तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन्यायबोधिनी-कलासंबलितः ४९ व्यतिरेकमात्रव्याप्तिकं केवलव्यतिरेकि । यथा पृथिवीतरेभ्यो भिद्यते गन्धवत्त्वात् , यदितरेभ्यो न भिद्यते न तद्गन्धवत् यथा जलम्, न चेयं तथा, तस्मान्न तथेति । अत्र यद्गन्धवत् तदितरभिन्न- मित्यन्वयदृष्टान्तो नास्ति, पृथिवीमात्रस्य पक्षत्वात् । जहाँ केवल व्यतिरेकव्याप्ति हो, वह लिङ्ग केवलव्यतिरेकि कहा जाता है। जैसे, “पृथिवी औरों से ( जलादिकों से ) भिन्न है; गन्धवान् होने से; जो औरों से भिन्न नहीं है, वह गन्धवान् नहीं होता है, जैसे जल; पृथिवी जल के समान गन्धशून्य नहीं है; इसलिये यह जलादि की तरह इतर से ( जलादि से ) अभिन्न नहीं है किन्तु भिन्न है। यहाँ जो गन्धवान् है वह इतर से भिन्न है—इसका अन्वयदृष्टान्त कोई नहीं है। क्योंकि पृथिवीमात्र पक्ष है, जिसमें साध्य अभी सन्दिग्धावस्था में ही है। जबकि निश्चित साध्यवान् ही अन्वयदृष्टान्त होता है। न्यायबोधिनी भावे चाव्याप्तमिति वाच्यम् । स्वविरोधिद्वृत्तिमदत्यन्ताभावाप्रतियोगित्व- स्यैव तदर्थत्वात् । तथा चानयोः एकजातीयसम्बन्धेन सर्वत्र विद्यमानत्वं केवलान्वयित्वमिति नव्याः । केवलव्यतिरेकिणो लक्षणमाह—व्यतिरेकेति । निश्चितान्वयव्याप्तिशू- न्यत्वे सति व्यतिरेकव्याप्तिमत्त्वं केवलव्यतिरेकित्वम् । यथा पृथिवीति । हिन्दी-कला द्विद्वृत्तिमदत्यन्ताभावाप्रतियोगित्व' है। गगनाभावाभाव गगनरूप होने से वृत्तिमान् अभाव नहीं है। कारण, गगन अवृत्ति पदार्थ है। एवं संयोगाभावाभाव संयोगाभाव का विरोधी नहीं है, क्योंकि उसी वृक्ष में एक भाग में कपि का संयोगाभाव है और दूसरे भाग में संयोगाभावाभाव अर्थात् कपि का संयोग भी है। इस प्रकार आकाशाभाव और संयोगाभाव दोनों ही केवलान्वयी बन जाते हैं, क्योंकि स्वविरोधी एवं वृत्तिमान् अत्यन्ताभाव के दोनों ही अप्रतियोगी हैं। एवं एकजातीयसम्बन्ध से अर्थात् स्वरूपसम्बन्ध से सर्वत्र विद्यमान रहना केवलान्वयित्व है, यह नव्यों का लक्षण है। जितने भी केवलान्वयी धर्म हैं, वे सभी स्वरूपसम्बन्ध से सर्वत्र विद्यमान रहते हैं। केवलव्यतिरेकी का लक्षण मूलकार करते हैं—“व्यतिरेकमात्रव्याप्तिकं केवल- व्यतिरेकि” इति। अर्थात् जिस हेतु में व्यतिरेकव्याप्ति ही हो अन्वयव्याप्ति न हो, वह केवलव्यतिरेकी लिङ्ग है। अर्थात् “निश्चयविषयीभूतअन्वयव्याप्ति से रहित होते हुए व्यतिरेकव्याप्तिमत्त्व” केवलव्यतिरेकित्व है। जैसे—“पृथिवी इतरेभ्यो भिद्यते गन्धवत्त्वात्” यहाँ गन्धवत्त्व-हेतु केवलव्यतिरेकी है। ४