भारतकोश
संग्रह पर लौटें

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

३० तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः न्यायबोधिनी द्रव्यसमवायिकारणीभूतावयवसंयोगादौ तु समवायसम्बन्धावच्छिन्न- घटत्वावच्छिन्नकार्यतानिरूपिता समवायसम्बन्धावच्छिन्ना कपालद्वयसंयोग- निष्ठा कारणता कपालद्वयसंयोगे वर्तते । एवमाद्यपतनक्रियायामाद्यस्यन्दनक्रियायां च गुरुत्वद्रवत्वे असमवायि- कारणे भवतः । आद्यपतनक्रियां प्रति आद्यस्यन्दनक्रियां प्रति च समवाय- सम्बन्धेनैव तयोः कारणत्वात् । अवयविगुणादौ त्ववयवगुणादेःस्वसमवायि- समवेतत्वसम्बन्धेनैव कारणत्वात्, तत्सम्बन्धावच्छिन्नकारणताश्रयत्वमवय- वगुणादौ वर्तते । अवयवगुण-कपालतन्तुरूपादेः स्वशब्दग्राह्य-कपालरूपतन्तु- रूप-समवायिकपालतन्तुसमवेतत्वसम्बन्धेन घटपटादौ सत्त्वात् । हिन्दी-कला असमवायिकारण के लक्षण को बोधिनीकार उदाहरणान्तर में उपपादित करते हैं- द्रव्यमात्र का समवायिकारण उसके अवयव का संयोग होता है । अतः समवायसम्बन्धा- वच्छिन्ना और घटत्वधर्मावच्छिन्ना जो घटनिष्ठ कार्यता, उससे निरूपिता जो सम- वायसम्बन्धावच्छिन्ना कपालद्वयसंयोगनिष्ठा कारणता, तादृशकारणता कपालद्वय- संयोग में है । अतः घट के प्रति कपालद्वयसंयोग असमवायिकारण हुआ । इसी तरह आद्यपतनक्रिया के प्रति गुरुत्व एवं आद्यस्यन्दन ( बहाव ) क्रिया के प्रति द्रवत्व असमवायिकारण होता है । क्योंकि आद्यपतनक्रिया के प्रति तथा आद्यस्यन्दनक्रिया के प्रति समवायसम्बन्ध से ही क्रमशः गुरुत्व और द्रवत्व कारण होते हैं । किन्तु अवयवी के रूपादि गुण के प्रति अवयव का रूपादि गुण स्वसमवायि- समवेतत्वसम्बन्ध से ही कारण होता है, न कि समवायसम्बन्ध से । अतः स्वसम- वायिसमवेतत्वसम्बन्धावच्छिन्नकारणता का आश्रय अवयवगत रूपादि गुण ही है । क्योंकि अवयव का गुण जो कपाल और तन्तु का रूप है, वह स्वसमवायिसमवेतत्व- सम्बन्ध से स्वशब्द से ग्राह्य कपालरूप और तन्तुरूप, उसका समवायिकारण कपाल और तन्तु में समवेत घट और पट में है । अतः द्वितीय सम्बन्ध अर्थात् स्वसमवायि- समवेतत्वसम्बन्ध से कपाल और तन्तु का रूप घट और पट में है । तथा वहीं समवाय सम्बन्ध से घट-पट का रूप भी रहता है । इस प्रकार उक्त सम्बन्धों के द्वारा कपाल-तन्तुरूप (कारण) तथा घटपटरूप (कार्य) का घट और पट में जाकर सामानाधिकरण्य बन जाता है । अतः कारण और कार्य का सामानाधिकरण्य बन जाने के कारण कपाल और तन्तु का रूप घट और पट के रूप के प्रति असमवायिकारण बन जाता है ।

न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ३१ तदुभयभिन्नं कारणं निमित्तकारणम् । यथा तुरीवेमादिकं पटस्य । तदेतत्त्रिविधकारणमध्ये यदसाधारणं कारणं, तदेव करणम् । समवायिकारण और असमवायिकारण से भिन्न जो कारण, वह निमित्तकारण होता है । जैसे, तुरी-वेमा आदि पट का निमित्तकारण होता है । इन तीनों कारणों के मध्य जो असाधारण कारण होता है, वही करण है । न्यायबोधिनी निमित्तकारणं लक्षयति-तदुभयभिन्नमिति । समवायिकारणभिन्नत्वे सति असमवायिकारणभिन्नत्वे सति कारणत्वं निमित्तकारणत्वम् । तदेतदिति । यदसाधारणमिति । व्यापारवत्त्वे सतीत्यपि पूरणीयम् । अन्यथा तन्तुकपालसंयोगयोरतिव्याप्तिः, तन्तुकपालसंयोगयोरपि कार्य्य- त्वातिरिक्तपटत्वघटत्वावच्छिन्नं प्रति कारणत्वादसाधारणत्वमस्त्येवेत्यतस्तत्र करणत्ववारणाय 'व्यापारवत्त्वे सतीति' करणलक्षणे विशेषणं देयम् । व्यापारत्वञ्च तज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनकत्वम् । भवति हि दण्डजन्यत्वे सति दण्डजन्यघटजनकत्वाद् भ्रम्यादेर्व्यापारत्वम् । एवं कपालसंयोगतन्तु- संयोगदेरपि कपालतन्तुव्यापारत्वम्, कपालतन्तुजन्यत्वे सति कपालतन्तुजन्य- हिन्दी-कला मूलोक्त निमित्तकारण के लक्षण को बोधिनीकार स्पष्ट करते हैं- समवायिकारण से भिन्न होते हुए तथा असमवायिकारण से भिन्न होते हुए कारण होना निमित्त- कारण का लक्षण है । जैसे पट के प्रति तुरी-वेम-कुविन्द आदि तथा घट के प्रति दण्ड, चक्र, कुलाल आदि निमित्त कारण हैं । इन त्रिविध कारणों के अन्तर्गत जो असाधारण कारण है, वही कार्य के प्रति करण होता है । करण का लक्षण पूर्व में सविस्तर बताया जा चुका है । उस लक्षण में "व्यापारवत्त्वे सति" इतना जोड़ना आवश्यक है । नहीं तो तन्तु और कपाल के संयोग भी पट और घट के प्रति करण होने लगेंगे । अर्थात् करणलक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । क्योंकि तन्तु-कपालसंयोग कार्यत्व से भिन्न जो पटत्व-घटत्वधर्म, उससे अवच्छिन्न पटघटात्मक कार्य के प्रति कारण होने से असाधारण कारणरूप बन जाते हैं । अतः तन्तु-कपालसंयोग में करणत्व का वारण करने के लिये "व्यापारवत्त्वे सति" यह विशेषण देना चाहिये । ऐसा करण घट के प्रति दण्ड है । "तज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनकत्व" यह व्यापार का लक्षण है । यहाँ 'तत्' पद से करण गृहीत होता है । अर्थात् जो करण से पैदा हो और करण से उत्पन्न होने वाले कार्य का जनक हो, वह व्यापार है । जैसे, दण्ड से जन्य होते हुए दण्ड का कार्य घट

३२ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः तत्र प्रत्यक्षज्ञानकरणं प्रत्यक्षम् । उन चारों प्रमाणों में प्रत्यक्ष ज्ञान के प्रति जो करण ( असाधारण कारण ) होता है, वह प्रत्यक्ष प्रमाण है । न्यायबोधिनी घटपटजनकत्वात् । करणलक्षणेऽसाधारणत्वविशेषणानुपादाने ईश्वरादृष्टा- देरपि व्यापारवत्कारणत्वस्य सत्त्वात् तत्रातिव्याप्तिवारणायासाधारणेति विशेषणम् । षड्विधेन्द्रियभूतप्रत्यक्षप्रमाणस्य लक्षणमाह—तत्रेति । प्रमाभूतेषु प्रत्यक्षात्मकं यज्ज्ञानं चाक्षुषादिप्रत्यक्षं, तत्प्रति व्यापारवदसाधारणं कारण- मिन्द्रियं भवति । अतः प्रत्यक्षज्ञानकरणत्वं प्रत्यक्षस्य लक्षणम् । आद्यसन्नि- कर्षातिरिक्तचतुर्विधसन्निकर्षाणां समवायरूपत्वेनेन्द्रियजन्यत्वाभावाद् व्यापारत्वं न संभवतीति इन्द्रियमनःसंयोगस्यैव बाह्यप्रत्यक्षे जननीये इन्द्रिय- व्यापारता बोध्या । मानसप्रत्यक्षे त्वात्ममनःसंयोगस्यैव सा बोध्या । हिन्दी-कला का जनक होने से चक्रभ्रमि आदि व्यापार कहे जाते है । इसी प्रकार कपालसंयोग और तन्तुसंयोग आदि भी कपाल और तन्तु के व्यापार हैं । क्योंकि उक्त संयोग कपाल-तन्तु से उत्पन्न होते हुए कपाल-तन्तु के कार्य घट-पट के जनक भी हैं । करण- लक्षण में 'असाधारणत्व' विशेषण यदि न दिया जाय तो करण-लक्षण की अतिव्याप्ति ईश्वर अदृष्ट आदि साधारणकारण में हो जायगी । क्योंकि ईश्वरादि में भी व्यापारवत्कारणत्व है । ईश्वर-अदृष्ट आदि जगत् के समस्त कार्य के प्रति साधारण कारण हैं । न्यायमत में चक्षु आदि षड्विध इन्द्रियां 'प्रत्यक्षप्रमाण' पद से कही जाती हैं । क्योंकि प्रमा का करण प्रमाण है । चतुर्विध प्रमा के अन्तर्गत प्रत्यक्षात्मक जो ज्ञान चाक्षुष-रासन आदि प्रत्यक्ष हैं, उनके प्रति व्यापारवान् असाधारण कारण इन्द्रियां ही हैं । अतः प्रत्यक्षज्ञानकरणत्वरूप प्रत्यक्षप्रमाण का लक्षण इन्द्रियों में घटित हो गया । इन्द्रिय का व्यापार क्या है ? इसे स्पष्ट करते हैं—प्रत्यक्ष में षड्विध संनिकर्ष कारण होते हैं, इसे आगे बतायेंगे । उनमें आदि सन्निकर्ष जो संयोग है, उससे अति- रिक्त चार सन्निकर्ष समवायरूप होने से इन्द्रियजन्य नहीं होने से व्यापार नहीं बन सकते, अतः इन्द्रिय-मन का संयोग ही बाह्य प्रत्यक्ष को उत्पन्न करने में व्यापार है । मानसप्रत्यक्ष के प्रति तो आत्ममन का संयोग ही व्यापार होता है । ऐसा जानना चाहिये ।

न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ३३ इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्यं ज्ञानं प्रत्यक्षम् [ ज्ञानाकरणकं ज्ञानं प्रत्यक्षम् । ] तद् द्विविधम्—निर्विकल्पकं सविकल्पकञ्चेति । तत्र निष्प्र- कारकं ज्ञानं निर्विकल्पकम् । इन्द्रिय और अर्थ ( विषय ) के संयोग से उत्पन्न ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमा है । [ अथवा ज्ञान जिस ज्ञान में करण न हो, वह ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमा है । प्रत्यक्ष प्रमा में इन्द्रियाँ करण होती हैं ज्ञान नहीं । ] वह दो प्रकार का होता है—सविकल्पक प्रत्यक्ष और निर्विकल्पक प्रत्यक्ष । उन दोनों प्रकार के प्रत्यक्षों में प्रकारता से शून्य ज्ञान को निर्विकल्पक प्रत्यक्ष कहते हैं । जैसे, अन्धकार में अस्पष्ट दिखाई पड़ने वाला "यह कुछ है" ऐसा ज्ञान निर्विकल्पक प्रत्यक्ष है । न्यायबोधिनी प्रत्यक्षप्रमाणलक्षणमुक्त्वा प्रत्यक्षप्रमालक्षणमाह-इन्द्रियार्थसन्निकर्षेति । जन्यप्रत्यक्षस्यैव लक्ष्यत्वमित्यभिप्रायेणेदं लक्षणम् । ज्ञानाकरणकमिति । क्षेपकं लक्षणमिदम् । ज्ञान = व्याप्तिज्ञानं सादृश्यज्ञानं पदज्ञानं च, तदेव करणं येषां तानि ज्ञानकरणकानि, अनुमित्युपमितिशाब्दानि, तद्भिन्नं ज्ञानाकरणकं यज्ज्ञानं तत्त्वम् प्रत्यक्षप्रमाया लक्षणम् । प्रत्यक्षे इन्द्रियाणामेव करणत्वात् न तु ज्ञानस्य करणत्वमिति समन्वयः । इदं लक्षणमीश्वरप्रत्यक्षसाधारणम्, ईश्वरप्रत्यक्षस्य ज्ञानाकरणकत्वात् । प्रत्यक्षं विभजते-निर्विकल्पकमिति । तल्लक्षयति-तत्र निष्प्रकारकमिति । हिन्दी-कला प्रत्यक्षप्रमाण का लक्षण कहने के बाद अब प्रत्यक्षप्रमा का लक्षण मूलकार बताते हैं—इन्द्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न ज्ञान प्रत्यक्षप्रमा है । इस लक्षण का लक्ष्य जन्यप्रत्यक्ष ही हो सकता है, ईश्वरप्रत्यक्ष छूट जायगा । अतः जन्य-नित्य उभय- साधारण लक्षण करते हैं—ज्ञानाकरणक ज्ञान प्रत्यक्ष है । अर्थात् जिस ज्ञान में कोई ज्ञान करण नहीं होता हो, वह ज्ञान प्रत्यक्ष है । जैसे अनुमिति में व्याप्तिज्ञान करण होता है, उपमिति में सादृश्यज्ञान करण होता है तथा शाब्दबोध में पदज्ञान करण होता है । इसलिए उक्त तीनों ज्ञान ज्ञानकरणक हुए । अतः इनसे भिन्न जो ज्ञाना- करणक ज्ञान, तादृशज्ञानत्व ही प्रत्यक्षप्रमा का लक्षण है । प्रत्यक्ष के प्रति इन्द्रिय ही करण होता है, न कि कोई ज्ञान । अतः यह लक्षण प्रत्यक्ष में समन्वित है । जन्यत्व- विशेषणघटित नहीं होने से यह ज्ञानाकरणक-ज्ञानस्वरूप लक्षण ईश्वरप्रत्यक्ष में भी संगत हो जाता है । क्योंकि ईश्वरप्रत्यक्ष भी ज्ञानाकरणक है । निर्विकल्पक प्रत्यक्ष और सविकल्पक प्रत्यक्ष के भेद से प्रत्यक्ष ज्ञान दो प्रकार का ३

३४ | तर्कसंग्रहः | [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः

सप्रकारकं ज्ञानं सविकल्पकम् । यथा डित्थोऽयं ब्राह्मणोऽयं श्यामोऽयमिति । प्रकारता से युक्त ज्ञान सविकल्पक प्रत्यक्ष है । जैसे, यह डित्थ है, यह ब्राह्मण है, यह श्याम है--इत्यादि ज्ञान सविकल्पक प्रत्यक्ष है । क्योंकि यहाँ डित्थत्व-ब्राह्मणत्व- श्यामत्वरूप प्रकार ( विशेषण ) भासित हो रहा है । न्यायबोधिनी प्रकारताशून्यज्ञानत्वमेव निर्विकल्पकत्वमित्यर्थः । निर्विकल्पके चतुर्थी विषयता स्वीक्रियते न तु त्रिविधविषयतामध्ये कापि तत्रास्ति । अतो विशेष्यता- शून्यज्ञानत्वं, संसर्गताशून्यज्ञानत्वमित्यपि लक्षणं संभवति । सविकल्पकं लक्षयति सप्रकारकमिति । विषयताया ज्ञाननिरूपितत्वात् ज्ञानस्य विषयतानिरूपकत्वेन प्रकारतानिरूपकज्ञानत्वं सविकल्पकस्य लक्षणम् । एवं विशेष्यतानिरूपकज्ञानत्वमित्यपि लक्षणं सम्भवति । उदाहरणम्- यथेति । इदन्त्वावच्छिन्नविशेष्यतानिरूपितडित्थत्वप्रकारताशालिज्ञानम्, इद- न्त्वावच्छिन्नविशेष्यतानिरूपितब्राह्मणत्वप्रकारताशालिज्ञानं च सविकल्पक- मित्यर्थः । हिन्दी-कला होता है । इनमें निष्प्रकारक ज्ञान निर्विकल्पक है । अर्थात् प्रकारताशून्यज्ञानत्व निर्विकल्पकत्व है । सविकल्पक ज्ञान में तीन तरह की विषयता होती है-प्रकारताख्य विषयता, विशेष्यताख्य विषयता और संसर्गताख्य विषयता । किन्तु निर्विकल्पक ज्ञान में इन तीनों में कोई भी विषयता नहीं होने से एक विलक्षण चतुर्थी विषयता रहती है । इसीलिए प्रकारताशून्यज्ञानत्व जैसे निर्विकल्पक का लक्षण है, वैसे विशेष्यता- शून्यज्ञानत्व तथा संसर्गताशून्यज्ञानत्व भी लक्षण हो सकता है । जैसे-परस्पर प्रकार- विशेष्यभावरहित 'घटघटत्वे' ऐसा ज्ञान निर्विकल्पक प्रत्यक्ष है । सप्रकारक ज्ञान सविकल्पक प्रत्यक्ष है । घटादि विषय में रहनेवाली विषयता ज्ञान से निरूपित होती है और ज्ञान उस विषयता का निरूपक होता है, प्रकारता- निरूपक ज्ञानत्व सविकल्पक का लक्षण है । अर्थात् प्रकारताख्यविषयतानिरूपक ज्ञानत्व सविकल्पक ज्ञान का लक्षण है । ऐसे ही विशेष्यताख्यविषयतानिरूपक ज्ञानत्व तथा संसर्गताख्यविषयतानिरूपक ज्ञानत्व भी सविकल्पक का लक्षण हो सकता है । क्योंकि सविकल्पक ज्ञान में उक्त तीनों प्रकार की विषयता होती है । सविकल्पक का उदाहरण 'डित्थोऽयम्', 'ब्राह्मणोऽयम्' इत्यादि ज्ञान है । यहाँ इदन्त्वावच्छिन्ना जो विशेष्यता डित्थ तथा ब्राह्मणनिष्ठा है, उससे निरूपिता डित्थत्व

न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ३५

प्रत्यक्षज्ञानहेतुरिन्द्रियार्थसन्निकर्षः षड्विधः—संयोगः, संयुक्त- समवायः, संयुक्तसमवेतसमवायः, समवायः, समवेतसमवायो, विशे- षणविशेष्यभावश्चेति । चक्षुषा घटप्रत्यक्षजनने संयोगः सन्निकर्षः । घटरूपप्रत्यक्षजनने संयुक्तसमवायः सन्निकर्षः, चक्षुःसंयुक्ते घटे रूपस्य समवायात् । रूपत्वसामान्यप्रत्यक्षे संयुक्तसमवेतसमवायः सन्निकर्षः, चक्षुः- संयुक्ते घटे रूपं समवेतं, तत्र रूपत्वस्य समवायात् । प्रत्यक्षज्ञान का हेतुभूत इन्द्रिय और अर्थ का सन्निकर्ष छ प्रकार का होता है— संयोग, संयुक्तसमवाय, संयुक्तसमवेतसमवाय, समवाय, समवेतसमवाय और विशेषण- विशेष्यभाव । चक्षुः इन्द्रिय से घट का प्रत्यक्ष करने में संयोग संनिकर्ष कारण होता है । चक्षुः इन्द्रिय से घट के रूप का प्रत्यक्ष करने में संयुक्तसमवाय संनिकर्ष कारण होता है । क्योंकि चक्षु से संयुक्त घट में रूप समवायसम्बन्ध से है । चक्षुः से घटरूपगत रूपत्वसामान्य ( जाति ) का प्रत्यक्ष करने में संयुक्तसमवेत- समवायसम्बन्ध कारण है । क्योंकि चक्षुःसंयुक्त घट में रूप समवेत है और उस रूप में रूपत्वका समवाय है । अर्थात् रूप में रूपत्व समवायसम्बन्ध से रहता है । न्यायबोधिनी चाक्षुषादिषड्विधप्रत्यक्षकारणीभूतान् षड्विधसन्निकर्षान्विभजते— संयोग इत्यादि । द्रव्यवृत्तिलौकिकविषयतासम्बन्धेन चाक्षुषत्वावच्छिन्नं प्रति चक्षुःसंयोगस्य कारणत्वम् । द्रव्यसमवेतवृत्तिलौकिकविषयतासम्बन्धेन चाक्षु- षत्वावच्छिन्नं प्रति चक्षुःसंयुक्तसमवायस्य हेतुत्वम् । द्रव्यसमवेतसमवेतवृत्ति- लौकिकविषयतासम्बन्धेन चाक्षुषत्वावच्छिन्नं प्रति चक्षुःसंयुक्तसमवेतसम- वायस्य हेतुत्वम् । हिन्दी-कला और ब्राह्मणत्वनिष्ठा प्रकारता है, अतः तादृशप्रकारताशाली होने के कारण उक्त ज्ञान सविकल्पक है । चाक्षुष रासन घ्राणज आदि छै प्रकार के प्रत्यक्षों के कारणभूत छै प्रकार के सन्निकर्षों का विभाजन मूल में करते हैं — संयोग, संयुक्तसमवाय आदि । इनमें द्रव्य- वृत्तिलौकिकविषयतासम्बन्ध से होनेवाले चाक्षुष प्रत्यक्ष के प्रति अर्थात् द्रव्यविषयक लौकिक चाक्षुष-प्रत्यक्ष के प्रति चक्षुःसंयोगरूप सन्निकर्ष कारण होता है । एवं द्रव्य में

३६ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः न्यायबोधिनी द्रव्यग्राहकाणीन्द्रियाणि चक्षुस्त्वङ् मनांसि त्रीण्येव, अन्यानि घ्राणरसन- श्रवणानि गुणग्राहकाणि । अतस्त्वगिन्द्रियस्थले द्रव्यवृत्तिलौकिकविषयता- सम्बन्धेन त्वाचप्रत्यक्षत्वावच्छिन्नं प्रति त्वक्संयोगस्य हेतुता । एवं द्रव्यसम- वेतत्वाचप्रत्यक्षत्वावच्छिन्नं प्रति त्वक्संयुक्तसमवायस्य हेतुता । द्रव्यसमवेत- समवेतोष्णत्वशीतत्वादिजातिस्पार्शनप्रत्यक्षे त्वक्संयुक्तसमवेतसमवायस्य हेतुता । एवमात्ममानसप्रत्यक्षे मनःसंयोगस्य हेतुता । आत्मसमवेतसुखादि- मानसप्रत्यक्षे मनःसंयुक्तसमवायस्य हेतुता । आत्मसमवेतसमवेतसुखत्वादि- मानसप्रत्यक्षे मनःसंयुक्तसमवेतसमवायस्य हेतुता । रसनघ्राणयोस्तु रसगन्ध- तद्गतजातिग्राहकत्वेन द्वितीयतृतीययोः सन्निकर्षयोरेव तत्र हेतुता वाच्या । हिन्दी-कला जो समवेत रूपादि, उसमें रहनेवाली जो लौकिकविषयता उस सम्बन्ध से होनेवाले चाक्षुष-प्रत्यक्ष के प्रति अर्थात् द्रव्यसमवेतरूपादिविषयक लौकिक चाक्षुषप्रत्यक्ष के प्रति चक्षुःसंयुक्तसमवायनामक सन्निकर्ष हेतु होता है । ऐसे ही द्रव्यसमवेत रूपादि, उसमें समवेत रूपत्वादि में रहनेवाली जो लौकिकविषयता, उस सम्बन्ध से होनेवाले चाक्षुष के प्रति अर्थात् रूपत्वादिविषयक लौकिक चाक्षुष-प्रत्यक्ष के प्रति चक्षुःसमवेत- समवाय सन्निकर्ष हेतु होता है । द्रव्य का ग्रहण कराने वाली तीन ही इन्द्रियां होती हैं—चक्षुः त्वक् और मन । शेष तीन इन्द्रियां --- घ्राण रसना और श्रोत्र तो गुणका ग्रहण कराती हैं द्रव्य का नहीं । अतः चक्षुः के समान त्वगिन्द्रिय-स्थल में भी द्रव्यविषयक लौकिक त्वाच- प्रत्यक्ष के प्रति त्वक्संयोग कारण है । तथा द्रव्यसमवेत जो स्पर्शादि गुण, तद्विषयक लौकिक त्वाच-प्रत्यक्ष के प्रति त्वक्संयुक्तसमवाय सन्निकर्ष कारण होता है। इसी प्रकार द्रव्यसमवेत जो स्पर्शादि, उसमें समवेत जो शीतलत्वादि जाति, उसके लौकिक त्वाच-प्रत्यक्ष के प्रति त्वक्संयुक्तसमवेतसमवायनामक सन्निकर्ष कारण होता है । इसी प्रकार आत्मविषयक मानस प्रत्यक्ष के प्रति आत्मा के साथ मन का संयोग हेतु होता है । तथा आत्मसमवेतसुखादि के मानस प्रत्यक्ष के प्रति मनःसंयुक्त- समवाय हेतु होता है । तथा आत्म-समवेतसुखादिसमवेतसुखत्वादि जाति के मानस प्रत्यक्ष के प्रति मनःसंयुक्तसमवेतसमवायनामक सन्निकर्ष हेतु होता है । रसनेन्द्रिय और घ्राणेन्द्रिय तो रस और गन्ध गुण का तथा तद्गत रसत्व- गन्धत्वादि जाति की ही ग्राहिका होती हैं, अतः वहाँ संयोग-सन्निकर्ष को छोड़कर संयुक्तसमवाय एवं संयुक्तसमवेतसमवायनामक द्वितीय और तृतीय सन्निकर्ष ही कारण होते हैं ।

न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ३७ श्रोत्रेण शब्दसाक्षात्कारे समवायः सन्निकर्षः, कर्णविवरवर्त्या- काशस्य श्रोत्रत्वाच्छब्दस्याकाशगुणत्वाद् गुणगुणिनोश्च समवायात् । शब्दत्वसाक्षात्कारे समवेतसमवायः सन्निकर्षः, श्रोत्रसमवेते शब्दे शब्दत्वस्य समवायात् । अभावप्रत्यक्षे विशेषणविशेष्यभावः सन्निकर्षः, घटाभाववद्- भूतलमित्यत्र चक्षुःसंयुक्ते भूतले घटाभावस्य विशेषणत्वात् । श्रोत्रद्वारा शब्द का प्रत्यक्ष करने में समवाय सन्निकर्ष कारण होता है। क्योंकि कान के विवर (बिल) में वर्तमान आकाश ही श्रोत्र है और शब्द आकाश का गुण है तथा गुण और गुणी में समवायसम्बन्ध होता है। शब्दगत-शब्दत्व जाति के साक्षात्कार (प्रत्यक्ष) में समवेतसमवाय सन्निकर्ष कारण है। क्योंकि श्रोत्ररूप आकाश में शब्द समवेत है और उस शब्द में शब्दत्व समवेत है। अर्थात् आकाश में शब्द का और शब्द में शब्दत्व का समवाय है। अभाव के प्रत्यक्ष में विशेषणविशेष्यभाव सन्निकर्ष कारण होता है। क्योंकि “घटाभाववद् भूतलम्” इस ज्ञान में चक्षुःसंयुक्त भूतल में घटाभाव विशेषण है। न्यायबोधिनी श्रवणेन्द्रियस्याकाशरूपत्वेन शब्दस्याकाशगुणत्वेन श्रवणेन्द्रियेण समं समवायः सन्निकर्षः । शब्दवृत्तिशब्दत्वकत्वखत्वादिजातिविषयकश्रावणप्रत्यक्षे समवेत- समवायस्य हेतुता च बोध्या । अभावप्रत्यक्ष इति । अभावप्रत्यक्षे विशेषणविशेष्यभावो नाम विशेषणता- सन्निकर्षः । पञ्चविधसन्निकर्षेषु मध्ये संयोगस्थाने संयुक्तपदं समवायस्थाने समवेतपदं च घटयित्वा अभावस्थले निर्वाह्यम् । तथाहि—द्रव्याधिकरणका- हिन्दी-कला शब्द के साथ श्रवणेन्द्रिय का संयोग सम्बन्ध नहीं हो सकता है। क्योंकि श्रवणे- न्द्रिय आकाशरूप है, और शब्द आकाश का गुण है। इसलिये शब्द और श्रवणेन्द्रिय में गुणगुणिभाव होने के कारण श्रवणेन्द्रिय के साथ शब्द का समवाय-सन्निकर्ष होगा। अतः शब्द के प्रत्यक्ष में समवायसन्निकर्ष कारण होता है। एवं शब्द में रहने वाली शब्दत्व-कत्व-खत्व आदि जातियों के श्रावण-प्रत्यक्ष में समवेतसमवाय- सन्निकर्ष को हेतु जानना चाहिये। अभाव के प्रत्यक्ष में विशेषणविशेष्यभाव नामक विशेषणतासन्निकर्ष कारण होता है। पूर्वोक्त पांच प्रकार के सन्निकर्षों में आये संयोग के स्थान में 'संयुक्त' पद देकर तथा समवाय के स्थान में 'समवेत' देकर अभावस्थल के सन्निकर्षों का निरूपण

३८ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः एवं सन्निकर्षषट्कजन्यं ज्ञानं प्रत्यक्षं, तत्करणमिन्द्रियम् । तस्मादिन्द्रियं प्रत्यक्षप्रमाणमिति सिद्धम् । इस प्रकार उक्त षड्विध सन्निकर्षों से उत्पन्न ज्ञान प्रत्यक्ष-प्रमा है और उसका करण इन्द्रिय है । अतः इन्द्रियाँ प्रत्यक्षज्ञान का करण होने से प्रत्यक्षप्रमाण हैं, यह सिद्ध हुआ । ॥ इति प्रत्यक्षपरिच्छेदः ॥ न्यायबोधिनी भावप्रत्यक्षे इन्द्रियसयुक्तविशेषणता । द्रव्यसमवेताधिकरणकाभावप्रत्यक्षे इन्द्रियसयुक्तसमवेतविशेषणता, द्रव्यसमवेतसमवेताधिकरणकाभावप्रत्यक्षे इन्द्रियसंयुक्तसमवेतसमवेतविशेषणता च सन्निकर्षः । तत्र घटे पटत्वाभावः संयुक्तविशेषणतया गृह्यते । घटसमवेतघटत्वादौ पृथिवीत्वाभावः सयुक्त- समवेतविशेषणतया गृह्यते । घटसमवेतसमवेतरूपत्वादौ नीलत्वाभावश्च संयुक्तसमवेतसमवेतविशेषणतया गृह्यत इति संक्षेपः । हिन्दी-कला करना चाहिये । जैसे—द्रव्यस्वरूप अधिकरण में यदि किसी अभाव का प्रत्यक्ष करना हो तो वहाँ इन्द्रियसंयुक्तविशेषणता सन्निकर्ष हेतु होगा । वहाँ इन्द्रियसंयुक्त वह द्रव्य होगा और उसमें अभाव विशेषण होगा । इस प्रकार द्रव्य में अभाव का प्रत्यक्ष इन्द्रियसंयुक्तविशेषणता सन्निकर्ष से होता है । इसी प्रकार द्रव्यसमवेत रूपादि में अभाव का प्रत्यक्ष करना हो तो वहाँ इन्द्रियसंयुक्तसमवेतविशेषणता सन्निकर्ष कारण होगा । यहाँ भी इन्द्रियसंयुक्त द्रव्य, उसमें समवेतरूपादि गुण, उसमें समवेत- रूपत्वादि जाति और उसमें विशेषणीभूत अभाव घटाभाव आदि है । इस प्रकार रूपत्वादि में घटाभावादि का प्रत्यक्ष इन्द्रियसंयुक्तसमवेतसमवेतविशेषणता सन्निकर्ष से होता है । अभाव-प्रत्यक्ष में विशेषणता-सन्निकर्ष की कारणता का उदाहरण न्यायबोधिनी- कार स्वयं देते है—घट में पटत्वाभाव का प्रत्यक्ष संयुक्तविशेषणता सन्निकर्ष से होता है । घटसमवेत घटत्व में पृथिवीत्वाभाव का प्रत्यक्ष संयुक्तसमवेतविशेषणता सन्निकर्ष से होता है । तथा घटसमवेत ( रूप ) में समवेत जो रूपत्वादि, उसमें नीलत्वाभाव का .प्रत्यक्ष संयुक्तसमवेत-समवेत-विशेषणता सन्निकर्ष से होता है । यही षड्विध सन्निकर्षों का संक्षिप्त स्वरूप है । इति तर्कसंग्रहन्यायबोधिन्याः 'हिन्दी-कला' व्याख्यायां प्रत्यक्षपरिच्छेदः । —:❖:—

अथानुमानपरिच्छेदः अनुमितिकरणमनुमानम् । परामर्शजन्यं ज्ञानमनुमितिः । अनुमिति के करण ( असाधारण कारण ) को 'अनुमान' कहते हैं । परामर्श से जन्य ( उत्पन्न ) ज्ञान को 'अनुमिति' कहते हैं । न्यायबोधिनी अनुमानं लक्षयति-अनुमितीति । अनुमितौ व्याप्तिज्ञानं करणं, परामर्शो व्यापारः, अनुमितिः फलं कार्यमित्यर्थः । परामर्शस्य व्याप्तिज्ञानजन्यत्वे सति व्याप्तिज्ञानजन्यानुमितिजनकत्वात्तज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनकत्वरूप- व्यापारत्वमुपपन्नम् । अनुमितिकरणत्वमनुमानस्य लक्षणम् । अनुमानं व्याप्तिज्ञानम् । एतस्य परामर्शरूपव्यापारद्वारा अनुमिति प्रत्यसाधारणका- रणतयाऽनुमितिकरणत्वमुपपन्नम् । परामर्शजन्यमिति । परामर्शजन्यत्वविशिष्टज्ञानत्वमनुमितेर्लक्षणम् । अत्र ज्ञानत्वमात्रोपादाने प्रत्यक्षादावतिव्याप्तिः, अतस्तद्वारणाय परामर्श- जन्यत्वे सतीति विशेषणोपादानम् । परामर्शजन्यत्वमात्रोक्तौ परामर्शध्वंसे- हिन्दी-कला अनुमिति के प्रति जो करण है, वह अनुमान प्रमाण है । अनुमिति में व्याप्ति- ज्ञान करण होता है, परामर्श व्यापार है और अनुमितिरूप फल कार्य है । परामर्श व्याप्तिज्ञान रूप करण से जन्य होता हुआ व्याप्तिज्ञान से जन्य अनुमिति का जनक भी होता है । इसलिये 'तज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनकत्वरूप' व्यापार का लक्षण परामर्श में समन्वित हो जाता है । मूल में "अनुमितिकरणत्व" अनुमान का लक्षण कहा गया है । यहाँ व्याप्तिज्ञान ही अनुमान है । यह व्याप्तिज्ञान परामर्शरूप व्यापार द्वारा अनुमिति के प्रति असाधारण कारण होने से अनुमितिका करण बन गया । परामर्शजन्य ज्ञान अनुमिति है । अतः 'परामर्शजन्यत्वविशिष्टज्ञानत्व' अनुमिति का लक्षण हुआ । यहाँ यदि ज्ञानत्वमात्र को अनुमिति का लक्षण माना जाय तो प्रत्यक्ष- ज्ञान में अनुमितिलक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । अतः अतिव्याप्ति के निवारण के लिये 'परामर्शजन्यत्व' विशेषण दिया । प्रत्यक्ष में परामर्शजन्यत्व नहीं होने से अति- व्याप्ति नहीं हुई । एवं यदि 'परामर्शजन्यत्वमात्र' लक्षण माना जाय तो परामर्शध्वंस में अतिव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि परामर्श का ध्वंस भी परामर्शजन्य होता है । अतः

४० तर्कसंग्रहः [ अनुमानपरिच्छेदः व्याप्तिविशिष्टपक्षधर्मताज्ञानं परामर्शः । यथा वह्निव्याप्य- धूमवानयं पर्वत इति ज्ञानं परामर्शः । तज्जन्यं पर्वतो वह्निमानिति ज्ञानमनुमितिः । व्याप्ति से विशिष्ट (युक्त) पक्षधर्मताज्ञान परामर्श कहलाता है। जैसे, 'वह्नि- व्याप्यधूमवानयं पर्वतः' यह ज्ञान परामर्श है। यहाँ 'वह्निव्याप्य' इससे व्याप्ति विशिष्ट का ज्ञान सूचित हुआ तथा 'धूमवानयं पर्वतः' इससे पक्षधर्मता का ज्ञान सूचित हुआ। अतः यह ज्ञान परामर्श है। इससे उत्पन्न 'पर्वतो वह्निमान्' यह ज्ञान अनुमिति है। न्यायबोधिनी ऽतिव्याप्तिरतस्तद्वारणाय ज्ञानत्वोपादानम् । अनुमितिलक्षणघटकीभूतपरामर्श लक्षणमाचष्टे-व्याप्तिविशिष्टेति । व्या- प्तिविशिष्टं च तत्पक्षधर्मताज्ञानमिति कर्मधारयः । अत्र विशिष्टपदस्य प्रकारतानिरूपकपरत्वात्पक्षधर्मताया ज्ञानमित्यत्र षष्ठ्या विषयत्वबोधनात् धर्मतापदस्य सम्बन्धार्थकत्वात् कर्मधारयसमासेन समस्यमानपदार्थयोर- भेदसंसर्गलाभाच्च व्याप्तिप्रकारकाभिन्नं यत्पक्षसम्बन्धिविषयकं ज्ञानं, तत्प- रामर्श इति लभ्यते । एवं सति धूमो वह्निव्याप्यः आलोकवान्पर्वतः इत्या- हिन्दी-कला उस अतिव्याप्ति के वारण के लिये 'ज्ञानत्व' पद दिया। ध्वंस में ज्ञानत्व नहीं होने से अतिव्याप्ति नहीं हुई। अनुमिति लक्षण के अन्तर्गत समाविष्ट परामर्श का लक्षण मूलकार कहते हैं— व्याप्तिविशिष्ट जो पक्षधर्मताज्ञान, वह परामर्श है। मूलोक्त लक्षणवाक्य में "व्याप्ति- विशिष्टं च तत् पक्षधर्मताज्ञानं च व्याप्तिविशिष्टपक्षधर्मताज्ञानम्" ऐसा कर्मधारय- समास है। यहाँ 'विशिष्ट' यह पद "प्रकारतानिरूपक" इस अर्थ में है। एवं "पक्ष- धर्मताया ज्ञानं पक्षधर्मताज्ञानम्" इस षष्ठीसमास में षष्ठी विभक्ति से विषयत्व सूचित होता है। इससे 'पक्षधर्मताविषयक ज्ञान' यह अर्थ हुआ। पक्षधर्मता में भी 'धर्मता' पद सम्बन्ध अर्थ में है। एवं कर्मधारयसमास में समस्यमान पदार्थों में अभेदसंसर्ग का लाभ होता है। अतः "व्याप्तिविशिष्टपक्षधर्मताज्ञानम्" इस मूल लक्षण से यह निष्कर्ष निकलता है—व्याप्तिप्रकारकाभिन्न जो पक्षसम्बन्धि-(हेतु) विषयक ज्ञान, वह परामर्श है। अर्थात् व्याप्तिप्रकारक-पक्षसम्बन्धिहेतुविशेष्यक-ज्ञान परामर्श है। किन्तु ऐसा लक्षण करने पर "धूमो वह्निव्याप्यः, आलोकवान् पर्वतः" इस प्रकार के समूहालम्बन ज्ञान में भी परामर्श का उक्त लक्षण चला जाता है और लक्षण की

न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ४१ न्यायबोधिनी कारकसमूहालम्बनेऽप्युक्तपरामर्श लक्षणमस्तीत्यतिव्याप्तिस्तद्वारणाय पक्षनि- ष्ठविशेषतानिरूपिता या हेतुनिष्ठा प्रकारता, तन्निरूपिता या व्याप्तिनिष्ठा प्रकारता, तच्छाालिज्ञानं परामर्श इति निष्कर्षः। एतादृशपरामर्शजन्यत्वे सति ज्ञानत्वमनुमितेर्लक्षणम्। अनुमितिपरमर्शयोर्विशिष्य कार्यकारणभावश्चेत्थम्—पर्वतत्वावच्छि- न्नोद्देश्यता निरूपितसंयोगसम्बन्धावच्छिन्नवह्नित्वावच्छिन्नविधेयताकानुमिति- त्वावच्छिन्नं प्रति, वह्नित्वावच्छिन्नप्रकारतानिरूपितव्याप्तित्वावच्छिन्न- प्रकारतानिरूपिता या धूमत्वावच्छिन्नप्रकारता तन्निरूपितपर्वतत्वावच्छिन्न- विशेष्यताशालिनिर्णयः कारणम्। वह्नित्वावच्छिन्नप्रकारतानिरूपित- व्याप्तित्वावच्छिन्नविशेष्यतायाः धूमत्वावच्छिन्नविशेष्यतानिरूपितव्याप्ति- त्वावच्छिन्नप्रकारतायाश्चाभेदानङ्गीकर्तृ मते वह्नित्वावच्छिन्नप्रकारतानिरू- हिन्दी-कला अलक्ष्य में अतिव्याप्ति हो जाती है। क्योंकि यहां भी व्याप्ति का प्रकारविधया भान होता है और पक्षसम्बन्धी (आलोक) का विषयविधया भान हो रहा है। अतः इस अतिव्याप्तिदोष के निवारणार्थ न्यायबोधिनीकार उक्त लक्षण का परिष्कृत स्वरूप बताते हैं—पक्षनिष्ठविशेष्यतानिरूपिता जो हेतुनिष्ठा प्रकारता, और इस हेतुनिष्ठप्रकारता से निरूपिता जो व्याप्तिनिष्ठा प्रकारता, उस प्रकारतावाला ज्ञान परामर्श है। विशेष विवरण 'संस्कृत-कला' में द्रष्टव्य है। अतः "एवंविधपरामर्श- जन्यत्वे सति ज्ञानत्वम्" यह अनुमितिलक्षण बना। यह अनुमिति और परामर्श का सामान्य कार्यकारणभाव प्रदर्शित हुआ। किन्तु विशेष कार्यकारणभाव यों होगा— पर्वतत्वावच्छिन्ना जो पवतनिष्ठा उद्देश्यता, उससे निरूपिता जो संयोगसम्ब- न्धावच्छिन्ना एवं वह्नित्वधर्मावच्छिन्ना वह्नि निष्ठा विधेयता, तादृशविधेयताक अनु- मितित्वावच्छिन्न (अनुमिति) के प्रति—वह्नित्वावच्छिन्ना जो वह्नि निष्ठा प्रकारता, उससे निरूपिता जो व्याप्तित्वावच्छिन्ना व्याप्तिनिष्ठा प्रकारता, उससे निरूपिता जो • धूमत्वावच्छिन्ना धूमनिष्ठा प्रकारता, उससे निरूपिता जो पर्वतत्वावच्छिन्ना पर्वत- निष्ठा विशेष्यता, तादृशविशेष्यताशाली निश्चय कारण है। यह परिष्कार जगदीश भट्टाचार्य के मतानुसार है, जो एक में रहने वाली प्रकारता और विशेष्यता में अभेद मानते हैं। इसीलिये उक्त कार्यकारणभाव में सर्वत्र प्रकारतानिरूपिता प्रकारता ही कहते हैं। केवल पर्वत में ही प्रकारतानिरूपिता विशेष्यता का कथन करते हैं; क्योंकि पर्वत किसी के प्रति प्रकार नहीं होता है। किन्तु गदाधर भट्टाचार्य प्रकारता और विशेष्यता में अभेद न मानकर अवच्छेद्या-

२. गुण निरूपण एवं प्रत्यक्ष प्रमाण प्रकरण

४२ तर्कसंग्रहः [ अनुमानपरिच्छेदः यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्राग्निरिति साहचर्यनियमो व्याप्तिः । व्याप्यस्य पर्वतादिवृत्तित्वं पक्षधर्मता । “जहाँ-जहाँ धूम है, वहाँ-वहाँ अग्नि है” इस प्रकार के हेतु और साध्य के साहचर्यनियम को ( नियत साहचर्य को ) व्याप्ति कहते हैं । व्याप्य की ( वह्निव्याप्ति विशिष्ट धूम आदि की ) पर्वतादि पक्ष में वृत्तिता ( रहना ) को पक्षधर्मता कहते हैं । न्यायबोधिनी पितविशेष्यत्वावच्छिन्नव्याप्तित्वावच्छिन्नप्रकारतानिरूपितविशेष्यत्वावच्छि- न्नधूमत्वावच्छिन्नप्रकारतानिरूपितपर्वतत्वावच्छिन्नविशेष्यताशालिनिश्चयः कारणमिति वाच्यम् । स च निर्णयः वह्निव्याप्यधूमवान्पर्वत इत्याकारको बोध्यः । यत्र यत्रेति । यत्र पदवीप्सा धूमाधिकरणे यावति वह्निमत्त्वलाभाय । यावत्पदमहिम्ना वह्नेर्धूमव्यापकत्वं लब्धम् । तदेव स्पष्टयति—साहचर्य- नियम इति । एतदर्थस्तु नियतसाहचर्यं व्याप्तिरिति । नियतत्वं व्यापक- हिन्दी-कला वच्छेदकभाव मानते हैं । इनके मतानुसार जो व्याप्ति वह्नि के प्रति विशेष्य है, वही व्याप्ति धूम के प्रति प्रकार है, फिर भी व्याप्ति में रहने वाली विशेष्यता और प्रकारता भिन्न-भिन्न है । इसीलिये व्याप्तिनिष्ठा विशेष्यता व्याप्तिनिष्ठ प्रकारता का अवच्छेदकरूप में भासित होगी, न कि अभिन्नरूप में । अतः गदाधर भट्टाचार्य के मतानुसार “वह्निव्याप्य-धूमवान् पर्वतः” इस परामर्शात्मक निश्चयज्ञान का स्वरूप यों हुआ— वह्नित्वावच्छिन्नवह्निनिष्ठप्रकारतानिरूपिता जो व्याप्तिनिष्ठा विशेष्यता, तादृशविशेष्यत्वावच्छिन्ना एवं व्याप्तित्वावच्छिन्ना जो व्याप्तिनिष्ठा प्रकारता, तादृश- प्रकारतानिरूपिता जो धूमनिष्ठा विशेष्यता, तादृशविशेष्यत्वावच्छिन्ना एवं धूमत्वा- वच्छिन्ना जो धूमगत प्रकारता, तादृशप्रकारतानिरूपिता जो पर्वतत्वावच्छिन्ना विशे- ष्यता, तादृशविशेष्यताशाली निश्चय ‘पर्वतो वह्निमान्’ इस पर्वतोद्देश्यक वह्नि- विधेयक अनुमिति के प्रति कारण है । विशेष विवेचन ‘संस्कृत-कला’ में द्रष्टव्य है । “यत्र-यत्र धूमस्तत्र तत्राग्निः” इस प्रकार का साहचर्यनियम व्याप्तिपद का अर्थ है । यहाँ ‘यत्र’ पद की द्विरुक्ति से यावत् धूमाधिकरण में ( अर्थात् जितने धूमाधिकरण हैं, सब में ) वह्निमत्ता का लाभ होता है । इस प्रकार यावत्पद की महिमा से वह्नि में धूम की व्यापकता प्रतीत होती है । इसी बात का स्पष्टीकरण ‘साहचर्य- नियम’ पद से मूलकार ने किया है । अर्थात् धूमपदोपलक्षित हेतु और वह्निपदो- पलक्षित साध्य का नियतसाहचर्य ही व्याप्ति है । नियतत्व का अर्थ है ‘व्यापक-

न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ४३ न्यायबोधिनी त्वम् । साहचर्यं (नाम) सामानाधिकरण्यम् । तथा च धूमनियतवन्हिसामा- नाधिकरण्यं व्याप्तिरित्यर्थः । अत्र वन्हेर्धूमव्यापकत्वं नाम धूमसमानाधिक- रणात्यन्ताभावप्रतियोगितानवच्छेदकधर्मवत्त्वम् । तथाहि धूमाधिकरणे पर्वतचत्वरमहानासादौ वर्तमानो योऽभावः, घटत्वाद्यवच्छिन्नप्रतियोगिताकः, न तु वह्नित्वावच्छिन्नप्रतियोगिताकाभावः, कुत ? पर्वतादौ वह्नेः सत्त्वात् । एवं सति धूमाधिकरणे पर्वतचत्वरादौ वर्तमानस्य घटाद्यभावस्य प्रतियोगि- तावच्छेदकं घटत्वादिकमनवच्छेदकं वह्नित्वं, तद्वत्त्वं वह्नौ वर्ततेऽतो धूम- व्यापकत्वं वह्नौ वर्तते । तथा च धूमव्यापकवह्निसामानाधिकरण्यं व्याप्तिरिति फलितमिति । इयमन्वयव्याप्तिः सिद्धान्तानुसारेण । पूर्वपक्षव्याप्तिस्तु साध्याभाववदवृत्तित्वम् । साध्यतावच्छेदकसम्बन्धाव- च्छिन्नसाध्यतावच्छेदकावच्छिन्नप्रतियोगिताक-प्रतियोगितावच्छेदकसम्बन्धा- हिन्दी-कला तथा साहचर्य का अर्थ है 'सामानाधिकरण्य' (एक अधिकरण में रहना) । अतः 'नियतसाहचर्य' पद से धूमनियत (व्यापकीभूत) वह्नि के साथ धूम का सामानाधि- करण्य अर्थात् एक अधिकरण में रहना व्याप्ति है । वह्नि में धूम की व्यापकता क्या है, इसे न्यायबोधिनीकार बताते हैं—"धूम- समानाधिकरण जो अत्यन्ताभाव, उसकी प्रतियोगिता का अनवच्छेदक जो धर्म, तादृशधर्मवत्ता (तादृश धर्मवाला होना)" यही धूम की वह्नि में व्यापकता है । अर्थात् धूमाधिकरण पर्वत-चत्वर-(चौराहा) महानस आदि में वर्तमान जो अभाव, वह घटत्वादि से अवच्छिन्न-प्रतियोगिता का निरूपक अभाव घटादिका अभाव होगा, न कि वह्नित्वादि से अवच्छिन्न-प्रतियोगिता वाला वह्न्याद्यभाव होगा । क्योंकि धूमाधिकरण पर्वतादि में तो वह्नि की सत्ता ही है । इस स्थिति में धूमाधिकरण पर्वत-चत्वरादि में वर्तमान घटादि के अभाव की प्रतियोगिता घट में गई और उस प्रति- योगिता का अवच्छेदक घटत्वादिक हुआ तथा अनवच्छेदक वह्नित्वधर्म हुआ । एवं तादृशानवच्छेदक धर्मवत्त्व वह्नि में है। अतः धूम की व्यापकता वह्नि में है। इस प्रकार मूलोक्त 'नियतसाहचर्यं' पद से "धूम (हेतु) व्यापक वह्नि (साध्य) सामा- नाधिकरण्य व्याप्ति है" यह फलितार्थ हुआ । अन्वयव्याप्ति का यह स्वरूप सिद्धान्त- पक्ष के अनुसार है । पूर्वपक्ष की व्याप्ति तो "साध्याभाववदवृत्तित्वम्" है, जिसे व्याप्तिपञ्चक ग्रन्थ में प्रतिपादित किया गया है। नव्यन्याय की भाषा में इसका विशद रूप यह है- साध्यतावच्छेदक संयोगादिसम्बन्ध से अवच्छिन्ना तथा साध्यतावच्छेदकीभूत वह्नित्वादि- धर्म से अवच्छिन्ना जो वह्न्यादिसाध्यनिष्ठा प्रतियोगिता, तादृश प्रतियोगिता-

४४ तर्कसंग्रहः [ अनुमानपरिच्छेदः अनुमानं द्विविधं—स्वार्थं परार्थं च । स्वार्थं स्वानुमितिहेतुः, तथाहि—स्वयमेव भूयोदर्शनेन यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्राग्निरिति महानसादौ व्याप्तिं गृहीत्वा पर्वतसमीपं अनुमान दो प्रकार का होता है — स्वार्थानुमान और परार्थानुमान । उन दोनों अनुमानों के अन्तर्गत अपनी अनुमिति का हेतु अनुमान स्वार्थानुमान कहलाता है। जैसे—कोई स्वयं ही भूयोदर्शन ( बार बार दर्शन ) द्वारा “जहाँ जहाँ धूम होता है, वहाँ वहाँ अग्नि होती है” इस प्रकार ‘महानस ( रसोईघर ) आदि में न्यायबोधिनी वच्छिन्नप्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्नवैयधिकरण्यावच्छिन्नाभाववन्निरूपित- हेतुतावच्छेदकसम्बन्धावच्छिन्नवृत्तित्वावच्छिन्नप्रतियोगिताकाभावो व्या- प्तिरित्यर्थः । तच्च केवलान्वयिन्यव्याप्तमिति सिद्धान्तानुसरणम् । अनुमानं विभजते—स्वार्थमिति । स्वार्थानुमानं नाम न्यायाप्रयोज्यानु- मानम् । न्यायप्रयोज्यानुमानं परार्थानुमानम् । हिन्दी-कला निरूपक एवं प्रतियोगिव्यधिकरण अभाव = प्रतियोगितावच्छेदक संयोगादि- सम्बन्धावच्छिन्न तथा प्रतियोगितावच्छेदकवह्नित्वावच्छिन्न के साथ वैयधिकरण्य वाला अभाव, उस अभाव का जो अधिकरण ह्रद आदि, उसमें हेतुतावच्छेदकीभूत संयोगसम्बन्ध से वृत्तित्ता मीन-शैवाल आदि में है और तादृशवृत्तित्ता का अभाव धूम में है । तादृशवृत्तित्ता के अभाव की प्रतियोगिता वृत्तित्ता में है, जो वृत्तित्वात्वधर्म से अवच्छिन्न है । अतः वृत्तित्वात्वावच्छिन्न-तादृशप्रतियोगितानिरूपक अभाव ही साध्याभाववदवृत्तित्वरूप व्याप्ति का परिष्कृत स्वरूप है। इसका विशेष स्पष्टीकरण ‘संस्कृत-कला’ में द्रष्टव्य है । किन्तु यह “साध्याभाववदवृत्तित्व” रूप पूर्वपक्षव्याप्ति का स्वरूप “इदं वाच्यं ज्ञेयत्वात्” इत्यादि केवलान्वयिहेतु में अव्याप्त हो जाता है। क्योंकि वहाँ वाच्यत्वरूप साध्य का अभाव ही कहीं प्रसिद्ध नहीं है। ऐसी स्थिति में ‘साध्याभाववदवृत्तित्वरूप’ व्याप्ति केवलान्वयिस्थल में सुतरां नहीं बन पायेगी। इसीलिये पूर्व में उक्त “हेतु- समानाधिकरणात्यन्ताभावप्रतियोगितानवच्छेदकधर्मवत्त्व” रूप सिद्धान्तलक्षण का अनुसरण आवश्यक है । सिद्धान्तलक्षण में साध्याभाव या हेत्वभाव का उल्लेख नहीं होने से यह व्याप्ति केवलान्वयिस्थल में भी संगत हो जाती है । अनुमान के दो भेद हैं—स्वार्थानुमान और परार्थानुमान । इनमें न्याय से अप्रयोज्य अनुमान स्वार्थानुमान है। अर्थात् जिस अनुमान में प्रतिज्ञा-हेत्वादिसमुदायरूप न्याय का प्रयोग न हो, वह स्वार्थानुमान है। तथा न्याय से प्रयोज्य अनुमान परार्थानुमान

न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ४५ गतस्तद्गते चाग्नौ सन्दिहानः पर्वते धूमं पश्यन् व्याप्तिं स्मरति— 'यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्राग्निः' इति । तदनन्तरं वह्निव्याप्यधूमवानयं पर्वत इति ज्ञानमुत्पद्यते, अयमेव लिङ्गपरामर्श इत्युच्यते । तस्मात् पर्वतो वह्निमानिति ज्ञानमनुमितिरुत्पद्यते । तदेतत्स्वार्थानुमानम् । यत्तु स्वयं धूमादग्निमनुमाय परं प्रति बोधयितुं पञ्चावयव- वाक्यं प्रयुज्यते तत्परार्थानुमानम् । यथा पर्वतो वह्निमान्, धूम- वत्त्वात्, यो यो धूमवान्स स वह्निमान्, यथा महानसम्, तथा चायम् तस्मात्तथेति । अनेन प्रतिपादिताल्लिङ्गात्परो- ऽप्यग्निं प्रतिपद्यते । धूम और अग्नि की व्याप्ति को जान कर पर्वत के समीप गया और वहाँ पर्वत के अन्दर अग्नि के होने में सन्देह करता हुआ पर्वत में धूम को देखकर व्याप्ति का स्मरण करता है कि "जहाँ जहाँ धूम है, वहाँ वहाँ अग्नि है"। उसके बाद उसे 'वह्नि- की व्याप्ति से युक्त धूमवाला यह पर्वत है" ऐसा ज्ञान उत्पन्न हो जाता है । यही ज्ञान लिङ्गपरामर्श नाम से कहा जाता है । अनन्तर उस परामर्श से 'अयं पर्वतो वह्नि- मान्' ऐसा अनुमितिरूप ज्ञान उत्पन्न हो जाता है । यह स्वार्थानुमान है । जो तो स्वयं धूम से अग्नि का अनुमान करके दूसरे को अग्नि का ज्ञान कराने के लिये पञ्चावयव वाक्य का प्रयोग किया जाता है, वह परार्थानुमान है । जैसे, 'पर्वतो वह्निमान्' यह प्रथम अवयववाक्य है, 'धूमवत्त्वात्' यह द्वितीय अवयववाक्य है, "यो यो धूमवान् स स वह्निमान् यथा महानसम्" यह तृतीय अवयववाक्य है, "तथा चायम्" यह चतुर्थ अवयववाक्य है, "तस्मात्तथा" यह पञ्चम अवयववाक्य है । इस पञ्चावयव वाक्य से ज्ञापित धूमरूपलिङ्ग से दूसरा व्यक्ति भी पर्वत में अग्नि का निश्चय कर लेता है । न्यायबोधिनी न्यायत्वं च प्रतिज्ञाद्यवयवपञ्चकसमुदायत्वम् । अवयवत्वं च प्रतिज्ञा- द्यन्यतमत्वम् । हिन्दी-कला है । अर्थात् जिसमें प्रतिज्ञादि का प्रयोग किया जाय, वह परार्थानुमान है । अपने लिये किये गये अनुमान में प्रतिज्ञादि-वाक्यों का प्रयोग नही करना पड़ता है । किन्तु दूसरे को अवगत कराने के लिये प्रतिज्ञादि-वाक्यों का प्रयोग करना ही पड़ता है । प्रतिज्ञा आदि पाँच अवयवों के समुदाय को न्याय कहते हैं । यहाँ अवयव का अर्थ है— प्रतिज्ञा-हेतु-उदाहरण-उपनय और निगमन का अन्यतम (एक-एक) । इन दोनों अनुमानों का तथा पञ्चावयवों का सोदाहरण निरूपण मूल में स्पष्ट है ।

४६ तर्कसंग्रहः [ अनुमानपरिच्छेदः प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनानि पञ्चावयवाः । पर्वतो वह्निमानिति प्रतिज्ञा । धूमवत्त्वादिति हेतुः । यो यो धूमवान् स स वह्निमानित्युदाहरणम् । तथा चायमित्युपनयः । तस्मात्तथेति निगमनम् । स्वार्थानुमितिपरार्थानुमित्योर्लिङ्गपरामर्श एव करणम् । तस्माल्लिङ्गपरामर्शोऽनुमानम् । लिङ्गं त्रिविधम्—अन्वयव्यतिरेकि केवलान्वयि केवलव्यति- प्रतिज्ञा-हेतु-उदाहरण-उपनय और निगमन ये ही अनुमान के पाँच अवयव हैं। इनमें 'पर्वतो वह्निमान्' यह वाक्य प्रतिज्ञा है, 'धूमवत्त्वात्' यह हेतु है, "यो यो धूमवान् स स वह्निमान्" यह उदाहरण है, 'तथा चायम्' यह उपनय है, और 'तस्मात् तथा' यह निगमन है । स्वार्थानुमिति हो या परार्थानुमिति हो, दोनों में पूर्वोक्त लिङ्गपरामर्श ही करण है । अतः अनुमिति का करण होने से लिङ्गपरामर्श अनुमान है । लिङ्ग तीन प्रकार का होता है—अन्वयव्यतिरेकि केवलान्वयि और केवल- व्यतिरेकि । न्यायबोधिनी अन्वयेनेति । व्यापकसामानाधिकरण्यरूपव्याप्तिमानित्यर्थः । व्यतिरेके- णेति । व्यतिरेको नामाभावः । तथा च साध्याभावहेत्वभावयोर्व्याप्तिर्व्य- तिरेकव्याप्तिः । इयं च व्याप्तिः 'यत्र तत्र वह्न्यभावस्तत्र तत्र धूमाभाव' हिन्दी-कला स्वार्थानुमिति हो या परार्थानुमिति हो, दोनों में लिङ्गपरामर्श क ण है । इस- लिये लिङ्गपरामर्श अनुमान है, यह मूलकार का कथन है ।¹ लिङ्ग तीन प्रकार के हैं—अन्वयव्यतिरेकी, केवलान्वयी और केवलव्यतिरेकी । अन्वय और व्यतिरेक दोनों तरह की व्याप्ति से युक्त लिङ्ग ( हेतु ) अन्वय- व्यतिरेकी कहाता है । अन्वयव्याप्तिका अर्थ है—व्यापकसमानाधिकरण्यरूप व्याप्ति । अर्थात् पूर्वोक्त हेतुव्यापकसाध्यसामानाधिकरण्यरूप व्याप्ति अन्वयव्याप्ति है । व्यतिरेक का अर्थ अभाव है । इसलिये साध्याभाव और हेत्वभाव की व्याप्ति व्यति- १. किन्तु न्यायबोधिनीकार ने अपने व्याख्यान में व्याप्तिज्ञान को करण कहा है और परामर्श को व्यापार कहा है । संभवतः इसी मतभेद के कारण उक्त मूल का व्याख्यान न्यायबोधिनीकार ने नहीं किया ।

न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ४७ रेकि चेति । अन्वयेन व्यतिरेकेण च व्याप्तिमदन्वयव्यतिरेकि, यथा वह्नौ साध्ये धूमवत्त्वम् । यत्र धूमस्तत्राग्निर्यथा महानस- मित्यन्वयव्याप्तिः । यत्र वह्निनीस्ति तत्र धूमोऽपि नास्ति यथा हृद इति व्यतिरेकव्याप्तिः । जो लिङ्ग अन्वय और व्यतिरेक दोनों प्रकार से व्याप्तिमान् हो, वह अन्वय- व्यतिरेकि लिङ्ग है । जैसे, अग्नि को सिद्ध करने में "धूमवत्त्व" अन्वयव्यतिरेकि लिङ्ग है । "जहाँ धूम है, वहाँ अग्नि है, जैसे महानस" यह अन्वयव्याप्ति है । एवं "जहाँ अग्नि नहीं है, वहाँ धूम भी नहीं है, जैसे हृद (झील)" यह व्यतिरेक- व्याप्ति है । न्यायबोधिनी इति । 'यत्र' पदवीप्सया वह््न्यभावति यावति धूमाभावग्रहणे यावत्पदस्य व्यापकत्वपरतया धूमाभावे वह््न्यभावव्यापकत्वं लभ्यते, वह््न्यभावे धूमाभावव्याप्यत्वं च लभ्यते । एवं च वह््न्यभावनिष्ठव्याप्तेः स्वाश्रयीभूतवह््न्यभावव्यापकीभूताभाव- प्रतियोगित्वसम्बन्धेन धूमनिष्ठतया व्यतिरेकव्याप्तिमत्त्वेन धूमव्यापकव- ह्रिसमानाधिकरण्यरूपान्वयव्याप्तिमत्त्वेन चान्वयव्यतिरेकित्वेन गीयते । व्यतिरेकपरामर्शस्तु वह््न्यभावव्यापकीभूताभावप्रतियोगिधूमवान्पर्वत इत्या- कारकः । हिन्दी-कला रेक व्याप्ति है , इस व्याप्ति का अभिलाप यों होता है—"यत्र-तत्र वह््न्यभावस्तत्र तत्र धूमाभावः" ऐसा । यहाँ भी 'यत्र' पद की वीप्सा से जितने भी वह््न्यभाववान् हैं, उन सभी में धूमाभाव का ग्रहण होने के कारण 'यावत्' पद व्यापकत्व को बताता है । इस लिये धूमाभाव में वह््न्यभाव की व्यापकता अवगत होती है और वह््न्यभाव में में धूमाभाव की व्याप्यता अवगत होती है । इस प्रकार वह््न्यभावनिष्ठव्याप्ति 'स्वाश्रयीभूतवह््न्यभावव्यापकीभूताभाव- प्रतियोगित्वसम्बन्ध' से धूम में चली जाती है । अतः धूम व्यतिरेकव्याप्तिमान् होने के कारण तथा पूर्वोक्त प्रकार से 'धूमव्यापकवह्निसमानाधिकरण्यरूप' अन्वयव्याप्ति- मान् भी होने के कारण अन्वयव्यतिरेकी लिङ्ग कहा जाता है । अन्वय-परामर्श का स्वरूप पहले बताया गया है—'वह्निव्याप्यधूमवान् पर्वतः' ऐसा । व्यतिरेक-परामर्श का स्वरूप होगा—"वह््न्यभावव्यापकीभूताभावप्रतियोगिधूमवान् पर्वतः" ऐसा ।

४८ तर्कसंग्रहः [ अनुमानपरिच्छेदः अन्वयमात्रव्याप्तिकं केवलान्वयि । यथा घटोऽभिधेयः प्रमेय- त्वात्पटवत् । अत्र प्रमेयत्वाभिधेयत्वयोर्व्यतिरेकव्याप्तिर्नास्ति, सर्व- स्यापि प्रमेयत्वादभिधेयत्वाच्च । जहाँ केवल अन्वयव्याप्ति हो, वह लिङ्ग केवलान्वयि कहा जाता है । जैसे— “घटोऽभिधेयः प्रमेयत्वात्” अर्थात् घट शब्दद्वारा वाच्य है, क्योंकि वह प्रमा का ( यथार्थ ज्ञान का ) विषय है । यहाँ “जो प्रमेय है, वह अभिधेय है” ऐसी अन्वय- व्याप्ति तो है । किन्तु “जहाँ अभिधेयत्व नहीं है, वहाँ प्रमेयत्व भी नहीं है” ऐसी प्रमेयत्व और अभिधेयत्व की व्यतिरेकव्याप्ति नहीं है, क्योंकि संसार की सभी वस्तु प्रमेय है और अभिधेय भी है । न्यायबोधिनी केवलान्वयिनो लक्षणमाह—अन्वयेति । व्यतिरेकव्याप्तिशून्यत्वे सति अन्वयव्याप्तिमत्त्वं केवलान्वयित्वम् । अथवा केवलान्वयिसाध्यकत्वं तत् । एतच्च लक्षणं हेतोर्व्यतिरेकित्वे- ऽपि सङ्गच्छते, साध्यस्य केवलान्वयित्वादेव व्यतिरेकव्याप्तेरभावात् ‘अन्व- यमात्रव्याप्तिकं केवलान्वयी’ति मूलकारोक्तं लक्षणमुपपन्नम् । अत्यन्ताभा- वाप्रतियोगित्वं केवलान्वयित्वम् । न चात्यन्ताभावाप्रतियोगित्वरूपकेवलान्वयित्वमाकाशाभावे संयोगा- हिन्दी-कला अन्वयमात्र-व्याप्ति वाला लिङ्ग केवलान्वयी होता है । अर्थात् 'व्यतिरेकव्याप्ति से रहित होते हुए अन्वयव्याप्तिमत्त्व' केवलान्वयी का लक्षण है । अथवा 'केवलान्वयिसाध्यकत्व' केवलान्वयित्व है । अर्थात् जिस लिङ्ग का साध्य केवलान्वयी हो, वह केवलान्वयी है । यह लक्षण हेतु के व्यतिरेकी होने पर भी सङ्गत हो जाता है, क्योंकि साध्यमात्र के केवलान्वयी होने से ही व्यतिरेकव्याप्ति का अभाव हो जायगा और “अन्वयमात्रव्याप्तिकं केवलान्वयि” यह मूलकारोक्त लक्षण उपपन्न हो जायगा । यहाँ साध्यगत केवलान्वयित्व अत्यन्ताभावाप्रतियोगित्वरूप है । अर्थात् अत्यन्ताभाव का जो अप्रतियोगी हो, वह केवलान्वयी है । “इदं वाच्यं ज्ञेयत्वात्” इस अनुमान में वाच्यत्व-साध्य केवलान्वयी है । क्योंकि जगत् के समस्त पदार्थ में वाच्यत्वधर्म रहता है । “उक्त अत्यन्ताभावाप्रतियोगित्वरूप केवलान्वयित्व की आकाशाभाव में तथा संयोगाभाव में अव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि आकाशाभाव आकाशाभावाभाव का प्रति- योगी ही होता है, एवं संयोगाभाव भी संयोगाभावाभाव का प्रतियोगी ही होता है ।” ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये । क्योंकि अत्यन्ताभावाप्रतियोगित्व का अर्थ 'स्वविरो-

न्यायबोधिनी-कलासंबलितः ४९ व्यतिरेकमात्रव्याप्तिकं केवलव्यतिरेकि । यथा पृथिवीतरेभ्यो भिद्यते गन्धवत्त्वात् , यदितरेभ्यो न भिद्यते न तद्गन्धवत् यथा जलम्, न चेयं तथा, तस्मान्न तथेति । अत्र यद्गन्धवत् तदितरभिन्न- मित्यन्वयदृष्टान्तो नास्ति, पृथिवीमात्रस्य पक्षत्वात् । जहाँ केवल व्यतिरेकव्याप्ति हो, वह लिङ्ग केवलव्यतिरेकि कहा जाता है। जैसे, “पृथिवी औरों से ( जलादिकों से ) भिन्न है; गन्धवान् होने से; जो औरों से भिन्न नहीं है, वह गन्धवान् नहीं होता है, जैसे जल; पृथिवी जल के समान गन्धशून्य नहीं है; इसलिये यह जलादि की तरह इतर से ( जलादि से ) अभिन्न नहीं है किन्तु भिन्न है। यहाँ जो गन्धवान् है वह इतर से भिन्न है—इसका अन्वयदृष्टान्त कोई नहीं है। क्योंकि पृथिवीमात्र पक्ष है, जिसमें साध्य अभी सन्दिग्धावस्था में ही है। जबकि निश्चित साध्यवान् ही अन्वयदृष्टान्त होता है। न्यायबोधिनी भावे चाव्याप्तमिति वाच्यम् । स्वविरोधिद्वृत्तिमदत्यन्ताभावाप्रतियोगित्व- स्यैव तदर्थत्वात् । तथा चानयोः एकजातीयसम्बन्धेन सर्वत्र विद्यमानत्वं केवलान्वयित्वमिति नव्याः । केवलव्यतिरेकिणो लक्षणमाह—व्यतिरेकेति । निश्चितान्वयव्याप्तिशू- न्यत्वे सति व्यतिरेकव्याप्तिमत्त्वं केवलव्यतिरेकित्वम् । यथा पृथिवीति । हिन्दी-कला द्विद्वृत्तिमदत्यन्ताभावाप्रतियोगित्व' है। गगनाभावाभाव गगनरूप होने से वृत्तिमान् अभाव नहीं है। कारण, गगन अवृत्ति पदार्थ है। एवं संयोगाभावाभाव संयोगाभाव का विरोधी नहीं है, क्योंकि उसी वृक्ष में एक भाग में कपि का संयोगाभाव है और दूसरे भाग में संयोगाभावाभाव अर्थात् कपि का संयोग भी है। इस प्रकार आकाशाभाव और संयोगाभाव दोनों ही केवलान्वयी बन जाते हैं, क्योंकि स्वविरोधी एवं वृत्तिमान् अत्यन्ताभाव के दोनों ही अप्रतियोगी हैं। एवं एकजातीयसम्बन्ध से अर्थात् स्वरूपसम्बन्ध से सर्वत्र विद्यमान रहना केवलान्वयित्व है, यह नव्यों का लक्षण है। जितने भी केवलान्वयी धर्म हैं, वे सभी स्वरूपसम्बन्ध से सर्वत्र विद्यमान रहते हैं। केवलव्यतिरेकी का लक्षण मूलकार करते हैं—“व्यतिरेकमात्रव्याप्तिकं केवल- व्यतिरेकि” इति। अर्थात् जिस हेतु में व्यतिरेकव्याप्ति ही हो अन्वयव्याप्ति न हो, वह केवलव्यतिरेकी लिङ्ग है। अर्थात् “निश्चयविषयीभूतअन्वयव्याप्ति से रहित होते हुए व्यतिरेकव्याप्तिमत्त्व” केवलव्यतिरेकित्व है। जैसे—“पृथिवी इतरेभ्यो भिद्यते गन्धवत्त्वात्” यहाँ गन्धवत्त्व-हेतु केवलव्यतिरेकी है। ४