तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथानुमानपरिच्छेदः अनुमितिकरणमनुमानम् । परामर्शजन्यं ज्ञानमनुमितिः । अनुमिति के करण ( असाधारण कारण ) को 'अनुमान' कहते हैं । परामर्श से जन्य ( उत्पन्न ) ज्ञान को 'अनुमिति' कहते हैं । न्यायबोधिनी अनुमानं लक्षयति-अनुमितीति । अनुमितौ व्याप्तिज्ञानं करणं, परामर्शो व्यापारः, अनुमितिः फलं कार्यमित्यर्थः । परामर्शस्य व्याप्तिज्ञानजन्यत्वे सति व्याप्तिज्ञानजन्यानुमितिजनकत्वात्तज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनकत्वरूप- व्यापारत्वमुपपन्नम् । अनुमितिकरणत्वमनुमानस्य लक्षणम् । अनुमानं व्याप्तिज्ञानम् । एतस्य परामर्शरूपव्यापारद्वारा अनुमिति प्रत्यसाधारणका- रणतयाऽनुमितिकरणत्वमुपपन्नम् । परामर्शजन्यमिति । परामर्शजन्यत्वविशिष्टज्ञानत्वमनुमितेर्लक्षणम् । अत्र ज्ञानत्वमात्रोपादाने प्रत्यक्षादावतिव्याप्तिः, अतस्तद्वारणाय परामर्श- जन्यत्वे सतीति विशेषणोपादानम् । परामर्शजन्यत्वमात्रोक्तौ परामर्शध्वंसे- हिन्दी-कला अनुमिति के प्रति जो करण है, वह अनुमान प्रमाण है । अनुमिति में व्याप्ति- ज्ञान करण होता है, परामर्श व्यापार है और अनुमितिरूप फल कार्य है । परामर्श व्याप्तिज्ञान रूप करण से जन्य होता हुआ व्याप्तिज्ञान से जन्य अनुमिति का जनक भी होता है । इसलिये 'तज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनकत्वरूप' व्यापार का लक्षण परामर्श में समन्वित हो जाता है । मूल में "अनुमितिकरणत्व" अनुमान का लक्षण कहा गया है । यहाँ व्याप्तिज्ञान ही अनुमान है । यह व्याप्तिज्ञान परामर्शरूप व्यापार द्वारा अनुमिति के प्रति असाधारण कारण होने से अनुमितिका करण बन गया । परामर्शजन्य ज्ञान अनुमिति है । अतः 'परामर्शजन्यत्वविशिष्टज्ञानत्व' अनुमिति का लक्षण हुआ । यहाँ यदि ज्ञानत्वमात्र को अनुमिति का लक्षण माना जाय तो प्रत्यक्ष- ज्ञान में अनुमितिलक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । अतः अतिव्याप्ति के निवारण के लिये 'परामर्शजन्यत्व' विशेषण दिया । प्रत्यक्ष में परामर्शजन्यत्व नहीं होने से अति- व्याप्ति नहीं हुई । एवं यदि 'परामर्शजन्यत्वमात्र' लक्षण माना जाय तो परामर्शध्वंस में अतिव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि परामर्श का ध्वंस भी परामर्शजन्य होता है । अतः