तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
१. पदार्थ निरूपण: सप्त पदार्थ एवं द्रव्य-लक्षण प्रकरण
( xvii ) विषयः पृष्ठम् ११६. निमित्तकारणलक्षणनिरूपणम् १५६ ११७. प्रत्यक्षप्रमाणलक्षणनिरूपणम् १५६ ११८. प्रत्यक्षप्रमालक्षणनिरूपणम् १५६-१५७ ११९. निर्विकल्पकप्रत्यक्षलक्षणनिरूपणम् १५७ १२०. सविकल्पकप्रत्यक्षलक्षणनिरूपणम् १५७ १२१. प्रत्यक्षज्ञानहेतुसन्निकर्षभेदानां निरूपणम् १५७-१५९ अनुमानपरिच्छेदः १२२. अनुमानलक्षणनिरूपणम् १६० १२३. अनुमितिलक्षणनिरूपणम् १६० १२४. परामर्शस्वरूपनिरूपणम् १६० १२५. व्याप्तिस्वरूपनिरूपणम् १६० १२६. पक्षधर्मतास्वरूपनिरूपणम् १६१ १२७. स्वार्थानुमानस्वरूपनिरूपणम् १६२ १२८. परार्थानुमानस्वरूपनिरूपणम् १६२ १२९. पञ्चावयवनिरूपणम् १६३ १३०. त्रिविधलिङ्गनिरूपणम् १६३-१६५ १३१. पक्षलक्षणनिरूपणम् १६५ १३२. सपक्षलक्षणनिरूपणम् १६६ १३३. विपक्षलक्षणनिरूपणम् १६६ १३४. हेत्वाभासभेदनिरूपणम् १६६ १३५. सव्यभिचारलक्षणस्य सभेदनिरूपणम् १६६ १३६ साधारणलक्षणनिरूपणम् १६७ १३७. असाधारणलक्षणनिरूपणम् १६७ १३८. अनुपसंहारिलक्षणनिरूपणम् १६७ १३९. विरुद्धलक्षणनिरूपणम् १६७ १४०. सत्प्रतिपक्षलक्षणनिरूपणम् १६८ १४१. असिद्धभेदनिरूपणम् १६८ १४२. आश्रयासिद्धलक्षणनिरूपणम् १६८ १४३. स्वरूपासिद्धलक्षणनिरूपणम् १६८ १०४. व्याप्यत्वासिद्धलक्षणनिरूपणम् १६९ १४५. उपाधिलक्षणनिरूपणम् १६९
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विषयः पृष्ठम् १४६. उपाधिभेदनििरूपणम् १७० १४७. बाधितलक्षणनिरूपणम् १७१ उपमानपरिच्छेदः १४८. उपमानस्वरूपनिरूपणम् १७२ १४९. उपमितिस্বরূপनिरूपणम् १७२ शब्दपरिच्छेदः १५०. शब्दप्रमाणस्वरूपनिरूपणम् १७३ १५१ शक्तिलक्षणनिरूपणम् १७३ १५२. लक्षणास्वरूपतद्भेदनिरूपणम् १७३ १५३. आकाङ्क्षास्वरूपनिरूपणम् १७४ १५४. योग्यतास्वरूपनिरूपणम् १७४ १५५. संनिधिस्वरूपनिरूपणम् १७४ १५६. शाब्दबोधस्वरूपनिरूपणम् १७५ अवशिष्टपरिच्छेदः १५७. अयथार्थानुभवभेदानां संशयविपर्ययतर्काणां प्रत्येकं स्वरूपनिरूपणम् १७६ १५८. स्मृतिभेदनििरूपणम् १७७ १५९. सुखदुःखेच्छानां स्वरूपनिरूपणम् १७७ १६०. द्वेषप्रयत्नधर्माधर्माणां स्वरूपनिरूपणम् १७७–१७८ १६१. आत्ममात्रवृत्तिविशेषगुणानां निरूपणम् १७८ १६२. संस्कारसामान्यलक्षणनिरूपणम् १७८–१७९ १६३. वेगलक्षणनिरूपणम् १७९ १६४. भावनालक्षणनिरूपणम् १७९ १६५. स्थितिस्यापकलक्षणनिरूपणम् १७९ १६६. गुणसामान्यलक्षणनिरूपणम् १७९ १६७. कर्मसामान्यविशेषाणां स्वरूपनिरूपणम् १८० १६८. समवायलक्षणनिरूपणम् १८१ १६९. अयुतसिद्धस्वरूपनिरूपणम् १८१ १७०. प्राग्भावध्वंसात्यन्ताभावानां स्वरूपनिरूपणम् १८१ १७१. अन्योन्याभावस्वरूपनिरूपणम् १८२ १७२. मोक्षस्वरूपनिरूपणम् १८२–१८४
त र्क सं ग्र हः
स्मृतिमात्रेण शेषेषु पादपद्मेषु पूज्ययोः । पित्रोः समर्पितेयं स्यात् कृतिर्मे प्रीतये तयोः ॥
ॐ तर्कसंग्रहः सानुवादः न्यायबोधिनी-कलाद्वयसंवलितः ( हिन्दीव्याख्यासहितपदकृत्योपेतश्च ) प्रत्यक्षपरिच्छेदः निधाय हृदि विश्वेशं विधाय गुरुवन्दनम् । बालानां सुखबोधाय क्रियते तर्कसंग्रहः ॥ हृदय में विश्व के स्वामी परमात्मा को रख कर तथा गुरु की वन्दना कर बालकों को सुखपूर्वक न्याय-पदार्थों का बोध कराने के लिए तर्कसंग्रहनामक ग्रन्थ की रचना की जा रही है । न्यायबोधिनी अखिलागमसञ्चारि श्रीकृष्णाख्यं परं महः । ध्यात्वा गोवर्धनसुधीस्तनुते न्यायबोधिनीम् ॥ चिकीर्षितस्य ग्रन्थस्य निर्विघ्नपरिसमाप्त्यर्थमिष्टदेवतानमस्कारात्मकं मङ्गलं शिष्यशिक्षायै ग्रन्थतो निबध्नाति - निधायेति । हिन्दी-कला यस्मिन् ध्याते भवेत् सिद्धिर्गणनाथे गजानने । सो ऽनुगृह्णातु नस्तूर्णं बुद्धिराशिर्गुणालयः ॥ समस्त आगमों के प्रतिपाद्यतत्त्व श्रीकृष्णनामक सर्वोत्कृष्ट ( लोकोत्तर ) तेज का ध्यान कर गोवर्धननामक न्यायशास्त्र के विद्वान् न्यायाभिमत पदार्थों का बोधक होने के कारण “न्यायबोधिनी” इस यथार्थनामवाली विस्तृत व्याख्या को निर्मित करते हैं । प्रस्तुत व्याख्येय ग्रन्थ तर्कसंग्रह की व्याख्या के प्रारम्भ में मूल ग्रन्थ के कर्ता श्रीअन्नंभट्टद्वारा किये गये इष्टदेवतानमस्कारात्मक मङ्गल का प्रयोजन दर्शाते हुए गोवर्धन सुधी कहते हैं कि चिकीर्षित ( निर्माण के लिए अभीष्ट )
२ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाभावाः सप्त पदार्थाः । द्रव्य-गुण-कर्म-सामान्य-विशेष-समवाय और अभाव ये सात पदार्थ हैं । न्यायबोधिनी अथ पदार्थान् विभजते—द्रव्येति । तत्र सप्तग्रहणं पदार्थत्वं द्रव्यादिस- प्तान्यतमत्वव्याप्यमिति व्याप्तिलाभाय । ननु शक्तिपदार्थस्याष्टमस्य सत्त्वात् कथं सप्तैवेति । तथाहि वह्निसंयुक्ते- न्धनादौ सत्यपि मणिसंयोगे दाहो न जायते, तच्छून्ये तु जायते । अतो मणिसमवधाने शक्तिर्नश्यति मण्यभावदशायां दाहानुकूला शक्तिरुत्पद्यत इति कल्प्यते । तस्मात् शक्तिरतिरिक्तः पदार्थ इति चेत्, न, मणेः प्रतिबन्धकत्वेन मण्यभावस्य कारणत्वेनैव निर्वाहे मणिसमवधानासमवधानाभ्यामनन्त- शक्ति-तद्ध्वंस-तत्प्रागभावकल्पनाया अन्याय्यत्वात् । तस्मात् सप्तैवेति सिद्धम् । हिन्दी-कला ग्रन्थ (तर्कसंग्रह) की निर्विघ्न परिसमाप्ति के लिए ग्रन्थकार श्रीअन्नंभट्ट मन में किये गये मङ्गल को शिष्यों की शिक्षा के लिये, अर्थात् शिष्यगण भी कार्यारम्भ में मंगल किया करें इस अभिप्राय से, ग्रन्थ के आदि में "निधाय हृदि विश्वेशम्" इस श्लोक के रूप में उल्लिखित करते हैं । अब पदार्थों का विभाग करते हैं—द्रव्य गुण कर्म इत्यादि । अर्थात् द्रव्य गुण- कर्म आदि पदार्थ सात होते हैं । यहाँ पदार्थों का विभाग-बोध तो द्रव्य-गुण आदि के पृथक्-पृथक् नामोल्लेख से ही हो जायगा, अतः 'सप्त' इस संख्यावाचक पद का उल्लेख व्यर्थ है—ऐसी शङ्का नहीं की जा सकती है । क्योंकि "पदार्थत्वधर्म द्रव्यादिसप्तान्य- तमत्व का व्याप्य है" इस व्याप्ति का बोध कराने के लिये मूलकार ने सप्त-ग्रहण किया है । अर्थात् "जहाँ-जहाँ पदार्थत्व है वहाँ-वहाँ द्रव्यादिसप्तान्यतमत्व है" इस व्याप्ति का लाभ होने से सभी पदार्थ द्रव्यादि सात के अन्तर्गत ही समाविष्ट हैं, इनसे अतिरिक्त कोई पदार्थ नहीं है, यह सूचित करने के लिये मूल में 'सप्त' पद का उल्लेख किया गया है । शङ्का—मीमांसक आदि को अभिमत शक्ति भी एक अष्टम पदार्थ है, अतः 'सप्तैव पदार्थाः यह कथन कैसे संगत है ? क्योंकि काष्ठादिरूप इन्धन में अग्नि का संयोग रहने पर भी यदि उसमें चन्द्रकान्तमणि का संयोग हो जाय, तो दाह नहीं होता है । किन्तु मणिसंयोग का अभाव रहने पर उस अग्नि से दाह हो जाता है । इसलिये यह कल्पना की जाती है कि मणिसन्निधान की दशा में अग्नि की दाहकता-
न्यायबोधिनी-कलासंवलित ३ तत्र द्रव्याणि पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशकालदिगात्ममनांसि नवैव । रूपरसगन्धस्पर्शसंख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागपरत्वापर- त्वगुरुत्वद्रवत्वस्नेहशब्दबुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मसंस्कारा- श्चतुर्विशतिगुणाः । पदार्थों के अन्तर्गत द्रव्य नव ही होते हैं, पृथिवी-अप् (जल)-तेज-वायु-आकाश- काल-दिक् (दिशा) आत्मा और मन । रूप-रस-गन्ध-स्पर्श-संख्या-परिमाण-पृथक्त्व-संयोग-विभाग-परत्व-अपरत्व-गुरुत्व- द्रवत्व-स्नेह-शब्द-बुद्धि-सुख-दुःख-इच्छा-द्वेष-प्रयत्न-धर्म-अधर्म और संस्कार ये चौबीस गुण हैं। न्यायबोधिनी द्रव्याणि विभजते—पृथिवीति । नन्वन्धकारस्य दशमद्रव्यस्य सत्त्वात् कथं नवैवेति ? तथाहि नीलं तमश्चलतीति प्रतीतेर्नीलरूपाश्रयत्वेन क्रिया- श्रयत्वेन च द्रव्यत्वं सिद्धम् । न च कॢप्तद्रव्येष्वन्तर्भावात् कुतो दशमद्रव्य- त्वमिति वाच्यम् । तमसो रूपवत्त्वात् आकाशादिपञ्चकस्य वायोश्च नीरूप- त्वान्न तेष्वन्तर्भावः । तमसो निर्गन्धत्वान्न पृथिव्यामन्तर्भावः । जलतेजसोः शीतोष्णस्पर्शवत्त्वान्न तयोरन्तर्भावः । तस्मात्तमसो दशमद्रव्यत्वं सिद्धमिति चेत्, न, तेजोऽभावरूपत्वेनैवोपपत्तावतिरिक्ततत्कल्पनायां मानाभावात् । हिन्दी-कला शक्ति नष्ट हो जाती है और मणि के हट जाने पर उसमें पुनः दाहानुकूल शक्ति उत्पन्न हो जाती है । इससे सिद्ध होता है कि शक्तिनामक अतिरिक्त आठवां पदार्थ भी है । समाधान—दाह के प्रति मणि के प्रतिबन्धक होने से प्रतिबन्धकाभाव के रूप में मण्यभाव को भी सहकारी कारण मानने से ही काम चल जायगा । ऐसी स्थिति में बार-बार मणि के समवधान और असमवधान के कारण अनन्तशक्ति की तथा उसके अनन्त ध्वंस की और अनन्त प्रागभाव की कल्पना अनुचित है । अतः सात ही पदार्थ हैं, यह सिद्ध है । शङ्का—अन्धकार भी दशम द्रव्य है, तब नव ही द्रव्य है, यह कैसे कहा ? क्योंकि "नीलं तमश्चलति" ऐसी प्रतीति होने से नीलरूप एवं चलन क्रिया का आश्रय होने के कारण अन्धकार में भी द्रव्यत्व सिद्ध है । यहाँ ऐसा नहीं कह सकते कि निश्चित पृथिवी आदि नव द्रव्यों में ही तम का भी अन्तर्भाव होने से वह दशम द्रव्य कैसे होगा ? क्योंकि अन्धकार के रूपयुक्त होने से तथा आकाशादि पांच तथा वायु के रूपरहित होने से इनमें अन्धकार का समावेश नहीं हो सकता है । एवं जल और तेज के क्रमशः शीत और उष्ण स्पर्शवाला होने के कारण स्पर्शहीन
४ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः उत्क्षेपणापक्षेपणाकुञ्चनप्रसारणगमनानि पञ्च कर्माणि । परमपरञ्चेति द्विविधं सामान्यम् । नित्यद्रव्यवृत्तयो विशेषा- स्त्वनन्ता एव । समवायस्त्वेक एव । अभावश्चतुर्विधः प्रागभावः, प्रध्वंसाभावोऽत्यन्ताभावोऽन्यो- न्याभावश्चेति । इत्युद्देशग्रन्थः । उत्क्षेपण-अपक्षेपण-आकुञ्चन-प्रसारण और गमन ये पाँच कर्म हैं । पर और अपर दो प्रकार के सामान्य ( जाति ) होते हैं । नित्य द्रव्य में ही रहने वाले विशेष हैं और वे अनन्त हैं । समवाय एक ही है । अभाव चार प्रकारका होता है, प्रागभाव-प्रध्वंसाभाव-अत्यन्ताभाव और अन्योन्या- भाव । यहाँ तक उद्देशग्रन्थ है । अर्थात् यहाँ तक पदार्थों के नाममात्र का कथन किया गया । इनका लक्षण और विशेष विचार आगे होगा । न्यायबोधिनी न च विनिगमनाविरहात् तेज एव तमोऽभावरूपमस्त्विति वाच्यम्, तेज- सोऽभावरूपत्वे सर्वानुभूतोष्णस्पर्शाश्रयद्रव्यान्तरकल्पने गौरवात् । तस्मा- दुष्णस्पर्शगुणाश्रयतया तेजसो द्रव्यत्वं सिद्धम् । तमसि नीलत्वादिप्रतीतिस्तु भ्रान्तिरेव, दीपापसरणक्रियाया एव तत्र भानात् । हिन्दी-कला तम का इन दोनों में भी अन्तर्भाव नही हो सकता है । अतः दशम द्रव्य के रूप में तम सिद्ध हो जाता है । समाधान—तम को तेज का अभावरूप मान लेने से ही काम चल जायगा, अतः अतिरिक्त द्रव्य के रूप में उसकी कल्पना करने में कोई प्रमाण नहीं है । यह नहीं कह सकते कि एकतरपक्षपातिनी युक्ति के अभाव में तेज ही तम का अभाव रूप है और तम द्रव्य है । क्योंकि तेज यदि स्वतन्त्र द्रव्य न होकर तम का अभाव रूप हो तो सभी को अनुभूयमान उष्णस्पर्श का आश्रय कौन होगा ? अर्थात् तब उष्णस्पर्श के आश्रय के रूप में तेज से अतिरिक्त किसी दूसरे द्रव्य की कल्पना करनी पड़ जायगी और वैसा करने में गौरवदोष होगा । इसलिये प्रतीयमान उष्णस्पर्श-गुण के आश्रय के रूप में तेज को तो द्रव्य मानना ही होगा और तम उसका अभावरूप होगा । तम में नीलता की प्रतीति भ्रम है तथा क्रिया की प्रतीति भी दीपक के चलने के कारण भ्रान्ति ही है ।
न्यायबोधिनी-कलासंबलितः ५ तत्र गन्धवती पृथिवी । सा द्विविधा । नित्या अनित्या च । नित्या परमाणुरूपा । अनित्या कार्यरूपा । पुनस्त्रिविधा शरीरेन्द्रि- यविषयभेदात् । शरीरमस्मदादीनाम् । इन्द्रियं गन्धग्राहकं घ्राणम् नासाग्रवर्ति । विषयो मृत्पाषाणादिः । नौ द्रव्यों के अन्तर्गत पृथिवी गन्धवती है । अर्थात् जिसमें गन्ध हो, वह पृथिवी है । वह दो प्रकार की होती है—नित्य पृथिवी और अनित्य पृथिवी । नित्य पृथिवी परमाणुरूप है । अनित्य पृथिवी कार्यरूप है । शरीर-इन्द्रिय और विषय के भेद से कार्यरूप अनित्य पृथिवी फिर तीन प्रकार की होती है । हम लोगों का शरीर अनित्य पृथिवी का एक भेद है । गन्ध को ग्रहण करने वाला तथा नासिका के अग्रभाग में रहने वाला घ्राण इन्द्रियरूप पृथिवी है । मिट्टी पाषाण ( पत्थर ) आदि विषय रूप पृथिवी है । न्यायबोधिनी गन्धवतीति । गन्धवत्त्वं पृथिव्या लक्षणम् । लक्ष्या पृथिवी । पृथिवीत्वं लक्ष्यतावच्छेदकम् । यद्धर्मावच्छिन्नं लक्ष्यं स धर्मो लक्ष्यतावच्छेदकः । यो धर्मो यस्यावच्छेदकः स तद्धर्मावच्छिन्नः । तथा च लक्ष्यतावच्छेदकं पृथिवीत्वं चेत्—लक्ष्यता पृथिवीत्वावच्छिन्ना । गन्धसमानाधिकरणद्रव्यत्व- व्याप्यजातिमत्त्वं पृथिव्या लक्षणम् । हिन्दी-कला गन्धवत्त्व पृथिवी का लक्षण है, पृथिवी लक्ष्य है और पृथिवीत्वधर्म पृथिवी में रहने वाली लक्ष्यता का अवच्छेदक हैं । क्योंकि जिस धर्म से अवच्छिन्न ( युक्त ) लक्ष्य होता है, वह धर्म लक्ष्यता का अवच्छेदक होता है । तथा जो धर्म जिसका अवच्छेदक होता है, उस धर्म से वह अवच्छिन्न कहाता है । जैसे, पृथिवीवृत्ति लक्ष्यता का अवच्छेदक पृथिवीत्व है, अतः पृथिवीगत लक्ष्यता पृथिवीत्व धर्म से अव- च्छिन्न हुई । यहाँ का विशेष विचार संस्कृत-कला व्याख्या में द्रष्टव्य है । मूलोक्त गन्धवत्त्वलक्षण अव्याप्तिदोष से ग्रस्त है । क्योंकि उत्पत्तिकालीन घट में गन्ध नहीं होता है । "उत्पन्नं द्रव्यं क्षणमगुणं निष्क्रियं च तिष्ठति" यह नैयायिकों की मान्यता है । इसलिये न्यायबोधिनीकार पृथिवी के उक्त लक्षण का परिष्कृत रूप स्पष्ट करते हैं— "गन्धसमानाधिकरण-द्रव्यत्व-व्याप्यजातिमत्त्वं पृथिवीत्वम्" यह पृथिवी का निष्कृष्ट लक्षण है । अर्थात् गन्ध के समान अधिकरण में रहनेवाली (जहाँ गन्ध रहता है, वहाँ रहनेवाली) द्रव्यत्व की व्याप्या (न्यूनदेशवृत्ति) पृथिवीत्वजाति जिसमें रहे, वह पृथिवी है । द्रव्यों के अन्तर्गत गन्ध के साथ रहने वाली जाति जिसमें हो, वह पृथिवी है, यह सारांश है ।
६ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः शीतस्पर्शवत्य आपः । ता द्विविधाः । नित्याः अनित्याश्च । नित्याः परमाणुरूपाः अनित्याः कार्य्यरूपाः । पुनस्त्रिविधाः शरीरे- न्द्रियविषयभेदात् । शरीरं वरुणलोके । इन्द्रियं रसग्राहकं रसनं जिह्वाग्रवर्ति । विषयः सरित्समुद्रादिः । उष्णस्पर्शवत्तेजः । तच्च द्विविधम् । नित्यमनित्यञ्च । नित्यं परमाणुरूपम् । अनित्यं कार्य्यरूपम् । पुनस्त्रिविधं शरीरेन्द्रियविषय- भेदात् । शरीरमादित्यलोके प्रसिद्धम् । इन्द्रियं रूपग्राहकं चक्षुः कृष्णताराग्रवर्ति । विषयश्चतुर्विधो भौमदिव्योदर्य्याकरजभेदात् । भौमं वह्न्यादिकम् । अबिन्धनं दिव्यं विद्युदादि । भुक्तस्य परिणाम- हेतुरुदर्यम् । आकरजं सुवर्णादि । शीतल स्पर्श जिसका है, वह जल है । वह दो प्रकार का होता है—नित्य जल और अनित्य जल । नित्य जल परमाणुरूप है । अनित्य जल कार्यरूप है । शरीर-इन्द्रिय और विषय के भेद से कार्यरूप अनित्य जल फिर तीन प्रकार का होता । जल का शरीर वरुणलोक में होता है । रस को ग्रहण करने वाली तथा जिह्वा के अग्रभाग में रहने वाली रसना नामक इन्द्रिय जल की है । नदी समुद्र आदि विषयरूप जल है । जिसका उष्ण स्पर्श है, ऐसा द्रव्य तेज है । वह भी दो प्रकार का होता हैं— नित्य तेज और अनित्य तेज । नित्य तेज परमाणु रूप है । अनित्य तेज कार्यरूप होता है । कार्यरूप अनित्य तेज फिर तीन प्रकार का होता है—शरीर-इन्द्रिय और विषय के भेद से । शरीररूप अनित्य तेज अर्थात् तैजस शरीर आदित्य लोक में प्रसिद्ध (शास्त्र प्रसिद्ध) है । इन्द्रिय रूप तेज चक्षु है, जो रूप का ग्रहण करता है और चक्षुर्गोलक के अन्तर्गत कृष्णतारा के अग्रभाग में स्थित रहता है । विषय रूप तेज चार प्रकार का होता है—भौम-दिव्य-उदर्य और आकरज के भेद से । अग्नि आदि भौम तेज है जल ही जिसका इन्धन है, ऐसा विद्युत् आदि दिव्य तेज है । खाये हुए पदार्थ के परिपाक का हेतु तेज उदर्य तेज है । तथा सुवर्ण आदि आकरज (खान से पैदा हुआ, खनिज) तेज है । न्यायबोधिनी एवं शीतस्पर्शवत्वादिलक्षणेषु जलादीनां लक्ष्यता जलत्वादीनां लक्ष्यता- वच्छेदकत्वं च बोध्यम् । हिन्दी- इसी प्रकार "शीतस्पर्शवत्य आपः" आदि अग्रिम लक्षणों में जल और तेज में लक्ष्यता है तथा जलत्व और तेजसत्व धर्म में लक्ष्यतावच्छेदकत्व है, ऐसा समझना चाहिये ।
न्यायबोधिनी-कलासंवलितः रूपरहितस्पर्शवान् वायुः । स द्विविधः । नित्योऽनित्यश्च । नित्यः परमाणुरूपः । अनित्यः कार्यरूपः । पुनस्त्रिविधः शरीरेन्द्रिय- विषयभेदात् । शरीरं वायुलोके । इन्द्रियं स्पर्शग्राहकं त्वक् सर्वशरीरवर्ति । विषयो वृक्षादिकम्पनहेतुः । शरीरान्तःसञ्चारी वायुः प्राणः । स चैकोऽप्युपाधिभेदात् प्राणापानादिसंज्ञां लभते । रूप से रहित हो और स्पर्श वाला हो, ऐसा द्रव्य वायु है । वह दो प्रकार का होता है – नित्य और अनित्य । नित्य वायु परमाणु रूप है और अनित्य वायु कार्यरूप है । कार्यरूप अनित्य वायु का फिर तीन भेद है- शरीर-इन्द्रिय और विषय । शरीरात्मक वायु वायु लोक में होता है । वायवीय इन्द्रिय त्वचा है, जो स्पर्श का ग्राहक है और समस्त शरीर में व्याप्त है । विषय के रूप में वायु वह है, जो वृक्षादि के कम्पन का हेतु बनता है । वह शरीर के अन्दर सञ्चरण करने वाली विषयभूत वायु प्राण है । वह प्राणवायु एक होता हुआ भी हृदय आदि उपाधि के भेद से पांच प्रकार का होता है और प्राण-अपान-समान-व्यान और उदान संज्ञा को प्राप्त कर जाता है । न्यायबोधिनी एवं पृथिव्यादित्रिकं निरूप्य वायुं निरूपयति- रूपरहितेति । रूप- रहितत्वे सति स्पर्शवत्त्वं वायोर्लक्षणम् । सति सप्तम्या विशिष्टार्थकत्वात् सामानाधिकरण्यसम्बन्धेन रूपत्वावच्छिन्नप्रतियोगिताकाभावविशिष्ट- स्पर्शवत्त्व वायोर्लक्षणम् । विशेषांशानुपदाने स्पर्शवत्त्वमात्रस्य लक्षणत्वे पृथिव्यादित्रिकेऽतिव्याप्तिः, तद्वारणाय विशेषणोपादानम् । तावन्मात्रो- पादाने आकाशादावतिव्याप्तिः, तद्वारणाय विशेष्योपादानम् । हिन्दी-कला इस प्रकार पृथिवी आदि तीन का स्वरूप बताने के बाद मूलकार वायु का स्वरूप बताते हैं- "रूपरहितस्पर्शवान् वायुः" इत्यादि द्वारा । अर्थात् "रूपरहितत्वे सति स्पर्शवत्त्वम्" यह वायु का लक्षण हुआ । यहाँ रूपरहितत्व का अर्थ है- रूपाभाव, अर्थात् रूपत्वावच्छिन्न-प्रतियोगिताकअभाव । 'सति' इस सप्तम्यन्त पद का अर्थ है- विशिष्ट, जिसका स्पर्श पदार्थ के साथ अन्वय होगा । यहाँ रूपाभाव-विशिष्ट स्पर्श का अभिप्राय है- सामानाधिकरण्यसम्बन्ध से रूपभाव-विशिष्ट स्पर्श । अर्थात् समान अधिकरण में रूपाभाव और स्पर्श का रहना अभिप्रेत है । वायु अधिकरण में रूपाभाव के साथ स्पर्श रहता है, इसलिये रूपाभाव-विशिष्ट स्पर्शवत्त्व अर्थात् 'रूपत्वावच्छिन्नप्रतियोगिताकाभाव-विशिष्ट स्पर्शवत्त्व' यह वायु का परिष्कृत लक्षण निष्पन्न हुआ । विशेष संस्कृत-कला व्याख्या में देखिये ।
८ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः न्यायबोधिनी अतिव्याप्तिर्नाम-अलक्ष्ये लक्षणसत्त्वम् । यथा गोः शृङ्गत्वं लक्षणं कृतञ्चेत्-लक्ष्यभूतगोभिन्नमहिष्यादावतिव्याप्तिः, तत्रापि शृङ्गित्त्वस्य विद्यमानत्वात् । अव्याप्तिर्नाम-लक्ष्यैकदेशावृत्तित्वम् । लक्ष्यैकदेशे = लक्ष्य- तावच्छेदकाश्रयीभूते क्वचिल्लक्ष्ये लक्षणासत्त्वमव्याप्तिरित्यर्थः । यथा गोर्नीलरूपवत्त्वं लक्षणं कृतं चेल्लक्ष्यतावच्छेदकाश्रयीभूतश्वेतगवि अव्याप्तिः, तत्र नीलरूपाभावात् । असंभवो नाम लक्ष्यमात्रे कुत्रापि लक्षणासत्त्वम् । यथा गोरेकशफवत्त्वम् । गोसामान्यस्य द्विशफवत्त्वेन एकशफवत्त्वस्य कुत्राप्यसत्त्वात् । अतिव्याप्त्यव्याप्त्यसंभवानां निष्कृष्टलक्षणानि— लक्ष्यतावच्छेदकसामानाधिकरण्यत्वे सति लक्ष्यतावच्छेदकावच्छिन्नप्रतियोगि- ताकभेदसामानाधिकरण्यमतिव्याप्तिः । अव्याप्तिस्तु लक्ष्यतावच्छेदकसमानाधिकरणात्यन्ताभावप्रतियोगित्वम् । असंभवस्तु लक्ष्यतावच्छेदकव्यापकीभूताभावप्रतियोगित्वम् । हिन्दी-कला इस लक्षण में 'रूपाभाव' विशेषण न दिया जाय और स्पर्शवत्त्वमात्र वायु का लक्षण किया जाय तो वायुलक्षण की पृथिवी जल और तेज में अतिव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि स्पर्शमात्र तो पृथिवी आदि में भी है । इसका वारण करने के लिये 'रूपाभाव' विशेषण दिया एवं रूपाभावमात्र वायु का लक्षण करने पर आकाश आदि में वायुलक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । अतः इसका वारण करने के लिये स्पर्शवत्स्वरूप विशेष्य का सन्निवेश किया गया । लक्षण के तीन दोष होते हैं--अतिव्याप्ति, अव्याप्ति और असंभव । अलक्ष्य में लक्षण की सत्ता अतिव्याप्ति है । जैसे, 'शृङ्गित्त्व' यदि गो का लक्षण किया जाय तो यह लक्षण गो से भिन्न महिषी आदि में भी चला जायगा । क्योंकि वहाँ भी शृङ्गित्त्व विद्यमान है । लक्ष्य के एक भाग में लक्षण का न रहना अव्याप्तिदोष है । अर्थात् लक्ष्यतावच्छेदक जो गोत्व, उसके आश्रयभूत किसी एक गो में लक्षण का नहीं रहना अव्याप्ति है । जैसे, गो का लक्षण यदि 'नीलरूपवत्त्व' किया जाय तो लक्ष्यतावच्छेदक- गोत्व का आश्रयीभूत श्वेत-गो में लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि उसमें नीलरूप का अभाव है । लक्ष्यमात्र में कहीं भी लक्षण का न रहना असंभव दोष है । जैसे, गो का लक्षण यदि 'एक शफवत्त्व' किया जाय, तो यह लक्षण असंभवदोष से ग्रस्त होगा । क्योंकि सभी गौओं के दो खुर होने से 'एकशफवत्त्व' किसी भी गो में नहीं है । नव्यन्याय की शैली में अतिव्याप्ति-अव्याप्ति एवं असंभव के निष्कृष्ट लक्षण यों हैं—लक्ष्यतावच्छेदक
न्यायबोधिनी-कलासंवलित ९ शब्दगुणकमाकाशम् । तच्चैकं, विभु नित्यञ्च । शब्द जिसका गुण है, ऐसा द्रव्य आकाश है। वह एक, विभु और नित्य है। न्यायबोधिनी आकाशं लक्षयति—शब्दगुणकमिति । गुणपदमाकाशे शब्द एव विशेषगुण इति द्योतनाय न त्वतिव्याप्तिवारणाय, समवायेन शब्दवत्त्वमात्र- स्य सम्यक्त्वात् । तच्चैकमिति । अनेकत्वे मानाभावादिति भावः । विभ्विति । सर्वमूर्तद्रव्य- संयोगित्वं विभुत्वम् । मूर्तत्वं च क्रियावत्त्वम् । पृथिव्यप्तेजोवायुमनांसि मूर्तानि । पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशेतिपञ्चकं भूतपदवाच्यम् । भूतत्वं नाम बहिरिन्द्रियग्राह्यविशेषगुणवत्त्वम् । हिन्दी-कला के अधिकरण में रहते हुए लक्ष्यतावच्छेदकावच्छिन्नप्रतियोगिताक-भेद के अधिकरण में भी लक्षण का रहना अतिव्याप्ति है। अर्थात् लक्ष्य में रहते हुए लक्ष्य से भिन्न में भी लक्षण का रहना अतिव्याप्ति है। लक्ष्यतावच्छेदक के अधिकरण में रहनेवाला जो अभाव, उसका प्रतियोगी होना अव्याप्ति है। अर्थात् लक्ष्य में ही कहीं लक्षण का अभाव रहना अव्याप्ति है। और लक्ष्यतावच्छेदक का व्यापकीभूत जो अभाव, उसका प्रतियोगी होना असंभवदोष है। अर्थात् लक्ष्यमात्र में जिस लक्षण का अभाव हो, वह लक्षण असंभवदोष से ग्रस्त है। ‘शब्दगुणकत्व’ आकाश का लक्षण है। अर्थात् शब्द जिसका गुण है, वह आकाश है। यद्यपि ‘शब्द गुण है’ यह बात सुप्रसिद्ध ही है, अतः शब्द को गुण शब्द से यहाँ उल्लेख करना अनावश्यक है, तथापि “आकाश में शब्द ही एकमात्र विशेषगुण है” यह सूचित करने के लिये ही गुण पद कहा है, न कि कहीं अतिव्याप्ति का वारण करने के लिये। क्योंकि अतिव्याप्तिवारण के लिये तो ‘समवायसम्बन्ध से शब्दाश्रयत्व’ मात्र ही लक्षण पर्याप्त होता। वह आकाश एक है और विभु है, क्योंकि अनेक होने में कोई प्रमाण नहीं है। सभी मूर्त-द्रव्यों के साथ संयुक्त होना विभुत्व है। क्रियायुक्त होना मूर्तत्व है। क्रिया- युक्त होने के कारण पृथिवी, जल, तेज, वायु और मन ये पांच मूर्त द्रव्य कहे जाते हैं। अब तक पृथिवी-जल-तेज-वायु और आकाश के लक्षण किये गये। पृथिवी आदि पांच ‘भूत’ पद से कहे जाते हैं। जिसका विशेषगुण बहिरिन्द्रिय से (चक्षुरादि से) ग्राह्य हो, वह भूत है। जैसे, पृथिवी का विशेषगुण गन्ध घ्राणरूप-बाह्येन्द्रिय से गृहीत होने के कारण पृथिवी भूत है। इसी प्रकार जल, तेज, वायु और आकाश को भी भूत सम- झना चाहिये।
१० तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः अतीतादिव्यवहारहेतुः कालः । स चैको विभुर्नित्यश्च । प्राच्यादिव्यवहारहेतुर्दिङ् । सा चैका नित्या विभ्वी च । ज्ञानाधिकरणमात्मा । स द्विविधः । जीवात्मा परमात्मा चेति । तत्रेश्वरः सर्वज्ञः परमात्मा एक एव । जीवस्तु प्रतिशरीरं भिन्नो विभुर्नित्यश्च । अतीत आदि ( भूत, भविष्यत् और वर्तमान ) व्यवहार का हेतु काल है । वह भी एक, विभु और नित्य है । प्राची आदि ( पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण आदि ) व्यवहार का हेतु दिक् है । वह भी एक, विभु और नित्य है । ज्ञान का अधिकरण ( आश्रय ) आत्मा है । वह दो प्रकार का होता है— जीवात्मा और परमात्मा । उनमें परमात्मा ईश्वर ( ऐश्वर्य से युक्त ) है, सर्वज्ञ ( सब कुछ जानने वाला ) है और एक है । किन्तु जीव ( जीवात्मा ) प्रत्येक शरीर में भिन्न भिन्न है विभु ( कारक ) है और नित्य है । न्यायबोधिनी कालं लक्षयति—अतीतेति । व्यवहारहेतुत्वस्य लक्षणत्वे घट इति व्यवहारहेतुभूतघटादावतिव्याप्तिः । तद्वारणाय अतीतादीति विशेषणो- पादानम् । दिशो लक्षणमाह—प्राच्येति । उदयाचलसन्निहिता या दिक् सा प्राची । अस्ताचलसन्निहिता या दिक् सा प्रतीची । मेरोः सन्निहिता या दिक् सोदीची । मेरोर्व्यवहिता या दिक् साऽवाची । हिन्दी-कला अतीत अनागत आदि व्यवहार का हेतु काल है । यहाँ यदि व्यवहारहेतुत्वमात्र काल का लक्षण किया जाय तो 'घटः' इस व्यवहार का हेतु घटविषय में भी काललक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । अतः इस दोष का वारण करने के लिये “अतीत आदि” यह व्यवहार का विशेषण कहा गया । काल भी एक, विभु और नित्य द्रव्य है । प्राची प्रतीची ( पूर्व पश्चिम ) आदि व्यवहार का हेतु दिक् (दिशा) है । उदया- चल ( उदयपर्वत ) से सन्निहित दिशा प्राची है । अस्ताचल से सन्निहित दिशा प्रतीची है । सुमेरु से सन्निहित दिशा उदीची है और मेरु से व्यवहित दिशा अवाची (दक्षिण) है ।
न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ११ सुखाद्युपलब्धिसाधनमिन्द्रियं मनः । तच्च प्रत्यात्मनियतत्वा- दनन्तं परमाणुरूपं नित्यञ्च । चक्षुर्मात्रग्राह्यो गुणो रूपम् । तच्च शुक्ल-नील-पीत-रक्त- हरित-कपिश-चित्रभेदात् सप्तविधम् । पृथिवीजलतेजोवृत्ति । तत्र पृथिव्यां सप्तविधम् । अभास्वरशुक्लं जले । भास्वरशुक्लं तेजसि । सुख दुःख आदि की उपलब्धि ( प्रत्यक्ष ) का साधनभूत इन्द्रिय मन है । वह मन प्रत्येक आत्मा के साथ नियत ( संबद्ध ) होने के कारण अनन्त है, परमाणुरूप और नित्य है । केवल चक्षुरिन्द्रिय से ग्रहण किया जाने वाला गुण रूप है । वह रूप शुक्ल-नील- पीत-रक्त ( लाल ) हरित-कपिश ( भूरा ) और चित्र ( चितकबरा ) के भेद से सात प्रकार का होता है । रूप पृथिवी-जल और तेज में रहता है । पृथिवी में पूर्वोक्त सातों प्रकार का रूप रहता है । जल में नहीं चमकने वाला शुक्ल रूप रहता है और तेज में चमकने वाला शुक्ल रूप रहता है । न्यायबोधिनी आत्मानं निरूपयति—ज्ञानाधिकरणमिति । अधिकरणपदं समवायेन ज्ञानाश्रयत्वलाभार्थम् । मनो निरूपयति-सुखादीति । उपलब्धिर्नाम साक्षात्कारः । तथा च सुख- दुःखादिसाक्षात्कारकारणत्वे सति इन्द्रियत्वम् मनसो लक्षणम् । इन्द्रियत्वमा- त्रोक्तौ चक्षुरादावतिव्याप्तिरतः सुखादिसाक्षात्कारकारणत्वविशेषणम् । विशेष्यानुपादाने आत्मन्यतिव्याप्तिः, आत्मनः सुखादिकं प्रति समवायि- कारणत्वात् । अत इन्द्रियत्वरूपविशेष्योपादानम् । हिन्दी-कला 'ज्ञानाधिकरणत्व' यह आत्मा का लक्षण है । यहाँ अधिकरणपद देने से समवाय सम्बन्ध से ज्ञानाश्रयत्व का लाभ होता है। अन्यथा ज्ञान का सम्बन्धी तो विषय भी है, किन्तु वह आत्मा नहीं है । सुखादि के साक्षात्कार का साधन इन्द्रिय मन है। अर्थात् सुख दुःखादि के साक्षा- त्कार का कारण होते हुए इन्द्रिय होना मनका लक्षण है। यहाँ लक्षण में यदि इन्द्रित्व- मात्र कहा जाय तो चक्षुः आदि में भी मन का लक्षण अतिव्याप्त हो जायगा । अतः इस अतिव्याप्ति के निवारणार्थ "सुखादि-साक्षात्कार-कारणत्व" यह विशेषण दिया । यदि इन्द्रियत्वरूप विशेष्य का सन्निवेश न किया जाय तो आत्मा में भी मनलक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । क्योंकि सुखादि के प्रति आत्मा के समवायिकारण होने से वह भी सुखादि के साक्षात्कार में हेतु होता ही है । इस अतिव्याप्ति दोष के निवा-
१२ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः न्यायबोधिनी रूपं लक्षयति—चक्षुरिति । चक्षुर्मात्रग्राह्यत्वविशिष्टगुणत्वं रूपस्य लक्षणम् । विशेष्यमात्रोपादाने रसादावतिव्याप्तिः, अतश्चक्षुर्मात्रग्राह्यत्व- विशेषणम् । तावन्मात्रोपादाने रूपत्वेऽतिव्याप्तिः । यो गुणो यदिन्द्रियग्राह्य- स्तन्निष्ठा जातिस्तदिन्द्रियग्राह्येति नियमात्, तद्वारणार्य विशेष्योपादानम् । चक्षुर्मात्रग्राह्यत्वं नाम चक्षुर्भिनेन्द्रियाग्राह्यत्वे सति चक्षुर्ग्राह्यत्वम् । मात्रपदानुपादाने संख्यादिसामान्यगुणेऽतिव्याप्तिः चक्षुर्ग्राह्यत्वविशिष्टगुण- त्वस्य तत्रापि सत्त्वात्, अतस्तद्वारणार्य मात्रपदम् । सङ्ख्यादेश्चक्षुर्भिन्न- त्वगिन्द्रियग्राह्यत्वात् चक्षुर्मात्रग्राह्यत्वं नास्ति । अतीन्द्रियगुरुत्वादावति- व्याप्तिवारणाय चक्षुर्ग्राह्यँति । अत्र लक्षणे ग्राह्यत्वं नाम प्रत्यक्षविषय- त्वम् । अग्राह्यत्वं नाम तदविषयत्वम् । तथा च चक्षुर्भिनेन्द्रियजन्यप्रत्यक्षा- विषयत्वे सति चक्षुर्जिन्यप्रत्यक्षविषयत्वमिति फलितोऽर्थः । ननु प्रभाघटसंयोगे रूपलक्षणस्यातिव्याप्तिस्तस्य चक्षुर्मात्रग्राह्यगुणत्वा- दिति चेन्न, गुणपदस्य विशेषगुणपरत्वात् । न चैवं विशेषगुणत्वघटितलक्षणे सङ्ख्यादावतिव्याप्त्यभावान्मात्रपदवैयर्थ्यमिति वाच्यम्, जलमात्रवृत्तिसां- सिद्धिकद्रवत्वादावतिव्याप्तिवारणाय तदुपादानात् । अथवा चक्षुर्मात्रग्राह्यजातिमद्गुणत्वस्य लक्षणत्वान्न प्रभाघटसंयोगादाव- तिव्याप्तिः, संयोगत्वजातेश्चक्षुर्मात्रग्राह्यत्वाभावात् । घटपटसंयोगस्य त्वगि- न्द्रियग्राह्यत्वात् तद्गतजातेरपि त्वगिन्द्रियग्राह्यत्वात् । यो गुणो यदिन्द्रिय- ग्राह्यस्तन्निष्ठजातेरपि तदिन्द्रियग्राह्यत्वात् । अत्र जातिघटितलक्षणे गुणत्वानुपादाने चक्षुर्मात्रग्राह्यजातिमति सुवर्णादावतिव्याप्तिरतस्तद्- वारणाय तदुपादानम् । एवं रसादिलक्षणे विशेषणानुपादाने लक्ष्यभिन्न- गुणादावतिव्याप्तिः । विशेष्यानुपादाने लक्ष्यमात्रवृत्तिरसत्वगन्धत्वादावति- व्याप्तिः, अतो विशेषणविशेष्ययोरुभयोरुपादानम् । हिन्दी-कला रण के लिये 'इन्द्रियत्व' रूप विशेष्यपद का उल्लेख किया । आत्मा तो इन्द्रिय नहीं है । 'चक्षुर्मात्रग्राह्यत्व-विशिष्ट गुणत्व' यह रूप का लक्षण है। यहाँ यदि 'गुणत्व' इस विशेष्यमात्र का ग्रहण किया जाय तो रसादि में भी रूपलक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । क्योंकि रसादि भी गुण है । इस दोष का निवारण करने के लिये 'चक्षु- र्मात्रग्राह्यत्व' विशेषण कहा । यदि यह विशेषणमात्र दिया जाय और 'गुणत्व' विशेष्य न कहा जाय तो रूपत्व में भी रूपलक्षण की अतिव्याप्ति होने लगेगी । क्योंकि "जो गुण जिस इन्द्रिय से ग्राह्य होता है, उसमें रहने वाली जाति भी उसी
न्यायबोधिनी-कलासंवलितः १५ हिन्दी-कला इन्द्रिय से ग्राह्य होती है" इस नियम के अनुसार रूपत्व-जाति भी चक्षुर्मात्रग्राह्य है। अतः रूपत्व में रूपलक्षण की अतिव्याप्ति का वारण करने के लिये 'गुणत्व' यह विशेष्य कहा। रूपत्व तो गुण नहीं है, किन्तु एक जाति है। यहाँ रूपलक्षण में चक्षुर्मात्रग्राह्यत्व का अर्थ है—चक्षु से भिन्न जो रसना-घ्राण आदि इन्द्रियाँ हैं, उनसे अग्राह्य होते हुए चक्षु से ग्राह्य होना। इतना अर्थ मात्रपद के देने से निकलता है। यदि मात्रपद न दिया जाय तो संख्या आदि सामान्यगुणों में रूपलक्षण की अतिव्या प्त हो जायगी। क्योंकि 'चक्षुर्ग्राह्यगुणत्व' संख्यादि में भी है। अतः इस दोष के निवारणार्थ मात्रपद दिया। क्योंकि संख्यादि सामान्यगुण चक्षु से भिन्न त्वगिन्द्रिय से भी ग्राह्य होने से चक्षुर्मात्र ग्राह्य नहीं है। अतीन्द्रिय गुरुत्वादि- गुण में लक्षण की अतिव्याप्ति न हो, इसके लिए चक्षुर्ग्राह्यत्व पद दिया। गुरुत्वगुण तो चक्षुर्ग्राह्य नहीं है। इस लक्षण में ग्राह्यत्व का अर्थ है 'प्रत्यक्ष का विषय होना' तथा अग्राह्यत्व का अर्थ है 'प्रत्यक्ष का अविषय होना'। इस प्रकार "चक्षु से भिन्न जो घ्राणादि इन्द्रिय, उससे जन्य प्रत्यक्षका जिसमें अविषयत्व हो तथा चक्षुरिन्द्रियजन्य प्रत्यक्ष का विषयत्व जिस गुण में हो, वह रूप है। यह रूपलक्षण का फलितार्थ है। शङ्का—उक्त लक्षण की अतिव्याप्ति प्रभा-घट के संयोग में हो जायगी, क्योंकि प्रभाघट का संयोग भी चक्षुर्मात्रग्राह्य गुण है। समाधान—लक्षण में गुणपद के विशेषगुणपरक होने से यह दोष नहीं होगा। क्योकि संयोग विशेषगुण नहीं है। शङ्का—लक्षण में विशेषगुणत्व का निवेश करने पर संख्या आदि सामान्यगुण में स्वतः अतिव्याप्ति न होगी, ऐसी स्थिति में चक्षुर्मात्रग्राह्यत्व न कहकर 'चक्षुर्ग्राह्यत्व' इतना ही कहना चाहिये, मात्रपद व्यर्थ है। समाधान —जलमात्र में रहनेवाले सांसिद्धिकद्रवत्व में रूपलक्षण की अति- व्याप्ति के वारण के लिये मात्रपद का उपादान आवश्यक है। अन्यथा सांसिद्धिक- द्रवत्व के विशेषगुण होने से मात्रपद के बिना उसमें अतिव्याप्ति का निवारण न हो पाता। अथवा जो जाति चक्षुर्मात्र से ग्राह्य हो, तादृशजातिमद् ( जातिविशिष्ट ) गुणत्व रूप का लक्षण है। अतः गुणपद को विशेषगुणपरक माने बिना भी प्रभाघटसयोग में रूपलक्षण की अतिव्याप्ति न होगी। क्योंकि संयोगत्वजाति चक्षुर्मात्रग्राह्य जाति नहीं है। कारण, प्रभाघटसंयोग भले ही चक्षुर्मात्रग्राह्य हो किन्तु तद्गत संयोगत्व- जाति चक्षुर्मात्रग्राह्य नहीं है। क्योंकि घट और पट का संयोग चक्षु से भी ग्राह्य होता है ओर त्वगिन्द्रिय से भी ग्राह्य होता है। अतः उस संयोग में रहनेवाली संयोगत्वजाति भी त्वगिन्द्रिय ग्राह्य होगी। क्योंकि "जो गुण जिस इन्द्रिय से गृहीत होता है, उसमें रहनेवाली जाति भी उस इन्द्रिय से ग्राह्य होती है" यह नियम है।
१४ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्ष परिच्छेदः रसनग्राह्यो गुणो रसः । स च मधुराम्ललवणकटुकषायतिक्त- भेदात् षड्विधः । पृथिवीजलवृत्तिः । तत्र पृथिव्यां षड्विधः । जले मधुर एव । घ्राणग्राह्यो गुणो गन्धः । स च द्विविधः । सुरभिरसुरभिश्च । पृथिवीमात्रवृत्तिः । त्वगिन्द्रियमात्रग्राह्यो गुणः स्पर्शः । स च त्रिविधः, शीतोष्णा- ऽनुष्णाऽशीतभेदात् । पृथिव्यप्तेजोवायुवृत्तिः । तत्र शीतो जले । उष्णस्तेजसि । अनुष्णाऽशीतः पृथिवीवाय्वोः । रसना-इन्द्रिय से ग्रहण किया जानेवाला गुण रस है। और वह मधुर (मीठा) अम्ल (खट्टा) लवण (नमकीन) कटु (कडुआ) कषाय (कसैला) तिक्त (तीता) के भेद से छः प्रकार का होता है। रस-गुण पृथिवी और जल में रहता है। पृथिवी में पूर्वोक्त छहों प्रकार का रस रहता है। जल में केवल मधुर रस रहता है। घ्राण इन्द्रिय से ग्रहण किया जाने वाला गुण गन्ध है। वह दो प्रकार का होता है—सुरभि (सुगन्ध) और असुरभि (दुर्गन्ध) गन्ध-गुण केवल पृथिवी में रहता है। त्वगिन्द्रिय (त्वचा इन्द्रिय) मात्र से ग्रहण किया जानेवाला गुण स्पर्श है। वह शीत-उष्ण और अनुष्णाशीत भेद से तीन प्रकार का होता है। स्पर्श-गुण पृथिवी-जल- तेज और वायु में रहता है। उनमें शीतस्पर्श जल में रहता है, उष्णस्पर्श तेज में रहता है और अनुष्णाशीत (न उष्ण न शीत) स्पर्श पृथिवी और वायु में रहता है। हिन्दी-कला एवं प्रभाघटसंयोग में तथा घटपटसंयोग में एक ही संयोगत्व जाति है। ऐसी स्थिति में प्रभा-घटसंयोग के चक्षुर्मात्रग्राह्यजातिमान् गुण नहीं होने से प्रभा-घट- संयोग में अतिव्याप्ति न होगी। अतः इस जातिघटित लक्षणपक्ष में गुणपद को विशेषगुणपरक मानने की कोई आवश्यकता नहीं है। इस जातिघटितलक्षण में भी 'गुणत्व' पद देना ही होगा, अन्यथा सुवर्ण में रूप- लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी। क्योंकि सुवर्ण में रहनेवाली सुवर्णत्वजाति चक्षुर्मात्रग्राह्य जाति है। रूप के समान सुवर्ण के भी चक्षुर्मात्रग्राह्यजातिमान् होने से उसमें रूपलक्षण की अतिव्याप्ति का वारण करने के लिये 'गुणत्व' पद देना आवश्यक है। रूप के समान ही रसादि के लक्षण में भी विशेषणभाग न देने पर लक्ष्य से भिन्न गुण में अतिव्याप्ति हो जायगी तथा विशेष्यभाग न देने पर लक्ष्यमात्र में
न्यायबोधिनी-कलासंबलितः १५ रूपादिचतुष्टयं पृथिव्यां पाकजमनित्यञ्च । अन्यत्रापाकजं नित्यमनित्यञ्च । नित्यगतं नित्यम् । अनित्यगतमनित्यम् । रूप आदि ( रूप-रस-गन्ध-स्पर्श ) चार पृथिवी में पाक से ( विलक्षण तेज के संयोग से ) उत्पन्न होते हैं और अनित्य हैं । और पृथिवी से भिन्न में अपाकज होते हैं तथा नित्य भी हैं और अनित्य भी हैं । नित्य द्रव्य में रहने वाले रूपादि नित्य होते हैं और अनित्य द्रव्य में रहने वाले रूपादि अनित्य होते हैं । न्यायबोधिनी स्पर्शं लक्षयति त्वगिन्द्रियमात्रग्राह्य इति । अत्रापि मात्रपदं संख्यादि- सामान्यगुणादावतिव्याप्तिवारणाय । अन्यविशेषणकृत्यं पूर्ववद्बोध्यम् । ग्राह्यत्वपदार्थोऽपि पूर्ववदेव प्रत्यक्षविषयत्वरूप एव बोध्यः । रूपादिचतुष्टयमिति । एतत्तत्वनिर्णयश्चेत्थम्—पाको नाम विजाती- यतेजः संयोगः । स च नानाजातीयरूपजनको विजातीयः तेजःसंयोगः । तदपे- क्षया रसजनको विजातीयः । एवं गन्धजनकोऽपि ततो विजातीय एव । एवं स्पर्शजनकोऽपि तथैव । एवं प्रकारेण भिन्नभिन्नजातीयाः पाकाः कार्य- वैलक्षण्येन कल्पनीयाः । यथा तृणपुञ्जनिक्षिप्त आम्रादौ उष्मलक्षणविजातीयतेजःसंयोगात् पूर्वहरितरूपनाशेन रूपान्तरस्य पीतादेरुत्पत्तिर्न तु रसादेरुत्पत्तिः । पूर्वरस- स्याम्लस्यैवानुभवात् । क्वचित् पूर्वहरितरूपसत्त्वेऽपि रसपरावृत्तिर्दृश्यते । विजातीयतेजःसंयोगरूपपाकवशात् पूर्वतनाम्यरसनाशेन मधुररसस्यानु- भवात् । तस्माद् रूपजनकापेक्षया रसजनको विलक्षण एवाङ्गीकार्यः । एवं गन्धजनको विलक्षण एव, रूपरसयोरपरावृत्तावपि पूर्वगन्धना- शेऽपि विजातीयपाकवशात् सुरभिगन्धोपलब्धेः । एवं स्पर्शजनकपाक- वशात् कठिनस्पर्शनाशेन मृदुस्पर्शानुभवात् । तस्माद्रूपादिजनका विजातीया एव पाकाः । अत एव पार्थिवपरमाणूनामेकजातीयत्वेऽपि पाकमहिम्ना विजातीयद्रव्यान्तरानुभवः । यथा गोभुक्ततृणादीनामापरमाण्वन्तभङ्गे हिन्दी-कला में रहनेवाली रसत्व-गन्धत्व आदि जाति में रसादिलक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । अतः रसादि के लक्षण में भी विशेषण-विशेष्य दोनों का उपादान आव- श्यक है । ऐसा जानना चाहिये । त्वगिन्द्रियमात्रग्राह्यणत्व स्पर्श का लक्षण है । यहाँ भी मात्रपद का उपा- दान संख्या आदि सामान्यगुणों में अतिव्याप्तिवारण के लिये है । अन्य विशेषणों का प्रयोजन रूपलक्षण के समान ही समझना चाहिये । 'ग्राह्यत्व' पद का अर्थ भी पूर्व के समान ही प्रत्यक्षविषयत्वरूप जानना चाहिये ।
१६ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः न्यायबोधिनी तृणारम्भकपरमाणुषु विजातीयतेजःसंयोगात् पूर्वरूपादिचतुष्टयनाशे तदन- न्तरं दुग्धे यादृशं रूपादिकं वर्तते, तादृशरूपरसगन्धस्पर्शजनकास्तेजःसंयोगाः जायन्ते । तदुत्तरं तादृशरूपरसादय उत्पद्यन्ते । तादृशरूपरसादि- विशिष्टपरमाणुभिर्दुग्धद्वयणुकमारभ्यते, ततस्त्र्यणुकादिक्रमेण महादुग्धा- रम्भः । एवं दुग्धारम्भकैः परमाणुभिरेव दध्यारभ्यते । एवं पाकमहिम्ना दध्यारम्भकैरेव परमाणुभिर्नवनीतादिकमिति दिक् । हिन्दी-कला रूप-रस-गन्ध और स्पर्श ये चारों गुण पृथिवी में पाकज (पाक से होनेवाले) एवं अनित्य हैं । इसका स्पष्टीकरण यों है—विलक्षण तेज का संयोग पाक है। यह तेजः- संयोग भी विलक्षण ही होता है, जिससे रूप में ही नील-पीत आदि अनेकविध रूप की उत्पत्ति होती है । ऐसे ही रूपजनक तेज संयोग की अपेक्षा रसजनक तेजः- संयोग विलक्षण ही होता है । ऐसे ही गन्धजनक तेजःसंयोग उससे विलक्षण और स्पर्शजनक तेजःसंयोग उससे विलक्षण होता है । इस प्रकार कार्य की विलक्षणता को देखते हुए भिन्न-भिन्न जाति के विलक्षण पाकों ( तेजःसंयोगों ) की कल्पना की जाती है । जैसे, तृण की ढेर में रखे किसी आम आदि फल में ऊष्मानामक विलक्षण तेज के संयोग से पूर्व हरो रूप का नाश होकर पीले रूप की उत्पत्ति हो जाती है, किन्तु रस ज्यों का त्यों खट्टा ही रह जाता है, क्योंकि उसमें खट्टापन का ही अनुभव होता है । कहीं तो पूर्व हरितरूप ज्यों का त्यों रह जाता है और रस में परिवर्तन हो जाता है । क्योंकि वहाँ विजातीय तेजःसंयोगरूप पाक के कारण खट्टे रस के नाश से मधुर रस का ही अनुभव होता है । इससे यह स्वीकार करना पड़ता है कि रूपजनक पाक की अपेक्षा रसजनक पाक विलक्षण है । ऐसे ही गन्धजनक तेजःसंयोग भी विलक्षण ही होता है । क्योंकि रूप-रस के नहीं बदलने पर भी पूर्वगन्ध का नाश होकर सुरभिगन्ध की उत्पत्ति देखी जाती है । एवं स्पर्शजनक भी पाक विलक्षण ही है । क्योंकि वहाँ कठिनस्पर्श का नाश होकर मृदुस्पर्श की अनुभूति होती है । इसलिये रूपादि के जनक पाक विलक्षण ही होते हैं । इसीलिये पार्थिव परमाणु के समान होने पर भी पाक की महिमा से विजातीय द्रव्यान्तर का अनुभव होता है । जैसे गायद्वारा चर्वित तृण आदि का परमाणुपर्यन्त भंग हो जाने पर तृण के उत्पादक परमाणुओं में विजातीय तेजःसंयोग से पूर्व के रूप-रस-गन्ध और स्पर्श नष्ट हो जाते हैं और बाद में दूध के अनुरूप रूप-रस-गन्ध-स्पर्श के जनक तेजःसंयोग पैदा होने के बाद दूध के परमाणुओं में रूप-रस-गन्ध और स्पर्श पैदा हो जाते हैं ।