तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
पृष्ठ 67, कुल 199 में से
संदर्भ में पढ़ें४८ तर्कसंग्रहः [ अनुमानपरिच्छेदः अन्वयमात्रव्याप्तिकं केवलान्वयि । यथा घटोऽभिधेयः प्रमेय- त्वात्पटवत् । अत्र प्रमेयत्वाभिधेयत्वयोर्व्यतिरेकव्याप्तिर्नास्ति, सर्व- स्यापि प्रमेयत्वादभिधेयत्वाच्च । जहाँ केवल अन्वयव्याप्ति हो, वह लिङ्ग केवलान्वयि कहा जाता है । जैसे— “घटोऽभिधेयः प्रमेयत्वात्” अर्थात् घट शब्दद्वारा वाच्य है, क्योंकि वह प्रमा का ( यथार्थ ज्ञान का ) विषय है । यहाँ “जो प्रमेय है, वह अभिधेय है” ऐसी अन्वय- व्याप्ति तो है । किन्तु “जहाँ अभिधेयत्व नहीं है, वहाँ प्रमेयत्व भी नहीं है” ऐसी प्रमेयत्व और अभिधेयत्व की व्यतिरेकव्याप्ति नहीं है, क्योंकि संसार की सभी वस्तु प्रमेय है और अभिधेय भी है । न्यायबोधिनी केवलान्वयिनो लक्षणमाह—अन्वयेति । व्यतिरेकव्याप्तिशून्यत्वे सति अन्वयव्याप्तिमत्त्वं केवलान्वयित्वम् । अथवा केवलान्वयिसाध्यकत्वं तत् । एतच्च लक्षणं हेतोर्व्यतिरेकित्वे- ऽपि सङ्गच्छते, साध्यस्य केवलान्वयित्वादेव व्यतिरेकव्याप्तेरभावात् ‘अन्व- यमात्रव्याप्तिकं केवलान्वयी’ति मूलकारोक्तं लक्षणमुपपन्नम् । अत्यन्ताभा- वाप्रतियोगित्वं केवलान्वयित्वम् । न चात्यन्ताभावाप्रतियोगित्वरूपकेवलान्वयित्वमाकाशाभावे संयोगा- हिन्दी-कला अन्वयमात्र-व्याप्ति वाला लिङ्ग केवलान्वयी होता है । अर्थात् 'व्यतिरेकव्याप्ति से रहित होते हुए अन्वयव्याप्तिमत्त्व' केवलान्वयी का लक्षण है । अथवा 'केवलान्वयिसाध्यकत्व' केवलान्वयित्व है । अर्थात् जिस लिङ्ग का साध्य केवलान्वयी हो, वह केवलान्वयी है । यह लक्षण हेतु के व्यतिरेकी होने पर भी सङ्गत हो जाता है, क्योंकि साध्यमात्र के केवलान्वयी होने से ही व्यतिरेकव्याप्ति का अभाव हो जायगा और “अन्वयमात्रव्याप्तिकं केवलान्वयि” यह मूलकारोक्त लक्षण उपपन्न हो जायगा । यहाँ साध्यगत केवलान्वयित्व अत्यन्ताभावाप्रतियोगित्वरूप है । अर्थात् अत्यन्ताभाव का जो अप्रतियोगी हो, वह केवलान्वयी है । “इदं वाच्यं ज्ञेयत्वात्” इस अनुमान में वाच्यत्व-साध्य केवलान्वयी है । क्योंकि जगत् के समस्त पदार्थ में वाच्यत्वधर्म रहता है । “उक्त अत्यन्ताभावाप्रतियोगित्वरूप केवलान्वयित्व की आकाशाभाव में तथा संयोगाभाव में अव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि आकाशाभाव आकाशाभावाभाव का प्रति- योगी ही होता है, एवं संयोगाभाव भी संयोगाभावाभाव का प्रतियोगी ही होता है ।” ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये । क्योंकि अत्यन्ताभावाप्रतियोगित्व का अर्थ 'स्वविरो-