्रकारकत्वयो रङ्गत्वभा- ववद्रजतविशेष्यकत्वरङ्गत्वप्रकारकत्वयोश्च सत्त्वात् । उक्तनिष्कर्षे तु तादृशप्रमायाः रजतांशे रजतत्वावगाहित्वेन रङ्गांशे रङ्गत्वत्वावगाहित्वेन च रजतत्वप्रकारताया रजतत्वाभाववद्रङ्गविशेष्यतानिरूपितत्वाभावात्, एवं रङ्गत्वप्रकारताया रङ्गत्वाभाववद्रजतविशेष्यतानिरूपितत्वाभावात् नाति- व्याप्तिः । उदाहरणम्—यथा शुक्तौ इदं रजतमिति । यथार्थानुभवं विभजते — चतुर्विध इति । हिन्दी-कला भावापन्न के रूप में न कहा जाय तो रङ्ग और रजत में "इमे रङ्गरजते" इस आकार वाले समूहालम्बन प्रमा (यथार्थ अनुभव में) उपर्युक्त अयथार्थानुभवलक्षण की अति- व्याप्ति होने लगेगी । क्योकि उक्त समूहालम्बनज्ञान रङ्ग-रजत उभयविशेष्यक है, साथ ही रङ्ग में नहीं रहनेवाला जो रजतत्व, तत्प्रकारक है तथा रजत में नहीं रहने वाला जो रङ्गत्व, तत्प्रकारक भी है । इस तरह व्युत्क्रमदृष्टि से उक्त समूहालम्बन प्रमाज्ञान में रजतत्वाभाववद् जो रङ्ग, तद्विशेष्यकत्व और रजतत्व-प्रकारकत्व चला गया तथा रङ्गत्वाभाववान् जो रजत, तद्विशेष्यकत्व और रङ्गत्वप्रकारकत्व चला गया । अतः "तदभाववति तत्प्रकारकत्व" रूप मूलोक्त लक्षण की अतिव्याप्ति उक्त प्रमाज्ञान में भी हो जाती है । किन्तु उक्त प्रकार से परस्पर निरूप्यनिरूपकभावःपन्न करके परिष्कृत लक्षण करने पर अतिव्याप्ति नहीं होगी । क्योंकि उक्त समूहालम्बनात्मक प्रमाज्ञान में रजतांश में रजतत्व का अवगाहन होने से तथा रङ्गांश में रङ्गत्व का अवगाहन होने से रजतत्व वाली प्रकारता रजतत्वरहित रङ्गनिष्ठ विशेष्यता से निरूपित नहीं हुई तथा रङ्गत्व वाली प्रकारता रङ्गत्वरहित रजतनिष्ठ विशेष्यता से निरूपित नहीं हुई; किन्तु अपने से सम्बद्ध विशेष्यता से ही दोनों प्रकारतायें निरूपित हो रही हैं। इसलिये परिष्कृत लक्षण में अतिव्याप्ति दोष नहीं है । उक्त अयथार्थानुभवलक्षण का उदाहरण (लक्ष्य) शुक्ति में होनेवाला "इदं रजतम्" यह ज्ञान है । यहाँ शुक्ति में रजतत्व धर्म नहीं है और उसमें प्रकार होकर रजतत्व भासित हो रहा है, अतः यह ज्ञान अयथार्थ अनुभव है । अर्थात् अप्रमा है । अयथार्थानुभव (अप्रमा) के भेद बाद में बताये जायेंगे । यहाँ यथार्थानुभव