भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ४१ न्यायबोधिनी कारकसमूहालम्बनेऽप्युक्तपरामर्श लक्षणमस्तीत्यतिव्याप्तिस्तद्वारणाय पक्षनि- ष्ठविशेषतानिरूपिता या हेतुनिष्ठा प्रकारता, तन्निरूपिता या व्याप्तिनिष्ठा प्रकारता, तच्छाालिज्ञानं परामर्श इति निष्कर्षः। एतादृशपरामर्शजन्यत्वे सति ज्ञानत्वमनुमितेर्लक्षणम्। अनुमितिपरमर्शयोर्विशिष्य कार्यकारणभावश्चेत्थम्—पर्वतत्वावच्छि- न्नोद्देश्यता निरूपितसंयोगसम्बन्धावच्छिन्नवह्नित्वावच्छिन्नविधेयताकानुमिति- त्वावच्छिन्नं प्रति, वह्नित्वावच्छिन्नप्रकारतानिरूपितव्याप्तित्वावच्छिन्न- प्रकारतानिरूपिता या धूमत्वावच्छिन्नप्रकारता तन्निरूपितपर्वतत्वावच्छिन्न- विशेष्यताशालिनिर्णयः कारणम्। वह्नित्वावच्छिन्नप्रकारतानिरूपित- व्याप्तित्वावच्छिन्नविशेष्यतायाः धूमत्वावच्छिन्नविशेष्यतानिरूपितव्याप्ति- त्वावच्छिन्नप्रकारतायाश्चाभेदानङ्गीकर्तृ मते वह्नित्वावच्छिन्नप्रकारतानिरू- हिन्दी-कला अलक्ष्य में अतिव्याप्ति हो जाती है। क्योंकि यहां भी व्याप्ति का प्रकारविधया भान होता है और पक्षसम्बन्धी (आलोक) का विषयविधया भान हो रहा है। अतः इस अतिव्याप्तिदोष के निवारणार्थ न्यायबोधिनीकार उक्त लक्षण का परिष्कृत स्वरूप बताते हैं—पक्षनिष्ठविशेष्यतानिरूपिता जो हेतुनिष्ठा प्रकारता, और इस हेतुनिष्ठप्रकारता से निरूपिता जो व्याप्तिनिष्ठा प्रकारता, उस प्रकारतावाला ज्ञान परामर्श है। विशेष विवरण 'संस्कृत-कला' में द्रष्टव्य है। अतः "एवंविधपरामर्श- जन्यत्वे सति ज्ञानत्वम्" यह अनुमितिलक्षण बना। यह अनुमिति और परामर्श का सामान्य कार्यकारणभाव प्रदर्शित हुआ। किन्तु विशेष कार्यकारणभाव यों होगा— पर्वतत्वावच्छिन्ना जो पवतनिष्ठा उद्देश्यता, उससे निरूपिता जो संयोगसम्ब- न्धावच्छिन्ना एवं वह्नित्वधर्मावच्छिन्ना वह्नि निष्ठा विधेयता, तादृशविधेयताक अनु- मितित्वावच्छिन्न (अनुमिति) के प्रति—वह्नित्वावच्छिन्ना जो वह्नि निष्ठा प्रकारता, उससे निरूपिता जो व्याप्तित्वावच्छिन्ना व्याप्तिनिष्ठा प्रकारता, उससे निरूपिता जो • धूमत्वावच्छिन्ना धूमनिष्ठा प्रकारता, उससे निरूपिता जो पर्वतत्वावच्छिन्ना पर्वत- निष्ठा विशेष्यता, तादृशविशेष्यताशाली निश्चय कारण है। यह परिष्कार जगदीश भट्टाचार्य के मतानुसार है, जो एक में रहने वाली प्रकारता और विशेष्यता में अभेद मानते हैं। इसीलिये उक्त कार्यकारणभाव में सर्वत्र प्रकारतानिरूपिता प्रकारता ही कहते हैं। केवल पर्वत में ही प्रकारतानिरूपिता विशेष्यता का कथन करते हैं; क्योंकि पर्वत किसी के प्रति प्रकार नहीं होता है। किन्तु गदाधर भट्टाचार्य प्रकारता और विशेष्यता में अभेद न मानकर अवच्छेद्या-