तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
१० तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः अतीतादिव्यवहारहेतुः कालः । स चैको विभुर्नित्यश्च । प्राच्यादिव्यवहारहेतुर्दिङ् । सा चैका नित्या विभ्वी च । ज्ञानाधिकरणमात्मा । स द्विविधः । जीवात्मा परमात्मा चेति । तत्रेश्वरः सर्वज्ञः परमात्मा एक एव । जीवस्तु प्रतिशरीरं भिन्नो विभुर्नित्यश्च । अतीत आदि ( भूत, भविष्यत् और वर्तमान ) व्यवहार का हेतु काल है । वह भी एक, विभु और नित्य है । प्राची आदि ( पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण आदि ) व्यवहार का हेतु दिक् है । वह भी एक, विभु और नित्य है । ज्ञान का अधिकरण ( आश्रय ) आत्मा है । वह दो प्रकार का होता है— जीवात्मा और परमात्मा । उनमें परमात्मा ईश्वर ( ऐश्वर्य से युक्त ) है, सर्वज्ञ ( सब कुछ जानने वाला ) है और एक है । किन्तु जीव ( जीवात्मा ) प्रत्येक शरीर में भिन्न भिन्न है विभु ( कारक ) है और नित्य है । न्यायबोधिनी कालं लक्षयति—अतीतेति । व्यवहारहेतुत्वस्य लक्षणत्वे घट इति व्यवहारहेतुभूतघटादावतिव्याप्तिः । तद्वारणाय अतीतादीति विशेषणो- पादानम् । दिशो लक्षणमाह—प्राच्येति । उदयाचलसन्निहिता या दिक् सा प्राची । अस्ताचलसन्निहिता या दिक् सा प्रतीची । मेरोः सन्निहिता या दिक् सोदीची । मेरोर्व्यवहिता या दिक् साऽवाची । हिन्दी-कला अतीत अनागत आदि व्यवहार का हेतु काल है । यहाँ यदि व्यवहारहेतुत्वमात्र काल का लक्षण किया जाय तो 'घटः' इस व्यवहार का हेतु घटविषय में भी काललक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । अतः इस दोष का वारण करने के लिये “अतीत आदि” यह व्यवहार का विशेषण कहा गया । काल भी एक, विभु और नित्य द्रव्य है । प्राची प्रतीची ( पूर्व पश्चिम ) आदि व्यवहार का हेतु दिक् (दिशा) है । उदया- चल ( उदयपर्वत ) से सन्निहित दिशा प्राची है । अस्ताचल से सन्निहित दिशा प्रतीची है । सुमेरु से सन्निहित दिशा उदीची है और मेरु से व्यवहित दिशा अवाची (दक्षिण) है ।
न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ११ सुखाद्युपलब्धिसाधनमिन्द्रियं मनः । तच्च प्रत्यात्मनियतत्वा- दनन्तं परमाणुरूपं नित्यञ्च । चक्षुर्मात्रग्राह्यो गुणो रूपम् । तच्च शुक्ल-नील-पीत-रक्त- हरित-कपिश-चित्रभेदात् सप्तविधम् । पृथिवीजलतेजोवृत्ति । तत्र पृथिव्यां सप्तविधम् । अभास्वरशुक्लं जले । भास्वरशुक्लं तेजसि । सुख दुःख आदि की उपलब्धि ( प्रत्यक्ष ) का साधनभूत इन्द्रिय मन है । वह मन प्रत्येक आत्मा के साथ नियत ( संबद्ध ) होने के कारण अनन्त है, परमाणुरूप और नित्य है । केवल चक्षुरिन्द्रिय से ग्रहण किया जाने वाला गुण रूप है । वह रूप शुक्ल-नील- पीत-रक्त ( लाल ) हरित-कपिश ( भूरा ) और चित्र ( चितकबरा ) के भेद से सात प्रकार का होता है । रूप पृथिवी-जल और तेज में रहता है । पृथिवी में पूर्वोक्त सातों प्रकार का रूप रहता है । जल में नहीं चमकने वाला शुक्ल रूप रहता है और तेज में चमकने वाला शुक्ल रूप रहता है । न्यायबोधिनी आत्मानं निरूपयति—ज्ञानाधिकरणमिति । अधिकरणपदं समवायेन ज्ञानाश्रयत्वलाभार्थम् । मनो निरूपयति-सुखादीति । उपलब्धिर्नाम साक्षात्कारः । तथा च सुख- दुःखादिसाक्षात्कारकारणत्वे सति इन्द्रियत्वम् मनसो लक्षणम् । इन्द्रियत्वमा- त्रोक्तौ चक्षुरादावतिव्याप्तिरतः सुखादिसाक्षात्कारकारणत्वविशेषणम् । विशेष्यानुपादाने आत्मन्यतिव्याप्तिः, आत्मनः सुखादिकं प्रति समवायि- कारणत्वात् । अत इन्द्रियत्वरूपविशेष्योपादानम् । हिन्दी-कला 'ज्ञानाधिकरणत्व' यह आत्मा का लक्षण है । यहाँ अधिकरणपद देने से समवाय सम्बन्ध से ज्ञानाश्रयत्व का लाभ होता है। अन्यथा ज्ञान का सम्बन्धी तो विषय भी है, किन्तु वह आत्मा नहीं है । सुखादि के साक्षात्कार का साधन इन्द्रिय मन है। अर्थात् सुख दुःखादि के साक्षा- त्कार का कारण होते हुए इन्द्रिय होना मनका लक्षण है। यहाँ लक्षण में यदि इन्द्रित्व- मात्र कहा जाय तो चक्षुः आदि में भी मन का लक्षण अतिव्याप्त हो जायगा । अतः इस अतिव्याप्ति के निवारणार्थ "सुखादि-साक्षात्कार-कारणत्व" यह विशेषण दिया । यदि इन्द्रियत्वरूप विशेष्य का सन्निवेश न किया जाय तो आत्मा में भी मनलक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । क्योंकि सुखादि के प्रति आत्मा के समवायिकारण होने से वह भी सुखादि के साक्षात्कार में हेतु होता ही है । इस अतिव्याप्ति दोष के निवा-
१२ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः न्यायबोधिनी रूपं लक्षयति—चक्षुरिति । चक्षुर्मात्रग्राह्यत्वविशिष्टगुणत्वं रूपस्य लक्षणम् । विशेष्यमात्रोपादाने रसादावतिव्याप्तिः, अतश्चक्षुर्मात्रग्राह्यत्व- विशेषणम् । तावन्मात्रोपादाने रूपत्वेऽतिव्याप्तिः । यो गुणो यदिन्द्रियग्राह्य- स्तन्निष्ठा जातिस्तदिन्द्रियग्राह्येति नियमात्, तद्वारणार्य विशेष्योपादानम् । चक्षुर्मात्रग्राह्यत्वं नाम चक्षुर्भिनेन्द्रियाग्राह्यत्वे सति चक्षुर्ग्राह्यत्वम् । मात्रपदानुपादाने संख्यादिसामान्यगुणेऽतिव्याप्तिः चक्षुर्ग्राह्यत्वविशिष्टगुण- त्वस्य तत्रापि सत्त्वात्, अतस्तद्वारणार्य मात्रपदम् । सङ्ख्यादेश्चक्षुर्भिन्न- त्वगिन्द्रियग्राह्यत्वात् चक्षुर्मात्रग्राह्यत्वं नास्ति । अतीन्द्रियगुरुत्वादावति- व्याप्तिवारणाय चक्षुर्ग्राह्यँति । अत्र लक्षणे ग्राह्यत्वं नाम प्रत्यक्षविषय- त्वम् । अग्राह्यत्वं नाम तदविषयत्वम् । तथा च चक्षुर्भिनेन्द्रियजन्यप्रत्यक्षा- विषयत्वे सति चक्षुर्जिन्यप्रत्यक्षविषयत्वमिति फलितोऽर्थः । ननु प्रभाघटसंयोगे रूपलक्षणस्यातिव्याप्तिस्तस्य चक्षुर्मात्रग्राह्यगुणत्वा- दिति चेन्न, गुणपदस्य विशेषगुणपरत्वात् । न चैवं विशेषगुणत्वघटितलक्षणे सङ्ख्यादावतिव्याप्त्यभावान्मात्रपदवैयर्थ्यमिति वाच्यम्, जलमात्रवृत्तिसां- सिद्धिकद्रवत्वादावतिव्याप्तिवारणाय तदुपादानात् । अथवा चक्षुर्मात्रग्राह्यजातिमद्गुणत्वस्य लक्षणत्वान्न प्रभाघटसंयोगादाव- तिव्याप्तिः, संयोगत्वजातेश्चक्षुर्मात्रग्राह्यत्वाभावात् । घटपटसंयोगस्य त्वगि- न्द्रियग्राह्यत्वात् तद्गतजातेरपि त्वगिन्द्रियग्राह्यत्वात् । यो गुणो यदिन्द्रिय- ग्राह्यस्तन्निष्ठजातेरपि तदिन्द्रियग्राह्यत्वात् । अत्र जातिघटितलक्षणे गुणत्वानुपादाने चक्षुर्मात्रग्राह्यजातिमति सुवर्णादावतिव्याप्तिरतस्तद्- वारणाय तदुपादानम् । एवं रसादिलक्षणे विशेषणानुपादाने लक्ष्यभिन्न- गुणादावतिव्याप्तिः । विशेष्यानुपादाने लक्ष्यमात्रवृत्तिरसत्वगन्धत्वादावति- व्याप्तिः, अतो विशेषणविशेष्ययोरुभयोरुपादानम् । हिन्दी-कला रण के लिये 'इन्द्रियत्व' रूप विशेष्यपद का उल्लेख किया । आत्मा तो इन्द्रिय नहीं है । 'चक्षुर्मात्रग्राह्यत्व-विशिष्ट गुणत्व' यह रूप का लक्षण है। यहाँ यदि 'गुणत्व' इस विशेष्यमात्र का ग्रहण किया जाय तो रसादि में भी रूपलक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । क्योंकि रसादि भी गुण है । इस दोष का निवारण करने के लिये 'चक्षु- र्मात्रग्राह्यत्व' विशेषण कहा । यदि यह विशेषणमात्र दिया जाय और 'गुणत्व' विशेष्य न कहा जाय तो रूपत्व में भी रूपलक्षण की अतिव्याप्ति होने लगेगी । क्योंकि "जो गुण जिस इन्द्रिय से ग्राह्य होता है, उसमें रहने वाली जाति भी उसी
न्यायबोधिनी-कलासंवलितः १५ हिन्दी-कला इन्द्रिय से ग्राह्य होती है" इस नियम के अनुसार रूपत्व-जाति भी चक्षुर्मात्रग्राह्य है। अतः रूपत्व में रूपलक्षण की अतिव्याप्ति का वारण करने के लिये 'गुणत्व' यह विशेष्य कहा। रूपत्व तो गुण नहीं है, किन्तु एक जाति है। यहाँ रूपलक्षण में चक्षुर्मात्रग्राह्यत्व का अर्थ है—चक्षु से भिन्न जो रसना-घ्राण आदि इन्द्रियाँ हैं, उनसे अग्राह्य होते हुए चक्षु से ग्राह्य होना। इतना अर्थ मात्रपद के देने से निकलता है। यदि मात्रपद न दिया जाय तो संख्या आदि सामान्यगुणों में रूपलक्षण की अतिव्या प्त हो जायगी। क्योंकि 'चक्षुर्ग्राह्यगुणत्व' संख्यादि में भी है। अतः इस दोष के निवारणार्थ मात्रपद दिया। क्योंकि संख्यादि सामान्यगुण चक्षु से भिन्न त्वगिन्द्रिय से भी ग्राह्य होने से चक्षुर्मात्र ग्राह्य नहीं है। अतीन्द्रिय गुरुत्वादि- गुण में लक्षण की अतिव्याप्ति न हो, इसके लिए चक्षुर्ग्राह्यत्व पद दिया। गुरुत्वगुण तो चक्षुर्ग्राह्य नहीं है। इस लक्षण में ग्राह्यत्व का अर्थ है 'प्रत्यक्ष का विषय होना' तथा अग्राह्यत्व का अर्थ है 'प्रत्यक्ष का अविषय होना'। इस प्रकार "चक्षु से भिन्न जो घ्राणादि इन्द्रिय, उससे जन्य प्रत्यक्षका जिसमें अविषयत्व हो तथा चक्षुरिन्द्रियजन्य प्रत्यक्ष का विषयत्व जिस गुण में हो, वह रूप है। यह रूपलक्षण का फलितार्थ है। शङ्का—उक्त लक्षण की अतिव्याप्ति प्रभा-घट के संयोग में हो जायगी, क्योंकि प्रभाघट का संयोग भी चक्षुर्मात्रग्राह्य गुण है। समाधान—लक्षण में गुणपद के विशेषगुणपरक होने से यह दोष नहीं होगा। क्योकि संयोग विशेषगुण नहीं है। शङ्का—लक्षण में विशेषगुणत्व का निवेश करने पर संख्या आदि सामान्यगुण में स्वतः अतिव्याप्ति न होगी, ऐसी स्थिति में चक्षुर्मात्रग्राह्यत्व न कहकर 'चक्षुर्ग्राह्यत्व' इतना ही कहना चाहिये, मात्रपद व्यर्थ है। समाधान —जलमात्र में रहनेवाले सांसिद्धिकद्रवत्व में रूपलक्षण की अति- व्याप्ति के वारण के लिये मात्रपद का उपादान आवश्यक है। अन्यथा सांसिद्धिक- द्रवत्व के विशेषगुण होने से मात्रपद के बिना उसमें अतिव्याप्ति का निवारण न हो पाता। अथवा जो जाति चक्षुर्मात्र से ग्राह्य हो, तादृशजातिमद् ( जातिविशिष्ट ) गुणत्व रूप का लक्षण है। अतः गुणपद को विशेषगुणपरक माने बिना भी प्रभाघटसयोग में रूपलक्षण की अतिव्याप्ति न होगी। क्योंकि संयोगत्वजाति चक्षुर्मात्रग्राह्य जाति नहीं है। कारण, प्रभाघटसंयोग भले ही चक्षुर्मात्रग्राह्य हो किन्तु तद्गत संयोगत्व- जाति चक्षुर्मात्रग्राह्य नहीं है। क्योंकि घट और पट का संयोग चक्षु से भी ग्राह्य होता है ओर त्वगिन्द्रिय से भी ग्राह्य होता है। अतः उस संयोग में रहनेवाली संयोगत्वजाति भी त्वगिन्द्रिय ग्राह्य होगी। क्योंकि "जो गुण जिस इन्द्रिय से गृहीत होता है, उसमें रहनेवाली जाति भी उस इन्द्रिय से ग्राह्य होती है" यह नियम है।
१४ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्ष परिच्छेदः रसनग्राह्यो गुणो रसः । स च मधुराम्ललवणकटुकषायतिक्त- भेदात् षड्विधः । पृथिवीजलवृत्तिः । तत्र पृथिव्यां षड्विधः । जले मधुर एव । घ्राणग्राह्यो गुणो गन्धः । स च द्विविधः । सुरभिरसुरभिश्च । पृथिवीमात्रवृत्तिः । त्वगिन्द्रियमात्रग्राह्यो गुणः स्पर्शः । स च त्रिविधः, शीतोष्णा- ऽनुष्णाऽशीतभेदात् । पृथिव्यप्तेजोवायुवृत्तिः । तत्र शीतो जले । उष्णस्तेजसि । अनुष्णाऽशीतः पृथिवीवाय्वोः । रसना-इन्द्रिय से ग्रहण किया जानेवाला गुण रस है। और वह मधुर (मीठा) अम्ल (खट्टा) लवण (नमकीन) कटु (कडुआ) कषाय (कसैला) तिक्त (तीता) के भेद से छः प्रकार का होता है। रस-गुण पृथिवी और जल में रहता है। पृथिवी में पूर्वोक्त छहों प्रकार का रस रहता है। जल में केवल मधुर रस रहता है। घ्राण इन्द्रिय से ग्रहण किया जाने वाला गुण गन्ध है। वह दो प्रकार का होता है—सुरभि (सुगन्ध) और असुरभि (दुर्गन्ध) गन्ध-गुण केवल पृथिवी में रहता है। त्वगिन्द्रिय (त्वचा इन्द्रिय) मात्र से ग्रहण किया जानेवाला गुण स्पर्श है। वह शीत-उष्ण और अनुष्णाशीत भेद से तीन प्रकार का होता है। स्पर्श-गुण पृथिवी-जल- तेज और वायु में रहता है। उनमें शीतस्पर्श जल में रहता है, उष्णस्पर्श तेज में रहता है और अनुष्णाशीत (न उष्ण न शीत) स्पर्श पृथिवी और वायु में रहता है। हिन्दी-कला एवं प्रभाघटसंयोग में तथा घटपटसंयोग में एक ही संयोगत्व जाति है। ऐसी स्थिति में प्रभा-घटसंयोग के चक्षुर्मात्रग्राह्यजातिमान् गुण नहीं होने से प्रभा-घट- संयोग में अतिव्याप्ति न होगी। अतः इस जातिघटित लक्षणपक्ष में गुणपद को विशेषगुणपरक मानने की कोई आवश्यकता नहीं है। इस जातिघटितलक्षण में भी 'गुणत्व' पद देना ही होगा, अन्यथा सुवर्ण में रूप- लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी। क्योंकि सुवर्ण में रहनेवाली सुवर्णत्वजाति चक्षुर्मात्रग्राह्य जाति है। रूप के समान सुवर्ण के भी चक्षुर्मात्रग्राह्यजातिमान् होने से उसमें रूपलक्षण की अतिव्याप्ति का वारण करने के लिये 'गुणत्व' पद देना आवश्यक है। रूप के समान ही रसादि के लक्षण में भी विशेषणभाग न देने पर लक्ष्य से भिन्न गुण में अतिव्याप्ति हो जायगी तथा विशेष्यभाग न देने पर लक्ष्यमात्र में
न्यायबोधिनी-कलासंबलितः १५ रूपादिचतुष्टयं पृथिव्यां पाकजमनित्यञ्च । अन्यत्रापाकजं नित्यमनित्यञ्च । नित्यगतं नित्यम् । अनित्यगतमनित्यम् । रूप आदि ( रूप-रस-गन्ध-स्पर्श ) चार पृथिवी में पाक से ( विलक्षण तेज के संयोग से ) उत्पन्न होते हैं और अनित्य हैं । और पृथिवी से भिन्न में अपाकज होते हैं तथा नित्य भी हैं और अनित्य भी हैं । नित्य द्रव्य में रहने वाले रूपादि नित्य होते हैं और अनित्य द्रव्य में रहने वाले रूपादि अनित्य होते हैं । न्यायबोधिनी स्पर्शं लक्षयति त्वगिन्द्रियमात्रग्राह्य इति । अत्रापि मात्रपदं संख्यादि- सामान्यगुणादावतिव्याप्तिवारणाय । अन्यविशेषणकृत्यं पूर्ववद्बोध्यम् । ग्राह्यत्वपदार्थोऽपि पूर्ववदेव प्रत्यक्षविषयत्वरूप एव बोध्यः । रूपादिचतुष्टयमिति । एतत्तत्वनिर्णयश्चेत्थम्—पाको नाम विजाती- यतेजः संयोगः । स च नानाजातीयरूपजनको विजातीयः तेजःसंयोगः । तदपे- क्षया रसजनको विजातीयः । एवं गन्धजनकोऽपि ततो विजातीय एव । एवं स्पर्शजनकोऽपि तथैव । एवं प्रकारेण भिन्नभिन्नजातीयाः पाकाः कार्य- वैलक्षण्येन कल्पनीयाः । यथा तृणपुञ्जनिक्षिप्त आम्रादौ उष्मलक्षणविजातीयतेजःसंयोगात् पूर्वहरितरूपनाशेन रूपान्तरस्य पीतादेरुत्पत्तिर्न तु रसादेरुत्पत्तिः । पूर्वरस- स्याम्लस्यैवानुभवात् । क्वचित् पूर्वहरितरूपसत्त्वेऽपि रसपरावृत्तिर्दृश्यते । विजातीयतेजःसंयोगरूपपाकवशात् पूर्वतनाम्यरसनाशेन मधुररसस्यानु- भवात् । तस्माद् रूपजनकापेक्षया रसजनको विलक्षण एवाङ्गीकार्यः । एवं गन्धजनको विलक्षण एव, रूपरसयोरपरावृत्तावपि पूर्वगन्धना- शेऽपि विजातीयपाकवशात् सुरभिगन्धोपलब्धेः । एवं स्पर्शजनकपाक- वशात् कठिनस्पर्शनाशेन मृदुस्पर्शानुभवात् । तस्माद्रूपादिजनका विजातीया एव पाकाः । अत एव पार्थिवपरमाणूनामेकजातीयत्वेऽपि पाकमहिम्ना विजातीयद्रव्यान्तरानुभवः । यथा गोभुक्ततृणादीनामापरमाण्वन्तभङ्गे हिन्दी-कला में रहनेवाली रसत्व-गन्धत्व आदि जाति में रसादिलक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । अतः रसादि के लक्षण में भी विशेषण-विशेष्य दोनों का उपादान आव- श्यक है । ऐसा जानना चाहिये । त्वगिन्द्रियमात्रग्राह्यणत्व स्पर्श का लक्षण है । यहाँ भी मात्रपद का उपा- दान संख्या आदि सामान्यगुणों में अतिव्याप्तिवारण के लिये है । अन्य विशेषणों का प्रयोजन रूपलक्षण के समान ही समझना चाहिये । 'ग्राह्यत्व' पद का अर्थ भी पूर्व के समान ही प्रत्यक्षविषयत्वरूप जानना चाहिये ।
१६ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः न्यायबोधिनी तृणारम्भकपरमाणुषु विजातीयतेजःसंयोगात् पूर्वरूपादिचतुष्टयनाशे तदन- न्तरं दुग्धे यादृशं रूपादिकं वर्तते, तादृशरूपरसगन्धस्पर्शजनकास्तेजःसंयोगाः जायन्ते । तदुत्तरं तादृशरूपरसादय उत्पद्यन्ते । तादृशरूपरसादि- विशिष्टपरमाणुभिर्दुग्धद्वयणुकमारभ्यते, ततस्त्र्यणुकादिक्रमेण महादुग्धा- रम्भः । एवं दुग्धारम्भकैः परमाणुभिरेव दध्यारभ्यते । एवं पाकमहिम्ना दध्यारम्भकैरेव परमाणुभिर्नवनीतादिकमिति दिक् । हिन्दी-कला रूप-रस-गन्ध और स्पर्श ये चारों गुण पृथिवी में पाकज (पाक से होनेवाले) एवं अनित्य हैं । इसका स्पष्टीकरण यों है—विलक्षण तेज का संयोग पाक है। यह तेजः- संयोग भी विलक्षण ही होता है, जिससे रूप में ही नील-पीत आदि अनेकविध रूप की उत्पत्ति होती है । ऐसे ही रूपजनक तेज संयोग की अपेक्षा रसजनक तेजः- संयोग विलक्षण ही होता है । ऐसे ही गन्धजनक तेजःसंयोग उससे विलक्षण और स्पर्शजनक तेजःसंयोग उससे विलक्षण होता है । इस प्रकार कार्य की विलक्षणता को देखते हुए भिन्न-भिन्न जाति के विलक्षण पाकों ( तेजःसंयोगों ) की कल्पना की जाती है । जैसे, तृण की ढेर में रखे किसी आम आदि फल में ऊष्मानामक विलक्षण तेज के संयोग से पूर्व हरो रूप का नाश होकर पीले रूप की उत्पत्ति हो जाती है, किन्तु रस ज्यों का त्यों खट्टा ही रह जाता है, क्योंकि उसमें खट्टापन का ही अनुभव होता है । कहीं तो पूर्व हरितरूप ज्यों का त्यों रह जाता है और रस में परिवर्तन हो जाता है । क्योंकि वहाँ विजातीय तेजःसंयोगरूप पाक के कारण खट्टे रस के नाश से मधुर रस का ही अनुभव होता है । इससे यह स्वीकार करना पड़ता है कि रूपजनक पाक की अपेक्षा रसजनक पाक विलक्षण है । ऐसे ही गन्धजनक तेजःसंयोग भी विलक्षण ही होता है । क्योंकि रूप-रस के नहीं बदलने पर भी पूर्वगन्ध का नाश होकर सुरभिगन्ध की उत्पत्ति देखी जाती है । एवं स्पर्शजनक भी पाक विलक्षण ही है । क्योंकि वहाँ कठिनस्पर्श का नाश होकर मृदुस्पर्श की अनुभूति होती है । इसलिये रूपादि के जनक पाक विलक्षण ही होते हैं । इसीलिये पार्थिव परमाणु के समान होने पर भी पाक की महिमा से विजातीय द्रव्यान्तर का अनुभव होता है । जैसे गायद्वारा चर्वित तृण आदि का परमाणुपर्यन्त भंग हो जाने पर तृण के उत्पादक परमाणुओं में विजातीय तेजःसंयोग से पूर्व के रूप-रस-गन्ध और स्पर्श नष्ट हो जाते हैं और बाद में दूध के अनुरूप रूप-रस-गन्ध-स्पर्श के जनक तेजःसंयोग पैदा होने के बाद दूध के परमाणुओं में रूप-रस-गन्ध और स्पर्श पैदा हो जाते हैं ।
न्यायबोधिनी-कलासंवलितः १७ एकत्वादिव्यवहारहेतुः संख्या। सा नवद्रव्यवृत्तिः, एकत्वादि- परार्धपर्य्यन्ता। एकत्वं नित्यमनित्यञ्च। नित्यगतं नित्यमनित्यग- तमनित्यम्। द्वित्वादिकन्तु सर्वत्रानित्यमेव। मानव्यवहारासाधारणं कारणं परिमाणम्। नवद्रव्यवृत्ति। तच्चतुर्विधम्—अणु, महत्, दीर्घं, ह्रस्वं चेति। पृथग्व्यवहारासाधारणकारणं पृथक्त्वम्। सर्वद्रव्यवृत्ति। संयुक्तव्यवहारहेतुः संयोगः सर्वद्रव्यवृत्तिः। संयोगनाशको गुणो विभागः। सर्वद्रव्यवृत्तिः। एकत्व द्वित्व आदि व्यवहार का हेतुभूत गुण संख्या है। वह पृथिवी आदि नवों द्रव्यों में रहती है। एकत्व से लेकर परार्धपर्य्यन्त संख्या व्यवहार में आती है। एकत्व-संख्या नित्य भी है और अनित्य भी है। नित्य में रहने वाली एकत्व-संख्या नित्य है तथा अनित्य में रहने वाली एकत्व-संख्या अनित्य है। द्वित्व आदि संख्या तो सर्वत्र अनित्य ही है, क्योंकि द्वित्वादि-संख्या अपेक्षाबुद्धि से जन्य होती है। मान-(माप-) व्यवहार का असाधारण कारण जो गुण, वह परिमाण है। वह नवों द्रव्यों में रहता है, परिमाण चार प्रकार का होता है—अणु-महत्-दीर्घ और ह्रस्व। पृथक्-व्यवहार का असाधारण कारण जो गुण, वह पृथक्त्व है। पृथक्त्व-गुण सभी द्रव्यों में रहता है। संयुक्त व्यवहार का हेतुभूत गुण संयोग है। वह सभी द्रव्यों में रहने वाला है। संयोग का नाश करने वाला गुण विभाग है। विभागनामक गुण सभी द्रव्यों में रहता है। न्यायबोधिनी विभागं लक्षयति संयोगेति। संयोगनाशकत्वविशिष्टगुणत्वं विभागस्य लक्षणम्। विशेषणमात्रोपादाने क्रियाया अपि संयोगनाशकत्वात् तत्राति- हिन्दी-कला और वैसे परमाणु से वैसा ही दुग्ध का द्व्यणुक पैदा होता है। और वैसे द्व्यणुक से वैसा ही त्र्यणुक चतुरणुकादि क्रम से महादुग्ध का आरम्भ हो जाता है। ऐसे दुग्धा- रम्भक परमाणुओं से ही दधिका आरम्भ और पाक की महिमा से दधि के आरम्भक परमाणुओं से नवनीत घृत आदि उत्पन्न होते हैं। संयोगनाशकत्वविशिष्ट-गुणत्व विभाग का लक्षण है। लक्षण में विशेषणमात्र कहने पर क्रिया भी संयोग की नाशिका होती है, अतः उसमें विभागलक्षण की अति- २
१८ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः परापरव्यवहारासाधारणकारणे परत्वापरत्वे । पृथिव्यादिच- तुष्टयमनोवृत्तिनी । ते च द्विविधे दिक्कृते कालकृते चेति । दूरस्थे दिक्कृतं परत्वम् । समीपस्थे दिक्कृतमपरत्वम् । ज्येष्ठे कालकृतं परत्वम् । कनिष्ठे कालकृतमपरत्वम् । आद्यपतनासमवायिकारणं गुरुत्वम् । पृथिवीजलवृत्ति । आद्यस्यन्दनासमवायिकारणं द्रवत्वम् । पृथिव्यप्तेजोवृत्ति । तद्द्विविधम्—सांसिद्धिकं नैमित्तिकञ्च । सांसिद्धिकं जले । नैमित्तिकं पृथिवीतेजसोः । पृथिव्यां घृतादावग्निसंयोगजं द्रवत्वम् । तेजसि सुवर्णादौ । पर-( दूर या ज्येष्ठ-) व्यवहार का असाधारण कारण परत्व है और अपर- ( समीप या कनिष्ठ-) व्यवहार का असाधारण कारण अपरत्व है । वे परत्व और अपरत्व-गुण पृथिवी आदि ( पृथिवी-जल-तेज-वायु ) चार एवं मन में रहते हैं। परत्व-अपरत्व दो दो प्रकार के होते हैं — दिक्कृत और कालकृत । दूरस्थ वस्तु में दिक्कृत परत्व होता है । समीपस्थ वस्तु में दिक्कृत अपरत्व होता है । ज्येष्ठ में कालकृत परत्व होता है । कनिष्ठ में कालकृत अपरत्व होता है । आद्यपतन का असमवायिकारण गुण गुरुत्व है । वह पृथिवी और जल में रहता है । आद्यस्यन्दन का असमवायिकारण गुण द्रवत्व है । वह पृथिवी, जल और तेज में रहता है । द्रवत्व दो प्रकार का होता है—सांसिद्धिक और नैमित्तिक । सांसिद्धिक- द्रवत्व जल में और नैमित्तिक-द्रवत्व पृथिवी और तेज में रहता है । घृत आदि पृथिवी न्यायबोधिनी व्याप्तिस्तद्वारणाय गुणत्वमिति विशेष्योपादानम् । गुरुत्वं लक्षयति आद्येति । द्वितीयपतनक्रियायां वेगस्यासमवायिका- रणत्वात्तत्रातिव्याप्तिवारणायाद्येति । उत्तरत्र स्यन्दने आद्यविशेषणमपि हिन्दी-कला व्याप्ति हो जायगी, इसके निवारण के लिये 'गुणत्व' इस विशेष्य का उल्लेख किया । क्रिया में गुणत्वधर्म नहीं होने से अतिव्याप्ति नहीं हुई । आद्यपतन का असमवायिकारण होते हुए गुणत्व गुरुत्व का लक्षण है । द्वितीय पतन का असमवायिकारण गुण वेग भी है, अतः वेग में लक्षण की अतिव्याप्ति का वारण करने के लिये 'आद्य' यह पतन का विशेषण दिया । आगे द्रवत्व के लक्षण में भी स्यन्दन में 'आद्य' विशेषण देने का प्रयोजन समझना चाहिये ।
न्यायबोधिनी-कलासंबलितः १९ चूर्णादिपिण्डीभावहेतुर्गुणः स्नेहः । जलमात्रवृत्तिः । श्रोत्रग्राह्यो गुणः शब्दः । आकाशमात्रवृत्तिः । स द्विविधः- में अग्निसंयोग से द्रवत्व उत्पन्न होता है तथा सुवर्ण आदि तेज में भी अत्यन्त अग्नि- संयोग से द्रवत्व उत्पन्न होता है । चूर्ण आदि के पिण्डीभाव ( बन्धन ) का हेतु जो गुण, वह स्नेह है । वह जलमात्र में रहता है । श्रोत्र-इन्द्रिय से ग्रहण-योग्य गुण शब्द है । वह आकाशमात्र में रहता है । न्यायबोधिनी पूर्ववदेव योज्यम् । स्नेहं लक्षयति-चूर्णादीति । चूर्णादिपिण्डीभावहेतुत्वे सति गुणत्वं स्नेहस्य लक्षणम् । पिण्डीभावो नाम-चूर्णादेर्धारणाकर्षणहेतुभूतो विलक्षणः संयोगः । तादृशसंयोगे स्नेहस्यैवासाधारणकारणत्वं न तु जलादिगतद्रवत्वस्य । तथा सति द्रुतसुवर्णादिसंयोगेन चूर्णादेः पिण्डीभावापत्तेरतः स्नेह एवासाधारणं कारणम् । विशेषणमात्रोपादाने कालादावतिव्याप्तिरतस्तद्वारणाय विशेष्योपादानम् । वस्तुतस्तु द्रुतजलसंयोगस्यैव पिण्डीभावहेतुत्वं, स्नेहस्य हेतुत्वे मानाभावात् । जले द्रुतत्वविशेषणात् करकादिव्यावृत्तिः । शब्दं लक्षयति-श्रोत्रेति । शब्दत्वेऽतिव्याप्तिवारणाय 'गुण' इति । हिन्दी-कला चूर्णादि के पिण्डीभाव का हेतु होते हुए गुणत्व स्नेह का लक्षण है। पिण्डीभाव का अर्थ है- चूर्णादि को एक में परस्पर बाँधने और उसके आकर्षण का हेतुभूत विलक्षण संयोग । ऐसे विलक्षण संयोग के प्रति स्नेह ही असाधारण कारण है, न कि जला- दिगत द्रवत्व कारण है । क्योंकि द्रवत्व के कारण होने पर पिघले हुए सुवर्णादि के संयोग से भी चूर्ण में पिण्डीभाव होना चाहिये, किन्तु वैसा नहीं होता है। अतः पिण्डी- भाव के प्रति स्नेह ही असाधारण कारण है। इस लक्षण में यदि विशेषणमात्र का उपादान हो तो कालादि में भी स्नेह लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी, अतः उसके वारण के लिये 'गुणत्व' इस विशेष्यपद का ग्रहण किया गया । काल में गुणत्व-धर्म नहीं है। वस्तुतः तो पिघले हुए जल का संयोग ही पिण्डीभाव का हेतु है, क्योंकि स्नेह के हेतु होने में प्रमाण नहीं है। कारण, यदि स्नेह पिण्डीभाव का हेतु हो तो ओले में भी जल होने से स्नेह है, तब ओले से भी सक्तु आदि का पिण्ड बन जाना चाहिये । जल में 'द्रुतत्व' इस विशेषण के देने से ओले आदि की व्यावृत्ति हो जायगी । ऐसी स्थिति में स्नेह का कुछ और ही लक्षण करना होगा । मूलोक्त शब्दलक्षण में गुणपद का उपादान शब्दत्व में अतिव्याप्ति का वारण
२० तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः ध्वन्यात्मको वर्णात्मकश्च । तत्र ध्वन्यात्मको भेर्यादौ । वर्णात्मकः संस्कृतभाषादिरूपः । सर्वव्यवहारहेतुर्गुणो बुद्धिर्ज्ञानम् । सा द्विविधा—स्मृतिरनु- भवश्च । शब्द दो प्रकार का होता है—ध्वन्यात्मक शब्द और वर्णात्मक शब्द । उनमें ध्वन्या- त्मक शब्द भेरी ( नगाड़े ) आदि में होता है और वर्णात्मक शब्द संस्कृतभाषा आदि स्वरूप है । समस्त व्यवहारों का हेतुभूत गुण बुद्धि है । बुद्धि को ज्ञान भी कहते हैं । बुद्धि दो प्रकार की होती है—स्मृति और अनुभव । न्यायबोधिनी रूपादावतिव्याप्तिवारणाय—श्रोत्रेति । स त्रिविधः संयोगजो, विभागजः, शब्दजश्चेति । यथा भेरीदण्डसंयोगजो झाङ्कारादिशब्द , हस्ताभिघात- संयोगजन्यो मृदङ्गादिशब्दः । वंशे पाट्यमाने दलद्वयविभागजश्चटचटा- शब्दः । शब्दोत्पत्तिदेशमारभ्य श्रोत्रदेशपर्यन्तं वीचीतरङ्गन्यायेन कदम्ब- मुकुलन्यायेन वा निमित्तपवनेन शब्दधारा जायन्ते । तत्र उत्तरोत्तरशब्दे पूर्वपूर्वशब्दः कारणम् । बुद्धेर्लक्षणमाह—सर्वव्यवहारेति । व्यवहारः शब्दप्रयोगः । ज्ञानं विना शब्दप्रयोगासंभवात् शब्दप्रयोगरूपव्यवहारहेतुत्वं ज्ञानस्य लक्षणम् । बुद्धिं विभजते - सा द्विविधेति । हिन्दी-कला के लिये किया गया है । रूपादि गुण में शब्दलक्षण की अतिव्याप्ति रोकने के लिये 'श्रोत्र' पद दिया । शब्द के तीन भेद हैं—संयोगज शब्द, विभागज शब्द और शब्दज शब्द । जैसे, भेरी-दण्ड के संयोग से होनेवाला झङ्कार आदि शब्द तथा हस्त के संयोग से होनेवाला मृदङ्गादिका शब्द संयोगज है । बाँस के फाड़ते समय उसके दोनों टुकड़ों के विभाग से उत्पन्न 'चटचटा' शब्द विभागज शब्द है । तथा शब्दो- त्पत्तिस्थल से लेकर श्रोत्रपर्यन्त वीचीतरङ्गन्याय से या कदम्बमुकुलन्याय से वायु के कारण शब्द की धारा उत्पन्न हो जाती है । यह शब्दज शब्द है । क्योंकि उत्त- रोत्तर शब्द के प्रति पूर्व-पूर्व शब्द कारण होता है । समस्त व्यवहारों का हेतुभूत गुण बुद्धि है । इसे ही ज्ञान भी कहते हैं । यहाँ व्यवहार का अर्थ शब्दप्रयोग है । चूँकि ज्ञान के बिना शब्दप्रयोग नहीं हो सकता, इसलिये 'शब्दप्रयोगरूपव्यवहारहेतु गुणत्व' ज्ञान का लक्षण है ।
न्यायबोधिनी-कलासंबलितः २१ संस्कारमात्रजन्यं ज्ञानं स्मृतिः । तद्भिन्नं ज्ञानमनुभवः । स द्विविधः—यथार्थोऽयथार्थश्च । संस्कारमात्र से उत्पन्न होने वाला ज्ञान स्मृति है । और स्मृति से भिन्न ज्ञान अनुभव है । अनुभव दो प्रकार का होता है—यथार्थ और अयथार्थ । न्यायबोधिनी स्मृतिं लक्षयति—संस्कारेति । संस्कारमात्रजन्यत्वविशिष्टज्ञानत्वं स्मृते- र्लक्षणम् । विशेषणानुपादाने प्रत्यक्षानुभवेऽतिव्याप्तिरतस्तद्वारणाय विशे- षणोपादानम् । संस्कारध्वंसेऽतिव्याप्तिवारणाय विशेष्योपादानम् । ध्वंसं प्रति प्रतियोगिनः कारणत्वात् संस्कारध्वंसेऽपि संस्कारजन्यत्वस्य सत्त्वात् । प्रत्यभिज्ञायामतिव्याप्तिवारणाय मात्रपदम् । अनुभवं लक्षयति—तद्भिन्नमिति । तद्भिन्नत्वं नाम स्मृतिभिन्नत्वम् । तथा च स्मृतिभिन्नत्वविशिष्टज्ञानत्वमनुभवस्य लक्षणम् । तत्र विशेषणानु- पादाने स्मृतावतिव्याप्तिः, * विशेष्यानुपादाने घटादावतिव्याप्तिरतस्तद्- वारणाय विशेषणविशेष्ययोरुभयोरुपादानम् । अनुभवं विभजते—स द्विविध इति । हिन्दी-कला 'संस्कारमात्रजन्यत्वविशिष्ट ज्ञानत्व' यह स्मृति का लक्षण है । यहाँ विशेषण का ग्रहण न करने पर प्रत्यक्ष अनुभव में अतिव्याप्ति हो जायगी, अतः उसे रोकने के लिये 'संस्कारमात्रजन्यत्व' विशेषण दिया । संस्कार के ध्वंस में स्मृतिलक्षण की अतिव्याप्ति न हो जाय, इसके लिये 'ज्ञानत्व' इस विशेष्य का उपादान किया । कारण, ध्वंस के प्रति प्रतियोगी कारण होता है, इसलिये संस्कार-ध्वंस में भी संस्कार- जन्यत्व के होने से उसमें स्मृति-लक्षण की अतिव्याप्ति हो जाती । अतः 'ज्ञान' पद देना आवश्यक है । प्रत्यभिज्ञा भी संस्कारजन्य होती है, अतः उसमें अतिव्याप्ति- वारण के लिये मात्रपद दिया । प्रत्यभिज्ञा के प्रति संस्कार के साथ-साथ बहिरिन्द्रियाँ भी कारण होती हैं, अतः प्रत्यभिज्ञा संस्कारमात्रजन्य नहीं हुई । संस्कारमात्र- जन्यत्व का अर्थ है—"बहिरिन्द्रियाजन्यत्वे सति संस्कारजन्यत्व ।” स्मृति से भिन्न ज्ञान अनुभव है । इस प्रकार 'स्मृतिभिन्नत्वविशिष्ट ज्ञानत्व' अनुभव का लक्षण है। इसमें 'स्मृतिभिन्नत्व' विशेषण नहीं देने पर स्मृति में लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । 'ज्ञानत्व' रूप विशेष्य न देने पर घटादि में अतिव्याप्ति हो जायगी । इसलिये इन अतिव्याप्तियों का वारण करने के लिये विशेषण-विशेष्य दोनों का उपादान किया गया । अनुभव दो हैं—यथार्थानुभव और अयथार्थानुभव ।
२२ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्ष परिच्छेदः तद्वति तत्प्रकारकोऽनुभवो यथार्थः । सैव प्रमेत्युच्यते । तद्वान् ( उससे युक्त ) में तत्प्रकारक ( उसे विशेषण बनाने वाला ) अनुभव यथार्थानुभव है । जैसे, रजत में ( रजतत्व से युक्त में ) "इदं रजतम्" यह रजतत्व- प्रकारक ( रजतत्व-धर्म को विशेषण बनाने वाला ) ज्ञान ( अनुभव ) यथार्थानुभव है । यथार्थ अनुभव ही प्रमा शब्द से कहा जाता है । न्यायबोधिनी यथार्थानुभवं लक्षयति—तद्वतीति । तद्वतीत्यत्र सप्तम्यर्थो विशेष्य- त्वम् । तच्छब्देन प्रकारीभूतो धर्मो धर्तव्यः । तथा च तद्वद्विशेष्यकत्वे सति तत्प्रकारकानुभवत्वं यथार्थानुभवस्य लक्षणमित्यर्थः । उदाहरणम्-रजते 'इदं रजतमिति' ज्ञानम् । अत्र रजतत्ववद्विशेष्यकत्वे सति रजतत्वप्रकारकत्वस्य सत्त्वाल्लक्षणसमन्वयः । तद्वन्निष्ठविशेष्यतानि- रूपिततन्निष्ठप्रकारताशालित्वमिति तु निष्कर्षः । अन्यथा यथाश्रुते रङ्गरजतयोरिमे रजतरङ्गे इत्याकारकसमूहालम्बन- भ्रमेऽतिव्याप्तिः, तत्रापि रजतत्ववद्विशेष्यकत्वरजतत्वप्रकारकत्वयोः रङ्ग- त्ववद्विशेष्यकत्वरङ्गत्वप्रकारकत्वयोः सत्त्वात् । हिन्दी-कला तद्वति तत्प्रकारक अनुभव यथार्थ अनुभव कहाता है । 'तद्वति' यहां सप्तमी- विभक्ति का अर्थ विशेष्यत्व है । तथा 'तत्' शब्द से प्रकारीभूत ( विशेषणीभूत ) धर्म लेना चाहिये । इस प्रकार "तद्वद्विशेष्यकत्वे सति तत्प्रकारकानुभवत्व" यह यथार्थानुभव का लक्षण बना । इसका उदाहरण—रजत में 'इदं रजतम्' यह ज्ञान है । अर्थात् यह ज्ञान यथार्थ अनुभव है । क्योंकि रजतत्ववद्विशेष्यक होते हुए रजतत्व- प्रकारक होने से इस ज्ञान में यथार्थानुभव का उपर्युक्त लक्षण समन्वित ( घटित ) हो जाता है । नव्यन्याय की पद्धति में उक्त लक्षण का निष्कर्ष यों होता है—तद्वत्-निष्ठ- विशेष्यता-निरूपिता जो तन्निष्ठ प्रकारता, तादृश प्रकारताशाली जो ज्ञान, वह यथार्थानुभव है। इसका विशेष विवेचन 'संस्कृत-कला' व्याख्या में द्रष्टव्य है । लक्षण के इस निष्कृष्ट स्वरूप के न मानने पर अर्थात् मूलोक्त लक्षण को ही ज्यों का त्यों स्वीकार कर लेने पर क्रमशः सम्मुख वर्तमान रङ्ग (रांगा) और रजत में उलट कर 'इमे रजतरङ्गे' इस समूहालम्बन भ्रमज्ञान में यथार्थानुभवलक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । क्योंकि भले ही इस ज्ञान में रङ्ग को रजत समझ लिया गया है, और रजत को रङ्ग समझ लिया गया है ( कारण दोनों की चमक एक सी है ) फिर भी सामूहिक रूप में यह ज्ञान रजतत्वद्विशेष्यक भी है और रजतत्व- प्रकारक भी है तथा रङ्गत्ववद्विशेष्यक भी है और रङ्गत्वप्रकारक भी है ।
न्यायबोधिनी-कलासंवलित २१ तदभाववति तत्प्रकारकोऽनुभवोऽयथार्थः । उसके अभाव वाले मे अर्थात् जहाँ उसका अभाव है, उसी में तत्प्रकारक (उसे विशेषण बनाने वाला) अनुभव अयथार्थ अनुभव कहलाता है। अयथार्थ अनुभव ही 'अप्रमा' शब्द से व्यवहृत होता है। न्यायबोधिनी उक्तनिष्कर्षे तु नातिव्याप्तिः, तज्ज्ञानस्य रजतत्वप्रकारताया रजतत्व- वद्विशेष्यतांनिरूपितत्वाभावात्, एवं रङ्गत्वप्रकारताया रङ्गत्ववद्विशेष्य- तानिरूपितत्वाभावात्। किन्तु समूहालम्बनभ्रमस्य रङ्गांशे रजतत्वावगा- हित्वेन रजतत्वप्रकारताया रङ्गत्ववद्विशेष्यतानिरूपितत्वात् । एवं रजतांशे रङ्गत्वावगाहित्वेन रङ्गत्वप्रकारताया रजतत्ववद्विशेष्यतानिरूपितत्वा- च्चेति। नानामुख्यविशेष्यताशालिज्ञानं समूहालम्बनम् । अयथार्थानुभवं लक्षयति—तदभाववतीति । अत्रापि पूर्ववन् तदभावव- न्निष्ठविशेष्यतानिरूपिततन्निष्ठप्रकारताशालिज्ञानत्वं विवक्षणीयम् । अन्यथा रङ्गरजतयोरिमे रङ्गरजते इत्याकारकसमूहालम्बनप्रमायामतिव्याप्तिः । हिन्दी-कला उक्त प्रकार का लक्षण का निष्कर्ष होने पर यहाँ अतिव्याप्ति नहीं होगी। क्योंकि उक्त ज्ञान में अपनी अपनी प्रकारता अपनी अपनी विशेष्यता में निरूपित न होकर एक दूसरे की विशेष्यता से निरूपित हो गयी है। अर्थात् रजतत्वनिष्ठा प्रकारता रजतत्ववद्विशेष्यता से निरूपित नहीं है और रङ्गत्वनिष्ठप्रकारता रङ्गत्ववद्- विशेष्यता से निरूपित नही हैं। बल्कि इस समूहालम्बन भ्रम के अन्तर्गत रङ्गांश में रजतत्वप्रकार का अवगाहन होने से रजतत्ववाली प्रकारता रङ्गत्ववदन्निष्ठ विशेष्यता से निरूपित हो गयी है। तथा रजतांश मे रङ्गत्वरूप प्रकार का अवगाहन होने से रङ्गत्व- वाली प्रकारता रजतत्ववदन्निष्ठ विशेष्यता से निरूपित हो गयी है। इस प्रकार उक्त समूहालम्बन ज्ञान में प्रकार-विशेष्य का परस्पर अदला-बदली हो जाने के कारण यह ज्ञान यथार्थानुभव नहीं है। अनेक मुख्य-विशेष्यता वाला ज्ञान समूहालम्बन ज्ञान कहाता है। जैसे “इमे रजतरङ्गे" यहाँ रजत और रङ्ग दो विशेष्य हैं, इसलिये यह ज्ञान समूहालम्बन ज्ञान है। विशेष जानकारी के लिये 'संस्कृत-कला' द्रष्टव्य है। अयथार्थानुभव का लक्षण करते हैं—तदभाववति तत्प्रकारकोऽनुभवो अयथार्थ.' यह। यहाँ भी पूर्वके समान सप्तमी-विभक्ति का अर्थ 'विशेष्यता' है और 'तत्' पदसे प्रकारीभूत (विशेषणीभूत) धर्म लेना चाहिये। इसलिये पूर्व सरणी के अनुसार तदभाववान् में रहने वाली जो विशेष्यता उससे निरूपिता जो तत् में (प्रकारीभूत धर्म में) रहने वाली प्रकारता, तादृश प्रकारताशालिज्ञानत्व" अयथार्थानुभव का लक्षण है। इस प्रकार यदि विशेष्यता और प्रकारता को परस्पर निरूप्यनिरूपक-
२४ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः यथार्थानुभवश्चतुर्विधः — प्रत्यक्षानुमित्युपमितिशाब्दभेदात् । यथार्थानुभव चार प्रकार का होता है - प्रत्यक्ष-अनुमिति-उपमिति और शाब्द- ज्ञान के भेद से । न्यायबोधिनी एतत्समूहालम्बनस्य रङ्गरजतोभयविशेष्यकत्वेन रजतत्वरङ्गत्वोभयप्रकार- कत्वेन च रजतत्वाभाववद्रङ्गविशेष्यकत्वरजतत्वप्रकारकत्वयो रङ्गत्वभा- ववद्रजतविशेष्यकत्वरङ्गत्वप्रकारकत्वयोश्च सत्त्वात् । उक्तनिष्कर्षे तु तादृशप्रमायाः रजतांशे रजतत्वावगाहित्वेन रङ्गांशे रङ्गत्वत्वावगाहित्वेन च रजतत्वप्रकारताया रजतत्वाभाववद्रङ्गविशेष्यतानिरूपितत्वाभावात्, एवं रङ्गत्वप्रकारताया रङ्गत्वाभाववद्रजतविशेष्यतानिरूपितत्वाभावात् नाति- व्याप्तिः । उदाहरणम्—यथा शुक्तौ इदं रजतमिति । यथार्थानुभवं विभजते — चतुर्विध इति । हिन्दी-कला भावापन्न के रूप में न कहा जाय तो रङ्ग और रजत में "इमे रङ्गरजते" इस आकार वाले समूहालम्बन प्रमा (यथार्थ अनुभव में) उपर्युक्त अयथार्थानुभवलक्षण की अति- व्याप्ति होने लगेगी । क्योकि उक्त समूहालम्बनज्ञान रङ्ग-रजत उभयविशेष्यक है, साथ ही रङ्ग में नहीं रहनेवाला जो रजतत्व, तत्प्रकारक है तथा रजत में नहीं रहने वाला जो रङ्गत्व, तत्प्रकारक भी है । इस तरह व्युत्क्रमदृष्टि से उक्त समूहालम्बन प्रमाज्ञान में रजतत्वाभाववद् जो रङ्ग, तद्विशेष्यकत्व और रजतत्व-प्रकारकत्व चला गया तथा रङ्गत्वाभाववान् जो रजत, तद्विशेष्यकत्व और रङ्गत्वप्रकारकत्व चला गया । अतः "तदभाववति तत्प्रकारकत्व" रूप मूलोक्त लक्षण की अतिव्याप्ति उक्त प्रमाज्ञान में भी हो जाती है । किन्तु उक्त प्रकार से परस्पर निरूप्यनिरूपकभावःपन्न करके परिष्कृत लक्षण करने पर अतिव्याप्ति नहीं होगी । क्योंकि उक्त समूहालम्बनात्मक प्रमाज्ञान में रजतांश में रजतत्व का अवगाहन होने से तथा रङ्गांश में रङ्गत्व का अवगाहन होने से रजतत्व वाली प्रकारता रजतत्वरहित रङ्गनिष्ठ विशेष्यता से निरूपित नहीं हुई तथा रङ्गत्व वाली प्रकारता रङ्गत्वरहित रजतनिष्ठ विशेष्यता से निरूपित नहीं हुई; किन्तु अपने से सम्बद्ध विशेष्यता से ही दोनों प्रकारतायें निरूपित हो रही हैं। इसलिये परिष्कृत लक्षण में अतिव्याप्ति दोष नहीं है । उक्त अयथार्थानुभवलक्षण का उदाहरण (लक्ष्य) शुक्ति में होनेवाला "इदं रजतम्" यह ज्ञान है । यहाँ शुक्ति में रजतत्व धर्म नहीं है और उसमें प्रकार होकर रजतत्व भासित हो रहा है, अतः यह ज्ञान अयथार्थ अनुभव है । अर्थात् अप्रमा है । अयथार्थानुभव (अप्रमा) के भेद बाद में बताये जायेंगे । यहाँ यथार्थानुभव
तत्करणमपि चतुर्विधम्—प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दभेदात् । असाधारणं कारणं करणम् । उपर्युक्त चतुर्विध यथार्थानुभव का करण भी चार प्रकार का होता है—प्रत्यक्ष- अनुमान-उपमान और शब्द के भेद से । ( ये चारों प्रमाण कहे जाते हैं । ) कार्य के प्रति जो असाधारण कारण है, उसे करण कहते हैं । न्यायबोधिनी तत्करणमिति । फलीभूतप्रत्यक्षादिकरणं चतुर्विधमित्यर्थः । प्रत्यक्षादि- चतुर्विधप्रमाणानां प्रमाकरणत्वं सामान्यलक्षणम् । एकैकप्रमाणलक्षणन्तु वक्ष्यते प्रत्यक्षज्ञानेत्यादिना । करणलक्षणमाह—असाधारणमिति । व्यापारवदसाधारणं कारणं करण- मित्यर्थः । असाधारणत्वञ्च कार्यत्वातिरिक्तधर्मावच्छिन्नकार्यता निरूपित- कारणताशालित्वम् । यथा—दण्डादेर्घटादिकं प्रत्यसाधारणकारणत्वम् । कार्यत्वातिरिक्तो घटत्वादिरूपो धर्मः, तदवच्छिन्नकार्यता घटे, तन्निरूपिता कारणता दण्डे । अतो घटं प्रति दण्डोऽसाधारणं कारणम् । भ्रम्यादिरूपव्या- पारवत्वाच्च करणम् । साधारणत्वञ्च कार्यत्वावच्छिन्नकार्यता निरूपितकार- णताशालित्वम् । ईश्वरादृष्टादेःकार्यत्वावच्छिन्नं प्रत्येव कारणत्वात् साधा- रणकारणत्वम् । हिन्दी-कला ( प्रमा ) के चार भेद बताते हैं—प्रत्यक्ष अनुमिति-उपमिति और शाब्द । इसके करण भी चार होते हैं—प्रत्यक्ष-अनुमान-उपमान और शब्द । यही न्यायशास्त्र में चार प्रमाण कहे जाते हैं, क्योंकि प्रमा के ये करण हैं । इसीलिये उक्त चतुर्विध प्रमाणों का सामान्य लक्षण है - 'प्रमाकरणत्वम् प्रमाणत्वम्' । एक एक प्रमाण का लक्षण तो आगे बताया जायगा । मूलोक्त करणलक्षण का परिष्कृत अर्थ न्यायबोधिनीकार करते हैं "व्यापारवान् होता हुआ असाधारण कारण करण है" ऐसा । असाधारणत्व का परिष्कृत स्वरूप है- कार्यत्व से अतिरिक्त जो धर्म घटत्व आदि, उससे अवच्छिन्न जो घटादिवृत्ति कार्यता, तादृश कार्यता से निरूपित जो दण्डादिनिष्ठ कारणता, उससे युक्त होना असाधारणत्व है । अतः घट के प्रति असाधारण कारण होने से तथा भ्रमि ( भ्रमण ) रूप व्यापारवान् होने से दण्ड घट का करण है । साधारणकारणत्व का स्वरूप बताते हैं—कार्यत्व-धर्म से अवच्छिन्न ( विशिष्ट ) जो कार्यता, उससे निरूपित जो कारणता, तादृश कारणताशालित्व असाधारणत्व है । इसके अनुसार कार्यत्व-धर्म से अवच्छिन्न कार्यमात्र के प्रति कारण होने से ईश्वर अदृष्ट ( धर्माधर्म ) काल आदि साधारणकारण कहे जाते हैं ।
२६ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः कार्यनियतपूर्ववृत्ति कारणम् । कार्यं प्रागभावप्रतियोगि । कारणं त्रिविधं—समवाय्यसमवायिनिमित्तभेदात् । कार्य से नियत रूप में जो पूर्ववर्ती होता है, उसे कारण कहते हैं । प्रागभाव के प्रतियोगी को कार्य कहते हैं । अर्थात् जिस वस्तु का पहले अभाव होता है और बाद में भाव हो जाता है, वह कार्य है । कारण तीन प्रकार का होता है—समवायिकारण, असमवायिकारण और निमित्तकारण के भेद से । न्यायबोधिनी कारणं लक्षयति- कार्यनियतेति । कार्यं प्रति नियतत्वे सति पूर्ववृत्ति- त्वम् । नियतत्वविशेषणानुपादाने पूर्ववर्तिनो रासभादेरपि घटादिकारणत्वं स्यात्, अतो नियतत्वे सतीति विशेषणम् । नियतपूर्ववर्तिनो दण्डरूपादेरपि घटकारणत्वं स्यादतोऽनन्यथासिद्धपदमपि कारणलक्षणे निवेशनीयम् । दण्ड- रूपादीनां त्वन्यथासिद्धत्वात् । कार्यं लक्षयति—कार्यमिति । प्रागभावप्रतियोगित्वं कार्यस्य लक्षणम् । कार्योत्पत्तेः पूर्वम् 'इह घटो भविष्यति' इति प्रतीतिर्जायते, एतत्प्रतीति- विषयीभूतो योऽभावः स प्रागभावस्तत्प्रतियोगि घटादिरूपं कार्यम् । हिन्दी-कला मूलोक्त कारणलक्षण का अर्थ है—कार्य के प्रति नियत होते हुए उसके पूर्वक्षण में रहना कारणत्व है । अर्थात् जो कार्य के पूर्व में नियमतः रहे, वह कारण है । यहाँ नियतत्व विशेषण न देने पर कदाचित् मट्टी आदि लाने के उपयोग में आया रासभादि भी घटादि का कारण होने लगेगा, अतः नियतत्वे सति यह विशेषण कहा । किन्तु जैसे दण्ड घटके नियत पूर्व में रहता है, वैसे दण्डगत रूप भी दण्ड के साथ ही घट के नियत पूर्व मे वर्तमान रहता है, अतः दण्डरूप भी घट का कारण होने लगेगा : इस दोष का निवारण करने के लिये उक्त कारण लक्षण मे' 'अनन्यथासिद्ध' पद का भी निवेश कर देना चाहिये, दण्ड का रूप तो घट के प्रति अन्यथासिद्ध है । इस प्रकार “अन्यथासिद्धभिन्नत्वे सति कार्य प्रति नियत पूर्ववृत्तित्वम्" यह कारण का निकृष्ट लक्षण हुआ । अन्यथासिद्धों की गणना न्यायसिद्धान्तमुक्तावली आदि ग्रन्थों में की गयी है । 'प्रागभाव-प्रतियोगित्व' कार्य का लक्षण है । कार्य उत्पन्न होने के पूर्व 'इह घटो भविष्यति' ऐसी प्रतीति अनुभवसिद्ध हैं । इस प्रतीति का विषय जो अभाव है, वह प्रागभाव कहाता है । और इस प्रागभाव का प्रतियोगी होने से घट आदि कार्य हैं । 'यस्याभावः स प्रतियोगी' यह प्रतियोगी का स्वरूप है ।
न्यायबोधिनी-कलासंवलितः २७ यत्समवेतं कार्यमुत्पद्यते तत् समवायिकारणम् । यथा तन्तवः पटस्य । पटश्च स्वगतरूपादेः । जिसमें समवायसम्बन्ध से रहता हुआ कार्य उत्पन्न होता है, वह उस कार्य के प्रति समवायिकारण होता है । जैसे, तन्तु पट का समवायिकारण होता है और पट अपने रूप का समवायिकारण होता है । न्यायबोधिनी कारणं विभजते - कारणमिति । समवायिकारणमसमवायिकारणं निमित्तकारणञ्चेति । समवायिकारणं लक्षयति-यत्समवेतमिति । यस्मिन् समवेतं सत्-सम वायेन सम्बद्धं सत् कार्यमुत्पद्यते तत्समवायिकारणमित्यर्थः । उदाहरणम्- यथा तन्तव इति । तन्तुषु समवायेन सम्बद्धं सत् पटात्मकं कार्यमुत्पद्यतेऽत- स्तन्तवः समवायिकारणमित्यर्थः । सामान्यलक्षणन्तु-समवायसम्बन्धावच्छिन्नकार्यता निरूपिततादात्म्यस- म्बन्धावच्छिन्नकारणत्वं समवायिकारणत्वमिति । हिन्दी-कला कारण तीन प्रकार के होते हैं-समवायिकारण (उपादानकारण) असमवायि- कारण और निमित्तकारण । जिसमें समवेत होकर अर्थात् समवायसम्बन्ध से सम्बद्ध होता हुआ कार्य पैदा होता है, उसे समवायिकारण कहते हैं। जैसे तन्तु (सूता) में समवायसम्बन्ध से सम्बद्ध ही होकर पटात्मक कार्य पैदा होता है, इसलिये तन्तु पट का समवायिकारण है। समवायिकारण का परिष्कृत सामान्यलक्षण निम्नलिखित है- समवायसम्बन्ध से अवच्छिन्न जो कार्यता, उसमें निरूपित एवं तादात्म्य- सम्बन्ध से अवच्छिन्न कारणत्व ही समवायिकारणत्व है । जैसे समवायेन घटरूपी कार्य का समवायिकारण तादात्म्येन कपाल है। क्योंकि घटरूपी कार्य समवायसम्बन्ध से कपाल में रहता है, और कपाल का कपाल से तादात्म्य है। अतः समवायसम्बन्ध से अवच्छिन्न तथा घटत्वधर्म से अवच्छिन्न जो घटवृत्ति कार्यता है, उससे निरूपित जो तादात्म्यसम्बन्ध से अवच्छिन्ना कारणता, वह कपाल में है। इस प्रकार समवायिकारण के लक्षण का समन्वय कपाल में हो गया। इसी प्रकार पट का समवायिकारण तन्तु बनता है । इसका विशेष स्पष्टीकरण 'संस्कृत-कला' व्याख्या में द्रष्टव्य है । इसी रीति से पट अपने रूप के प्रति समवायिकारण होता है । क्योंकि समवाय- सम्बन्ध से जन्यभावत्वावच्छिन्न (जन्यभावमात्र) के प्रति तादात्म्यसम्बन्ध से द्रव्य ही कारण होता है । जन्यभाव पदार्थ तीन हैं-द्रव्य, गुण और कर्म । अतः द्रव्य, गुण
२८ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः कार्येण कारणेन वा सहैकस्मिन्नर्थे समवेतं सत् कारणमसम- वायिकारणम् । यथा तन्तुसंयोगः पटस्य । तन्तुरूपं पटरूपस्य । कार्य के साथ या कारण के साथ एक पदार्थ में समवायसम्बन्ध से रहता हुआ जो कारण, वह असमवायिकारण है। जैसे = न्तुओं का संयोग पट का असमवायि- कारण होता है और तन्तु का रूप पट के रूप के प्रति असमवायिकारण होता है। न्यायबोधिनी समवायसम्बन्धेन घटाधिकरणे कपालादौ कपालादेः तादात्म्यसम्बन्धे- नैव सत्त्वात्, समवायसम्बन्धावच्छिन्नघटत्वावच्छिन्नकार्यतानिरूपिततादा- त्म्यसम्बन्धावच्छिन्नकारणतायाः कपालादौ सत्त्वाल्लक्षणसमन्वयः । समवायेन जन्यभावत्वावच्छिन्नं प्रति तादात्म्यसम्बन्धेन द्रव्यस्यैव कारणत्वात् जन्यभावेषु द्रव्यगुणकर्मसु त्रिषु द्रव्यमेव समवायिकारणम् । द्रव्ये तु द्रव्यावयवाः समवायिकारणम् । गुणादावपि द्रव्यमेव समवायि- कारणमित्याशयेनाह—पटश्च स्वगतरूपादेरिति । समवायिकारणमित्यनु- षज्यते । असमवायिकारणं लक्षयति—कार्येणेति । कार्येण सहैकस्मिन्नर्थे समवेतं सत् यत् कारणं तदसमवायिकारणमित्यन्वयः । कारणेन सहैकस्मिन्नर्थे समवेतं सत् यत् कारणं तदसमवायिकारणमित्यन्वयः । अत्र 'कारणेन' इत्यस्य स्वकार्यसमवायिकारणेनेत्यर्थः । जन्यद्रव्यमात्रेऽवयवसंयोगस्यैवास- हिन्दी-कला और कर्म के प्रति द्रव्य ही समवायिकारण होता है। द्रव्यसमवायिकारणता का उदाहरण कपाल को पहले बताया जा चुका है। वहां घटात्मक द्रव्य के प्रति समवायि- कारण उसका अवयवभूत कपाल भी द्रव्य ही है। इस प्रकार द्रव्य का समवायिकारण द्रव्य हुआ, यह स्पष्ट हो गया । उक्त नियम के अनुसार गुणस्वरूप जन्यभाव के प्रति भी द्रव्य समवायिकारण होता है। इसका उदाहरण मूल में बताया गया है—कि पट अपने रूप के प्रति सम- वायिकारण है। यहाँ पट का रूप गुण है। इसी प्रकार कर्म का समवायिकारण भी द्रव्य होता है, इसका उदाहरण है—अश्व आदि। घोड़ा अपनी गमन क्रिया (कर्म) के प्रति समवायिकारण होता है। क्योंकि समवायसम्बन्ध से गमनक्रिया अश्व में ही उत्पन्न होती है। असमवायिकारण का लक्षण बताते हैं—कार्य के साथ एक अर्थ में समवेत होता हुआ ( समवायसम्बन्ध से रहता हुआ ) जो कारण होता है, वह असमवायिकारण है। अथवा कारण के साथ एक अर्थ में समवेत होता हुआ जो कारण होता है वह भी असमवायिकारण है। यहाँ कारण के साथ का अर्थ है - अपने कार्य का जो समवायि-
न्यायबोधिनी-कलासंवलितः २९ न्यायबोधिनी मवायिकारणत्वात् पटात्मककार्ये तदवयवतन्तुसंयोगस्यैवासमवायि- कारणत्वमिति दर्शयति —यथा तन्तुसंयोगः पटस्येति । पटात्मककार्येण सहै- कस्मिन्नर्थे तन्तौ समवेतं सत् समवायसम्बन्धेन वर्तमानं सत् पटात्मककार्यं प्रति तन्तुसंयोगात्मकं कारणमसमवायिकारणमित्यर्थः । द्वितीयमसमवा- यिकारणं कारणेन सहेत्यादिना यत् पूर्वोक्तं, तदुदाहरति - तन्तुरूपमिति । कारणेन सह पटरूपसमवायिकारणीभूतपटेन सह एकस्मिन्नर्थे तन्तुरूपेऽर्थे समवेतं सत् समवायसम्बन्धेन वर्तमानं सत् तन्तुरूपं पटगतरूपं प्रति कारणं भवति अतोऽसमवायिकारणं तन्तुरूपं पटगतरूपस्य । सामान्यलक्षणन्तु— समवायसम्बन्धावच्छिन्नकार्यता निरूपिता या समवाय-स्वसमवायिसमवेत- त्वान्यतरसम्बन्धावच्छिन्ना कारणता तदाश्रयत्वमसमवायिकारणत्वमिति । हिन्दी-कला कारण है, उसके साथ अर्थात् अपने समवायिकारण के साथ एक अर्थ में रहने वाला कारण असमवायिकारण है। इस प्रकार दो तरह का असमवायिकारण होता है । प्रथम का उदाहरण तन्तुसंयोग है। क्योंकि जन्यद्रव्यमात्र के प्रति अवयवों के संयोग के ही असमवायिकारण होने से पटस्वरूप कार्य के प्रति उसके अवयवभूत तन्तुओ का संयोग ही असमवायिकारण होता है ! यहाँ पटात्मक कार्य के साथ तन्तु- स्वरूप एक अर्थ में समवायसम्बन्ध से तन्तु का संयोग वर्तमान है । अतः पट के प्रति तन्तुसंयोग असमवायिकारण हुआ । पूर्वोक्त द्वितीय असमवायिकारण का उदाहरण मूलकार देते हैं — जैसे तन्तु का रूप पटरूप का असमवायिकारण है। लक्षण का समन्वय यों हैं—यहाँ तन्तुरूप का कार्य पटरूप है और पटरूप का समवायिकारण पट है । अतः कारण के साथ अर्थात् पटरूप का समवायिकारण जो पट, उसके साथ एक अर्थ में तन्तु में, समवेत अर्थात् समवाय- सम्बन्ध से वर्तमान होता हुआ तन्तुरूप पटरूप के प्रति कारण होता है । इसलिये तन्तु का रूप पट के रूप के प्रति असमवायिकारण हुआ । पूर्व में उदाहृत उभय प्रकार के असमवायिकारण का सामान्यलक्षण (एक लक्षण) न्यायबोधिनीकार परिष्कृत करते हैं समवायसम्बन्धावच्छिन्ना जो कार्यता, ( पटगत कार्यता या पटरूपगत कार्यता ) उससे निरूपिता जो समवायसम्बन्ध या स्वसमवायि- समवेतत्वसम्बन्ध में किसी एक सम्बन्ध से अवच्छिन्ना कारणता (क्रमशः तन्तुसंयोग- गत या तन्तुरूपगत कारणता ) उसका आश्रयत्व असमवायिकारणत्व है । इसके अनुसार पट के प्रति तन्तुसंयोग और पटरूप के प्रति तन्तुरूप असमवायिकारण सिद्ध हुआ । विशेष विवेचन संस्कृत-कला' में द्रष्टव्य है ।