भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ३१ तदुभयभिन्नं कारणं निमित्तकारणम् । यथा तुरीवेमादिकं पटस्य । तदेतत्त्रिविधकारणमध्ये यदसाधारणं कारणं, तदेव करणम् । समवायिकारण और असमवायिकारण से भिन्न जो कारण, वह निमित्तकारण होता है । जैसे, तुरी-वेमा आदि पट का निमित्तकारण होता है । इन तीनों कारणों के मध्य जो असाधारण कारण होता है, वही करण है । न्यायबोधिनी निमित्तकारणं लक्षयति-तदुभयभिन्नमिति । समवायिकारणभिन्नत्वे सति असमवायिकारणभिन्नत्वे सति कारणत्वं निमित्तकारणत्वम् । तदेतदिति । यदसाधारणमिति । व्यापारवत्त्वे सतीत्यपि पूरणीयम् । अन्यथा तन्तुकपालसंयोगयोरतिव्याप्तिः, तन्तुकपालसंयोगयोरपि कार्य्य- त्वातिरिक्तपटत्वघटत्वावच्छिन्नं प्रति कारणत्वादसाधारणत्वमस्त्येवेत्यतस्तत्र करणत्ववारणाय 'व्यापारवत्त्वे सतीति' करणलक्षणे विशेषणं देयम् । व्यापारत्वञ्च तज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनकत्वम् । भवति हि दण्डजन्यत्वे सति दण्डजन्यघटजनकत्वाद् भ्रम्यादेर्व्यापारत्वम् । एवं कपालसंयोगतन्तु- संयोगदेरपि कपालतन्तुव्यापारत्वम्, कपालतन्तुजन्यत्वे सति कपालतन्तुजन्य- हिन्दी-कला मूलोक्त निमित्तकारण के लक्षण को बोधिनीकार स्पष्ट करते हैं- समवायिकारण से भिन्न होते हुए तथा असमवायिकारण से भिन्न होते हुए कारण होना निमित्त- कारण का लक्षण है । जैसे पट के प्रति तुरी-वेम-कुविन्द आदि तथा घट के प्रति दण्ड, चक्र, कुलाल आदि निमित्त कारण हैं । इन त्रिविध कारणों के अन्तर्गत जो असाधारण कारण है, वही कार्य के प्रति करण होता है । करण का लक्षण पूर्व में सविस्तर बताया जा चुका है । उस लक्षण में "व्यापारवत्त्वे सति" इतना जोड़ना आवश्यक है । नहीं तो तन्तु और कपाल के संयोग भी पट और घट के प्रति करण होने लगेंगे । अर्थात् करणलक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । क्योंकि तन्तु-कपालसंयोग कार्यत्व से भिन्न जो पटत्व-घटत्वधर्म, उससे अवच्छिन्न पटघटात्मक कार्य के प्रति कारण होने से असाधारण कारणरूप बन जाते हैं । अतः तन्तु-कपालसंयोग में करणत्व का वारण करने के लिये "व्यापारवत्त्वे सति" यह विशेषण देना चाहिये । ऐसा करण घट के प्रति दण्ड है । "तज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनकत्व" यह व्यापार का लक्षण है । यहाँ 'तत्' पद से करण गृहीत होता है । अर्थात् जो करण से पैदा हो और करण से उत्पन्न होने वाले कार्य का जनक हो, वह व्यापार है । जैसे, दण्ड से जन्य होते हुए दण्ड का कार्य घट