तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
पृष्ठ 55, कुल 199 में से
संदर्भ में पढ़ें३६ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः न्यायबोधिनी द्रव्यग्राहकाणीन्द्रियाणि चक्षुस्त्वङ् मनांसि त्रीण्येव, अन्यानि घ्राणरसन- श्रवणानि गुणग्राहकाणि । अतस्त्वगिन्द्रियस्थले द्रव्यवृत्तिलौकिकविषयता- सम्बन्धेन त्वाचप्रत्यक्षत्वावच्छिन्नं प्रति त्वक्संयोगस्य हेतुता । एवं द्रव्यसम- वेतत्वाचप्रत्यक्षत्वावच्छिन्नं प्रति त्वक्संयुक्तसमवायस्य हेतुता । द्रव्यसमवेत- समवेतोष्णत्वशीतत्वादिजातिस्पार्शनप्रत्यक्षे त्वक्संयुक्तसमवेतसमवायस्य हेतुता । एवमात्ममानसप्रत्यक्षे मनःसंयोगस्य हेतुता । आत्मसमवेतसुखादि- मानसप्रत्यक्षे मनःसंयुक्तसमवायस्य हेतुता । आत्मसमवेतसमवेतसुखत्वादि- मानसप्रत्यक्षे मनःसंयुक्तसमवेतसमवायस्य हेतुता । रसनघ्राणयोस्तु रसगन्ध- तद्गतजातिग्राहकत्वेन द्वितीयतृतीययोः सन्निकर्षयोरेव तत्र हेतुता वाच्या । हिन्दी-कला जो समवेत रूपादि, उसमें रहनेवाली जो लौकिकविषयता उस सम्बन्ध से होनेवाले चाक्षुष-प्रत्यक्ष के प्रति अर्थात् द्रव्यसमवेतरूपादिविषयक लौकिक चाक्षुषप्रत्यक्ष के प्रति चक्षुःसंयुक्तसमवायनामक सन्निकर्ष हेतु होता है । ऐसे ही द्रव्यसमवेत रूपादि, उसमें समवेत रूपत्वादि में रहनेवाली जो लौकिकविषयता, उस सम्बन्ध से होनेवाले चाक्षुष के प्रति अर्थात् रूपत्वादिविषयक लौकिक चाक्षुष-प्रत्यक्ष के प्रति चक्षुःसमवेत- समवाय सन्निकर्ष हेतु होता है । द्रव्य का ग्रहण कराने वाली तीन ही इन्द्रियां होती हैं—चक्षुः त्वक् और मन । शेष तीन इन्द्रियां --- घ्राण रसना और श्रोत्र तो गुणका ग्रहण कराती हैं द्रव्य का नहीं । अतः चक्षुः के समान त्वगिन्द्रिय-स्थल में भी द्रव्यविषयक लौकिक त्वाच- प्रत्यक्ष के प्रति त्वक्संयोग कारण है । तथा द्रव्यसमवेत जो स्पर्शादि गुण, तद्विषयक लौकिक त्वाच-प्रत्यक्ष के प्रति त्वक्संयुक्तसमवाय सन्निकर्ष कारण होता है। इसी प्रकार द्रव्यसमवेत जो स्पर्शादि, उसमें समवेत जो शीतलत्वादि जाति, उसके लौकिक त्वाच-प्रत्यक्ष के प्रति त्वक्संयुक्तसमवेतसमवायनामक सन्निकर्ष कारण होता है । इसी प्रकार आत्मविषयक मानस प्रत्यक्ष के प्रति आत्मा के साथ मन का संयोग हेतु होता है । तथा आत्मसमवेतसुखादि के मानस प्रत्यक्ष के प्रति मनःसंयुक्त- समवाय हेतु होता है । तथा आत्म-समवेतसुखादिसमवेतसुखत्वादि जाति के मानस प्रत्यक्ष के प्रति मनःसंयुक्तसमवेतसमवायनामक सन्निकर्ष हेतु होता है । रसनेन्द्रिय और घ्राणेन्द्रिय तो रस और गन्ध गुण का तथा तद्गत रसत्व- गन्धत्वादि जाति की ही ग्राहिका होती हैं, अतः वहाँ संयोग-सन्निकर्ष को छोड़कर संयुक्तसमवाय एवं संयुक्तसमवेतसमवायनामक द्वितीय और तृतीय सन्निकर्ष ही कारण होते हैं ।