भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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२६ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः कार्यनियतपूर्ववृत्ति कारणम् । कार्यं प्रागभावप्रतियोगि । कारणं त्रिविधं—समवाय्यसमवायिनिमित्तभेदात् । कार्य से नियत रूप में जो पूर्ववर्ती होता है, उसे कारण कहते हैं । प्रागभाव के प्रतियोगी को कार्य कहते हैं । अर्थात् जिस वस्तु का पहले अभाव होता है और बाद में भाव हो जाता है, वह कार्य है । कारण तीन प्रकार का होता है—समवायिकारण, असमवायिकारण और निमित्तकारण के भेद से । न्यायबोधिनी कारणं लक्षयति- कार्यनियतेति । कार्यं प्रति नियतत्वे सति पूर्ववृत्ति- त्वम् । नियतत्वविशेषणानुपादाने पूर्ववर्तिनो रासभादेरपि घटादिकारणत्वं स्यात्, अतो नियतत्वे सतीति विशेषणम् । नियतपूर्ववर्तिनो दण्डरूपादेरपि घटकारणत्वं स्यादतोऽनन्यथासिद्धपदमपि कारणलक्षणे निवेशनीयम् । दण्ड- रूपादीनां त्वन्यथासिद्धत्वात् । कार्यं लक्षयति—कार्यमिति । प्रागभावप्रतियोगित्वं कार्यस्य लक्षणम् । कार्योत्पत्तेः पूर्वम् 'इह घटो भविष्यति' इति प्रतीतिर्जायते, एतत्प्रतीति- विषयीभूतो योऽभावः स प्रागभावस्तत्प्रतियोगि घटादिरूपं कार्यम् । हिन्दी-कला मूलोक्त कारणलक्षण का अर्थ है—कार्य के प्रति नियत होते हुए उसके पूर्वक्षण में रहना कारणत्व है । अर्थात् जो कार्य के पूर्व में नियमतः रहे, वह कारण है । यहाँ नियतत्व विशेषण न देने पर कदाचित् मट्टी आदि लाने के उपयोग में आया रासभादि भी घटादि का कारण होने लगेगा, अतः नियतत्वे सति यह विशेषण कहा । किन्तु जैसे दण्ड घटके नियत पूर्व में रहता है, वैसे दण्डगत रूप भी दण्ड के साथ ही घट के नियत पूर्व मे वर्तमान रहता है, अतः दण्डरूप भी घट का कारण होने लगेगा : इस दोष का निवारण करने के लिये उक्त कारण लक्षण मे' 'अनन्यथासिद्ध' पद का भी निवेश कर देना चाहिये, दण्ड का रूप तो घट के प्रति अन्यथासिद्ध है । इस प्रकार “अन्यथासिद्धभिन्नत्वे सति कार्य प्रति नियत पूर्ववृत्तित्वम्" यह कारण का निकृष्ट लक्षण हुआ । अन्यथासिद्धों की गणना न्यायसिद्धान्तमुक्तावली आदि ग्रन्थों में की गयी है । 'प्रागभाव-प्रतियोगित्व' कार्य का लक्षण है । कार्य उत्पन्न होने के पूर्व 'इह घटो भविष्यति' ऐसी प्रतीति अनुभवसिद्ध हैं । इस प्रतीति का विषय जो अभाव है, वह प्रागभाव कहाता है । और इस प्रागभाव का प्रतियोगी होने से घट आदि कार्य हैं । 'यस्याभावः स प्रतियोगी' यह प्रतियोगी का स्वरूप है ।

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