भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ४७ रेकि चेति । अन्वयेन व्यतिरेकेण च व्याप्तिमदन्वयव्यतिरेकि, यथा वह्नौ साध्ये धूमवत्त्वम् । यत्र धूमस्तत्राग्निर्यथा महानस- मित्यन्वयव्याप्तिः । यत्र वह्निनीस्ति तत्र धूमोऽपि नास्ति यथा हृद इति व्यतिरेकव्याप्तिः । जो लिङ्ग अन्वय और व्यतिरेक दोनों प्रकार से व्याप्तिमान् हो, वह अन्वय- व्यतिरेकि लिङ्ग है । जैसे, अग्नि को सिद्ध करने में "धूमवत्त्व" अन्वयव्यतिरेकि लिङ्ग है । "जहाँ धूम है, वहाँ अग्नि है, जैसे महानस" यह अन्वयव्याप्ति है । एवं "जहाँ अग्नि नहीं है, वहाँ धूम भी नहीं है, जैसे हृद (झील)" यह व्यतिरेक- व्याप्ति है । न्यायबोधिनी इति । 'यत्र' पदवीप्सया वह््न्यभावति यावति धूमाभावग्रहणे यावत्पदस्य व्यापकत्वपरतया धूमाभावे वह््न्यभावव्यापकत्वं लभ्यते, वह््न्यभावे धूमाभावव्याप्यत्वं च लभ्यते । एवं च वह््न्यभावनिष्ठव्याप्तेः स्वाश्रयीभूतवह््न्यभावव्यापकीभूताभाव- प्रतियोगित्वसम्बन्धेन धूमनिष्ठतया व्यतिरेकव्याप्तिमत्त्वेन धूमव्यापकव- ह्रिसमानाधिकरण्यरूपान्वयव्याप्तिमत्त्वेन चान्वयव्यतिरेकित्वेन गीयते । व्यतिरेकपरामर्शस्तु वह््न्यभावव्यापकीभूताभावप्रतियोगिधूमवान्पर्वत इत्या- कारकः । हिन्दी-कला रेक व्याप्ति है , इस व्याप्ति का अभिलाप यों होता है—"यत्र-तत्र वह््न्यभावस्तत्र तत्र धूमाभावः" ऐसा । यहाँ भी 'यत्र' पद की वीप्सा से जितने भी वह््न्यभाववान् हैं, उन सभी में धूमाभाव का ग्रहण होने के कारण 'यावत्' पद व्यापकत्व को बताता है । इस लिये धूमाभाव में वह््न्यभाव की व्यापकता अवगत होती है और वह््न्यभाव में में धूमाभाव की व्याप्यता अवगत होती है । इस प्रकार वह््न्यभावनिष्ठव्याप्ति 'स्वाश्रयीभूतवह््न्यभावव्यापकीभूताभाव- प्रतियोगित्वसम्बन्ध' से धूम में चली जाती है । अतः धूम व्यतिरेकव्याप्तिमान् होने के कारण तथा पूर्वोक्त प्रकार से 'धूमव्यापकवह्निसमानाधिकरण्यरूप' अन्वयव्याप्ति- मान् भी होने के कारण अन्वयव्यतिरेकी लिङ्ग कहा जाता है । अन्वय-परामर्श का स्वरूप पहले बताया गया है—'वह्निव्याप्यधूमवान् पर्वतः' ऐसा । व्यतिरेक-परामर्श का स्वरूप होगा—"वह््न्यभावव्यापकीभूताभावप्रतियोगिधूमवान् पर्वतः" ऐसा ।