तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन्यायबोधिनी-कलासंवलितः ३७ श्रोत्रेण शब्दसाक्षात्कारे समवायः सन्निकर्षः, कर्णविवरवर्त्या- काशस्य श्रोत्रत्वाच्छब्दस्याकाशगुणत्वाद् गुणगुणिनोश्च समवायात् । शब्दत्वसाक्षात्कारे समवेतसमवायः सन्निकर्षः, श्रोत्रसमवेते शब्दे शब्दत्वस्य समवायात् । अभावप्रत्यक्षे विशेषणविशेष्यभावः सन्निकर्षः, घटाभाववद्- भूतलमित्यत्र चक्षुःसंयुक्ते भूतले घटाभावस्य विशेषणत्वात् । श्रोत्रद्वारा शब्द का प्रत्यक्ष करने में समवाय सन्निकर्ष कारण होता है। क्योंकि कान के विवर (बिल) में वर्तमान आकाश ही श्रोत्र है और शब्द आकाश का गुण है तथा गुण और गुणी में समवायसम्बन्ध होता है। शब्दगत-शब्दत्व जाति के साक्षात्कार (प्रत्यक्ष) में समवेतसमवाय सन्निकर्ष कारण है। क्योंकि श्रोत्ररूप आकाश में शब्द समवेत है और उस शब्द में शब्दत्व समवेत है। अर्थात् आकाश में शब्द का और शब्द में शब्दत्व का समवाय है। अभाव के प्रत्यक्ष में विशेषणविशेष्यभाव सन्निकर्ष कारण होता है। क्योंकि “घटाभाववद् भूतलम्” इस ज्ञान में चक्षुःसंयुक्त भूतल में घटाभाव विशेषण है। न्यायबोधिनी श्रवणेन्द्रियस्याकाशरूपत्वेन शब्दस्याकाशगुणत्वेन श्रवणेन्द्रियेण समं समवायः सन्निकर्षः । शब्दवृत्तिशब्दत्वकत्वखत्वादिजातिविषयकश्रावणप्रत्यक्षे समवेत- समवायस्य हेतुता च बोध्या । अभावप्रत्यक्ष इति । अभावप्रत्यक्षे विशेषणविशेष्यभावो नाम विशेषणता- सन्निकर्षः । पञ्चविधसन्निकर्षेषु मध्ये संयोगस्थाने संयुक्तपदं समवायस्थाने समवेतपदं च घटयित्वा अभावस्थले निर्वाह्यम् । तथाहि—द्रव्याधिकरणका- हिन्दी-कला शब्द के साथ श्रवणेन्द्रिय का संयोग सम्बन्ध नहीं हो सकता है। क्योंकि श्रवणे- न्द्रिय आकाशरूप है, और शब्द आकाश का गुण है। इसलिये शब्द और श्रवणेन्द्रिय में गुणगुणिभाव होने के कारण श्रवणेन्द्रिय के साथ शब्द का समवाय-सन्निकर्ष होगा। अतः शब्द के प्रत्यक्ष में समवायसन्निकर्ष कारण होता है। एवं शब्द में रहने वाली शब्दत्व-कत्व-खत्व आदि जातियों के श्रावण-प्रत्यक्ष में समवेतसमवाय- सन्निकर्ष को हेतु जानना चाहिये। अभाव के प्रत्यक्ष में विशेषणविशेष्यभाव नामक विशेषणतासन्निकर्ष कारण होता है। पूर्वोक्त पांच प्रकार के सन्निकर्षों में आये संयोग के स्थान में 'संयुक्त' पद देकर तथा समवाय के स्थान में 'समवेत' देकर अभावस्थल के सन्निकर्षों का निरूपण