तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४० तर्कसंग्रहः [ अनुमानपरिच्छेदः व्याप्तिविशिष्टपक्षधर्मताज्ञानं परामर्शः । यथा वह्निव्याप्य- धूमवानयं पर्वत इति ज्ञानं परामर्शः । तज्जन्यं पर्वतो वह्निमानिति ज्ञानमनुमितिः । व्याप्ति से विशिष्ट (युक्त) पक्षधर्मताज्ञान परामर्श कहलाता है। जैसे, 'वह्नि- व्याप्यधूमवानयं पर्वतः' यह ज्ञान परामर्श है। यहाँ 'वह्निव्याप्य' इससे व्याप्ति विशिष्ट का ज्ञान सूचित हुआ तथा 'धूमवानयं पर्वतः' इससे पक्षधर्मता का ज्ञान सूचित हुआ। अतः यह ज्ञान परामर्श है। इससे उत्पन्न 'पर्वतो वह्निमान्' यह ज्ञान अनुमिति है। न्यायबोधिनी ऽतिव्याप्तिरतस्तद्वारणाय ज्ञानत्वोपादानम् । अनुमितिलक्षणघटकीभूतपरामर्श लक्षणमाचष्टे-व्याप्तिविशिष्टेति । व्या- प्तिविशिष्टं च तत्पक्षधर्मताज्ञानमिति कर्मधारयः । अत्र विशिष्टपदस्य प्रकारतानिरूपकपरत्वात्पक्षधर्मताया ज्ञानमित्यत्र षष्ठ्या विषयत्वबोधनात् धर्मतापदस्य सम्बन्धार्थकत्वात् कर्मधारयसमासेन समस्यमानपदार्थयोर- भेदसंसर्गलाभाच्च व्याप्तिप्रकारकाभिन्नं यत्पक्षसम्बन्धिविषयकं ज्ञानं, तत्प- रामर्श इति लभ्यते । एवं सति धूमो वह्निव्याप्यः आलोकवान्पर्वतः इत्या- हिन्दी-कला उस अतिव्याप्ति के वारण के लिये 'ज्ञानत्व' पद दिया। ध्वंस में ज्ञानत्व नहीं होने से अतिव्याप्ति नहीं हुई। अनुमिति लक्षण के अन्तर्गत समाविष्ट परामर्श का लक्षण मूलकार कहते हैं— व्याप्तिविशिष्ट जो पक्षधर्मताज्ञान, वह परामर्श है। मूलोक्त लक्षणवाक्य में "व्याप्ति- विशिष्टं च तत् पक्षधर्मताज्ञानं च व्याप्तिविशिष्टपक्षधर्मताज्ञानम्" ऐसा कर्मधारय- समास है। यहाँ 'विशिष्ट' यह पद "प्रकारतानिरूपक" इस अर्थ में है। एवं "पक्ष- धर्मताया ज्ञानं पक्षधर्मताज्ञानम्" इस षष्ठीसमास में षष्ठी विभक्ति से विषयत्व सूचित होता है। इससे 'पक्षधर्मताविषयक ज्ञान' यह अर्थ हुआ। पक्षधर्मता में भी 'धर्मता' पद सम्बन्ध अर्थ में है। एवं कर्मधारयसमास में समस्यमान पदार्थों में अभेदसंसर्ग का लाभ होता है। अतः "व्याप्तिविशिष्टपक्षधर्मताज्ञानम्" इस मूल लक्षण से यह निष्कर्ष निकलता है—व्याप्तिप्रकारकाभिन्न जो पक्षसम्बन्धि-(हेतु) विषयक ज्ञान, वह परामर्श है। अर्थात् व्याप्तिप्रकारक-पक्षसम्बन्धिहेतुविशेष्यक-ज्ञान परामर्श है। किन्तु ऐसा लक्षण करने पर "धूमो वह्निव्याप्यः, आलोकवान् पर्वतः" इस प्रकार के समूहालम्बन ज्ञान में भी परामर्श का उक्त लक्षण चला जाता है और लक्षण की