भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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न्यायबोधिनी-कलासंवलितः २७ यत्समवेतं कार्यमुत्पद्यते तत् समवायिकारणम् । यथा तन्तवः पटस्य । पटश्च स्वगतरूपादेः । जिसमें समवायसम्बन्ध से रहता हुआ कार्य उत्पन्न होता है, वह उस कार्य के प्रति समवायिकारण होता है । जैसे, तन्तु पट का समवायिकारण होता है और पट अपने रूप का समवायिकारण होता है । न्यायबोधिनी कारणं विभजते - कारणमिति । समवायिकारणमसमवायिकारणं निमित्तकारणञ्चेति । समवायिकारणं लक्षयति-यत्समवेतमिति । यस्मिन् समवेतं सत्-सम वायेन सम्बद्धं सत् कार्यमुत्पद्यते तत्समवायिकारणमित्यर्थः । उदाहरणम्- यथा तन्तव इति । तन्तुषु समवायेन सम्बद्धं सत् पटात्मकं कार्यमुत्पद्यतेऽत- स्तन्तवः समवायिकारणमित्यर्थः । सामान्यलक्षणन्तु-समवायसम्बन्धावच्छिन्नकार्यता निरूपिततादात्म्यस- म्बन्धावच्छिन्नकारणत्वं समवायिकारणत्वमिति । हिन्दी-कला कारण तीन प्रकार के होते हैं-समवायिकारण (उपादानकारण) असमवायि- कारण और निमित्तकारण । जिसमें समवेत होकर अर्थात् समवायसम्बन्ध से सम्बद्ध होता हुआ कार्य पैदा होता है, उसे समवायिकारण कहते हैं। जैसे तन्तु (सूता) में समवायसम्बन्ध से सम्बद्ध ही होकर पटात्मक कार्य पैदा होता है, इसलिये तन्तु पट का समवायिकारण है। समवायिकारण का परिष्कृत सामान्यलक्षण निम्नलिखित है- समवायसम्बन्ध से अवच्छिन्न जो कार्यता, उसमें निरूपित एवं तादात्म्य- सम्बन्ध से अवच्छिन्न कारणत्व ही समवायिकारणत्व है । जैसे समवायेन घटरूपी कार्य का समवायिकारण तादात्म्येन कपाल है। क्योंकि घटरूपी कार्य समवायसम्बन्ध से कपाल में रहता है, और कपाल का कपाल से तादात्म्य है। अतः समवायसम्बन्ध से अवच्छिन्न तथा घटत्वधर्म से अवच्छिन्न जो घटवृत्ति कार्यता है, उससे निरूपित जो तादात्म्यसम्बन्ध से अवच्छिन्ना कारणता, वह कपाल में है। इस प्रकार समवायिकारण के लक्षण का समन्वय कपाल में हो गया। इसी प्रकार पट का समवायिकारण तन्तु बनता है । इसका विशेष स्पष्टीकरण 'संस्कृत-कला' व्याख्या में द्रष्टव्य है । इसी रीति से पट अपने रूप के प्रति समवायिकारण होता है । क्योंकि समवाय- सम्बन्ध से जन्यभावत्वावच्छिन्न (जन्यभावमात्र) के प्रति तादात्म्यसम्बन्ध से द्रव्य ही कारण होता है । जन्यभाव पदार्थ तीन हैं-द्रव्य, गुण और कर्म । अतः द्रव्य, गुण