भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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३२ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः तत्र प्रत्यक्षज्ञानकरणं प्रत्यक्षम् । उन चारों प्रमाणों में प्रत्यक्ष ज्ञान के प्रति जो करण ( असाधारण कारण ) होता है, वह प्रत्यक्ष प्रमाण है । न्यायबोधिनी घटपटजनकत्वात् । करणलक्षणेऽसाधारणत्वविशेषणानुपादाने ईश्वरादृष्टा- देरपि व्यापारवत्कारणत्वस्य सत्त्वात् तत्रातिव्याप्तिवारणायासाधारणेति विशेषणम् । षड्विधेन्द्रियभूतप्रत्यक्षप्रमाणस्य लक्षणमाह—तत्रेति । प्रमाभूतेषु प्रत्यक्षात्मकं यज्ज्ञानं चाक्षुषादिप्रत्यक्षं, तत्प्रति व्यापारवदसाधारणं कारण- मिन्द्रियं भवति । अतः प्रत्यक्षज्ञानकरणत्वं प्रत्यक्षस्य लक्षणम् । आद्यसन्नि- कर्षातिरिक्तचतुर्विधसन्निकर्षाणां समवायरूपत्वेनेन्द्रियजन्यत्वाभावाद् व्यापारत्वं न संभवतीति इन्द्रियमनःसंयोगस्यैव बाह्यप्रत्यक्षे जननीये इन्द्रिय- व्यापारता बोध्या । मानसप्रत्यक्षे त्वात्ममनःसंयोगस्यैव सा बोध्या । हिन्दी-कला का जनक होने से चक्रभ्रमि आदि व्यापार कहे जाते है । इसी प्रकार कपालसंयोग और तन्तुसंयोग आदि भी कपाल और तन्तु के व्यापार हैं । क्योंकि उक्त संयोग कपाल-तन्तु से उत्पन्न होते हुए कपाल-तन्तु के कार्य घट-पट के जनक भी हैं । करण- लक्षण में 'असाधारणत्व' विशेषण यदि न दिया जाय तो करण-लक्षण की अतिव्याप्ति ईश्वर अदृष्ट आदि साधारणकारण में हो जायगी । क्योंकि ईश्वरादि में भी व्यापारवत्कारणत्व है । ईश्वर-अदृष्ट आदि जगत् के समस्त कार्य के प्रति साधारण कारण हैं । न्यायमत में चक्षु आदि षड्विध इन्द्रियां 'प्रत्यक्षप्रमाण' पद से कही जाती हैं । क्योंकि प्रमा का करण प्रमाण है । चतुर्विध प्रमा के अन्तर्गत प्रत्यक्षात्मक जो ज्ञान चाक्षुष-रासन आदि प्रत्यक्ष हैं, उनके प्रति व्यापारवान् असाधारण कारण इन्द्रियां ही हैं । अतः प्रत्यक्षज्ञानकरणत्वरूप प्रत्यक्षप्रमाण का लक्षण इन्द्रियों में घटित हो गया । इन्द्रिय का व्यापार क्या है ? इसे स्पष्ट करते हैं—प्रत्यक्ष में षड्विध संनिकर्ष कारण होते हैं, इसे आगे बतायेंगे । उनमें आदि सन्निकर्ष जो संयोग है, उससे अति- रिक्त चार सन्निकर्ष समवायरूप होने से इन्द्रियजन्य नहीं होने से व्यापार नहीं बन सकते, अतः इन्द्रिय-मन का संयोग ही बाह्य प्रत्यक्ष को उत्पन्न करने में व्यापार है । मानसप्रत्यक्ष के प्रति तो आत्ममन का संयोग ही व्यापार होता है । ऐसा जानना चाहिये ।