तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः न्यायबोधिनी द्रव्यसमवायिकारणीभूतावयवसंयोगादौ तु समवायसम्बन्धावच्छिन्न- घटत्वावच्छिन्नकार्यतानिरूपिता समवायसम्बन्धावच्छिन्ना कपालद्वयसंयोग- निष्ठा कारणता कपालद्वयसंयोगे वर्तते । एवमाद्यपतनक्रियायामाद्यस्यन्दनक्रियायां च गुरुत्वद्रवत्वे असमवायि- कारणे भवतः । आद्यपतनक्रियां प्रति आद्यस्यन्दनक्रियां प्रति च समवाय- सम्बन्धेनैव तयोः कारणत्वात् । अवयविगुणादौ त्ववयवगुणादेःस्वसमवायि- समवेतत्वसम्बन्धेनैव कारणत्वात्, तत्सम्बन्धावच्छिन्नकारणताश्रयत्वमवय- वगुणादौ वर्तते । अवयवगुण-कपालतन्तुरूपादेः स्वशब्दग्राह्य-कपालरूपतन्तु- रूप-समवायिकपालतन्तुसमवेतत्वसम्बन्धेन घटपटादौ सत्त्वात् । हिन्दी-कला असमवायिकारण के लक्षण को बोधिनीकार उदाहरणान्तर में उपपादित करते हैं- द्रव्यमात्र का समवायिकारण उसके अवयव का संयोग होता है । अतः समवायसम्बन्धा- वच्छिन्ना और घटत्वधर्मावच्छिन्ना जो घटनिष्ठ कार्यता, उससे निरूपिता जो सम- वायसम्बन्धावच्छिन्ना कपालद्वयसंयोगनिष्ठा कारणता, तादृशकारणता कपालद्वय- संयोग में है । अतः घट के प्रति कपालद्वयसंयोग असमवायिकारण हुआ । इसी तरह आद्यपतनक्रिया के प्रति गुरुत्व एवं आद्यस्यन्दन ( बहाव ) क्रिया के प्रति द्रवत्व असमवायिकारण होता है । क्योंकि आद्यपतनक्रिया के प्रति तथा आद्यस्यन्दनक्रिया के प्रति समवायसम्बन्ध से ही क्रमशः गुरुत्व और द्रवत्व कारण होते हैं । किन्तु अवयवी के रूपादि गुण के प्रति अवयव का रूपादि गुण स्वसमवायि- समवेतत्वसम्बन्ध से ही कारण होता है, न कि समवायसम्बन्ध से । अतः स्वसम- वायिसमवेतत्वसम्बन्धावच्छिन्नकारणता का आश्रय अवयवगत रूपादि गुण ही है । क्योंकि अवयव का गुण जो कपाल और तन्तु का रूप है, वह स्वसमवायिसमवेतत्व- सम्बन्ध से स्वशब्द से ग्राह्य कपालरूप और तन्तुरूप, उसका समवायिकारण कपाल और तन्तु में समवेत घट और पट में है । अतः द्वितीय सम्बन्ध अर्थात् स्वसमवायि- समवेतत्वसम्बन्ध से कपाल और तन्तु का रूप घट और पट में है । तथा वहीं समवाय सम्बन्ध से घट-पट का रूप भी रहता है । इस प्रकार उक्त सम्बन्धों के द्वारा कपाल-तन्तुरूप (कारण) तथा घटपटरूप (कार्य) का घट और पट में जाकर सामानाधिकरण्य बन जाता है । अतः कारण और कार्य का सामानाधिकरण्य बन जाने के कारण कपाल और तन्तु का रूप घट और पट के रूप के प्रति असमवायिकारण बन जाता है ।