भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ३३ इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्यं ज्ञानं प्रत्यक्षम् [ ज्ञानाकरणकं ज्ञानं प्रत्यक्षम् । ] तद् द्विविधम्—निर्विकल्पकं सविकल्पकञ्चेति । तत्र निष्प्र- कारकं ज्ञानं निर्विकल्पकम् । इन्द्रिय और अर्थ ( विषय ) के संयोग से उत्पन्न ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमा है । [ अथवा ज्ञान जिस ज्ञान में करण न हो, वह ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमा है । प्रत्यक्ष प्रमा में इन्द्रियाँ करण होती हैं ज्ञान नहीं । ] वह दो प्रकार का होता है—सविकल्पक प्रत्यक्ष और निर्विकल्पक प्रत्यक्ष । उन दोनों प्रकार के प्रत्यक्षों में प्रकारता से शून्य ज्ञान को निर्विकल्पक प्रत्यक्ष कहते हैं । जैसे, अन्धकार में अस्पष्ट दिखाई पड़ने वाला "यह कुछ है" ऐसा ज्ञान निर्विकल्पक प्रत्यक्ष है । न्यायबोधिनी प्रत्यक्षप्रमाणलक्षणमुक्त्वा प्रत्यक्षप्रमालक्षणमाह-इन्द्रियार्थसन्निकर्षेति । जन्यप्रत्यक्षस्यैव लक्ष्यत्वमित्यभिप्रायेणेदं लक्षणम् । ज्ञानाकरणकमिति । क्षेपकं लक्षणमिदम् । ज्ञान = व्याप्तिज्ञानं सादृश्यज्ञानं पदज्ञानं च, तदेव करणं येषां तानि ज्ञानकरणकानि, अनुमित्युपमितिशाब्दानि, तद्भिन्नं ज्ञानाकरणकं यज्ज्ञानं तत्त्वम् प्रत्यक्षप्रमाया लक्षणम् । प्रत्यक्षे इन्द्रियाणामेव करणत्वात् न तु ज्ञानस्य करणत्वमिति समन्वयः । इदं लक्षणमीश्वरप्रत्यक्षसाधारणम्, ईश्वरप्रत्यक्षस्य ज्ञानाकरणकत्वात् । प्रत्यक्षं विभजते-निर्विकल्पकमिति । तल्लक्षयति-तत्र निष्प्रकारकमिति । हिन्दी-कला प्रत्यक्षप्रमाण का लक्षण कहने के बाद अब प्रत्यक्षप्रमा का लक्षण मूलकार बताते हैं—इन्द्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न ज्ञान प्रत्यक्षप्रमा है । इस लक्षण का लक्ष्य जन्यप्रत्यक्ष ही हो सकता है, ईश्वरप्रत्यक्ष छूट जायगा । अतः जन्य-नित्य उभय- साधारण लक्षण करते हैं—ज्ञानाकरणक ज्ञान प्रत्यक्ष है । अर्थात् जिस ज्ञान में कोई ज्ञान करण नहीं होता हो, वह ज्ञान प्रत्यक्ष है । जैसे अनुमिति में व्याप्तिज्ञान करण होता है, उपमिति में सादृश्यज्ञान करण होता है तथा शाब्दबोध में पदज्ञान करण होता है । इसलिए उक्त तीनों ज्ञान ज्ञानकरणक हुए । अतः इनसे भिन्न जो ज्ञाना- करणक ज्ञान, तादृशज्ञानत्व ही प्रत्यक्षप्रमा का लक्षण है । प्रत्यक्ष के प्रति इन्द्रिय ही करण होता है, न कि कोई ज्ञान । अतः यह लक्षण प्रत्यक्ष में समन्वित है । जन्यत्व- विशेषणघटित नहीं होने से यह ज्ञानाकरणक-ज्ञानस्वरूप लक्षण ईश्वरप्रत्यक्ष में भी संगत हो जाता है । क्योंकि ईश्वरप्रत्यक्ष भी ज्ञानाकरणक है । निर्विकल्पक प्रत्यक्ष और सविकल्पक प्रत्यक्ष के भेद से प्रत्यक्ष ज्ञान दो प्रकार का ३