तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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सप्रकारकं ज्ञानं सविकल्पकम् । यथा डित्थोऽयं ब्राह्मणोऽयं श्यामोऽयमिति । प्रकारता से युक्त ज्ञान सविकल्पक प्रत्यक्ष है । जैसे, यह डित्थ है, यह ब्राह्मण है, यह श्याम है--इत्यादि ज्ञान सविकल्पक प्रत्यक्ष है । क्योंकि यहाँ डित्थत्व-ब्राह्मणत्व- श्यामत्वरूप प्रकार ( विशेषण ) भासित हो रहा है । न्यायबोधिनी प्रकारताशून्यज्ञानत्वमेव निर्विकल्पकत्वमित्यर्थः । निर्विकल्पके चतुर्थी विषयता स्वीक्रियते न तु त्रिविधविषयतामध्ये कापि तत्रास्ति । अतो विशेष्यता- शून्यज्ञानत्वं, संसर्गताशून्यज्ञानत्वमित्यपि लक्षणं संभवति । सविकल्पकं लक्षयति सप्रकारकमिति । विषयताया ज्ञाननिरूपितत्वात् ज्ञानस्य विषयतानिरूपकत्वेन प्रकारतानिरूपकज्ञानत्वं सविकल्पकस्य लक्षणम् । एवं विशेष्यतानिरूपकज्ञानत्वमित्यपि लक्षणं सम्भवति । उदाहरणम्- यथेति । इदन्त्वावच्छिन्नविशेष्यतानिरूपितडित्थत्वप्रकारताशालिज्ञानम्, इद- न्त्वावच्छिन्नविशेष्यतानिरूपितब्राह्मणत्वप्रकारताशालिज्ञानं च सविकल्पक- मित्यर्थः । हिन्दी-कला होता है । इनमें निष्प्रकारक ज्ञान निर्विकल्पक है । अर्थात् प्रकारताशून्यज्ञानत्व निर्विकल्पकत्व है । सविकल्पक ज्ञान में तीन तरह की विषयता होती है-प्रकारताख्य विषयता, विशेष्यताख्य विषयता और संसर्गताख्य विषयता । किन्तु निर्विकल्पक ज्ञान में इन तीनों में कोई भी विषयता नहीं होने से एक विलक्षण चतुर्थी विषयता रहती है । इसीलिए प्रकारताशून्यज्ञानत्व जैसे निर्विकल्पक का लक्षण है, वैसे विशेष्यता- शून्यज्ञानत्व तथा संसर्गताशून्यज्ञानत्व भी लक्षण हो सकता है । जैसे-परस्पर प्रकार- विशेष्यभावरहित 'घटघटत्वे' ऐसा ज्ञान निर्विकल्पक प्रत्यक्ष है । सप्रकारक ज्ञान सविकल्पक प्रत्यक्ष है । घटादि विषय में रहनेवाली विषयता ज्ञान से निरूपित होती है और ज्ञान उस विषयता का निरूपक होता है, प्रकारता- निरूपक ज्ञानत्व सविकल्पक का लक्षण है । अर्थात् प्रकारताख्यविषयतानिरूपक ज्ञानत्व सविकल्पक ज्ञान का लक्षण है । ऐसे ही विशेष्यताख्यविषयतानिरूपक ज्ञानत्व तथा संसर्गताख्यविषयतानिरूपक ज्ञानत्व भी सविकल्पक का लक्षण हो सकता है । क्योंकि सविकल्पक ज्ञान में उक्त तीनों प्रकार की विषयता होती है । सविकल्पक का उदाहरण 'डित्थोऽयम्', 'ब्राह्मणोऽयम्' इत्यादि ज्ञान है । यहाँ इदन्त्वावच्छिन्ना जो विशेष्यता डित्थ तथा ब्राह्मणनिष्ठा है, उससे निरूपिता डित्थत्व