भारतकोश
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तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

४८ तर्कसंग्रहः [ अनुमानपरिच्छेदः अन्वयमात्रव्याप्तिकं केवलान्वयि । यथा घटोऽभिधेयः प्रमेय- त्वात्पटवत् । अत्र प्रमेयत्वाभिधेयत्वयोर्व्यतिरेकव्याप्तिर्नास्ति, सर्व- स्यापि प्रमेयत्वादभिधेयत्वाच्च । जहाँ केवल अन्वयव्याप्ति हो, वह लिङ्ग केवलान्वयि कहा जाता है । जैसे— “घटोऽभिधेयः प्रमेयत्वात्” अर्थात् घट शब्दद्वारा वाच्य है, क्योंकि वह प्रमा का ( यथार्थ ज्ञान का ) विषय है । यहाँ “जो प्रमेय है, वह अभिधेय है” ऐसी अन्वय- व्याप्ति तो है । किन्तु “जहाँ अभिधेयत्व नहीं है, वहाँ प्रमेयत्व भी नहीं है” ऐसी प्रमेयत्व और अभिधेयत्व की व्यतिरेकव्याप्ति नहीं है, क्योंकि संसार की सभी वस्तु प्रमेय है और अभिधेय भी है । न्यायबोधिनी केवलान्वयिनो लक्षणमाह—अन्वयेति । व्यतिरेकव्याप्तिशून्यत्वे सति अन्वयव्याप्तिमत्त्वं केवलान्वयित्वम् । अथवा केवलान्वयिसाध्यकत्वं तत् । एतच्च लक्षणं हेतोर्व्यतिरेकित्वे- ऽपि सङ्गच्छते, साध्यस्य केवलान्वयित्वादेव व्यतिरेकव्याप्तेरभावात् ‘अन्व- यमात्रव्याप्तिकं केवलान्वयी’ति मूलकारोक्तं लक्षणमुपपन्नम् । अत्यन्ताभा- वाप्रतियोगित्वं केवलान्वयित्वम् । न चात्यन्ताभावाप्रतियोगित्वरूपकेवलान्वयित्वमाकाशाभावे संयोगा- हिन्दी-कला अन्वयमात्र-व्याप्ति वाला लिङ्ग केवलान्वयी होता है । अर्थात् 'व्यतिरेकव्याप्ति से रहित होते हुए अन्वयव्याप्तिमत्त्व' केवलान्वयी का लक्षण है । अथवा 'केवलान्वयिसाध्यकत्व' केवलान्वयित्व है । अर्थात् जिस लिङ्ग का साध्य केवलान्वयी हो, वह केवलान्वयी है । यह लक्षण हेतु के व्यतिरेकी होने पर भी सङ्गत हो जाता है, क्योंकि साध्यमात्र के केवलान्वयी होने से ही व्यतिरेकव्याप्ति का अभाव हो जायगा और “अन्वयमात्रव्याप्तिकं केवलान्वयि” यह मूलकारोक्त लक्षण उपपन्न हो जायगा । यहाँ साध्यगत केवलान्वयित्व अत्यन्ताभावाप्रतियोगित्वरूप है । अर्थात् अत्यन्ताभाव का जो अप्रतियोगी हो, वह केवलान्वयी है । “इदं वाच्यं ज्ञेयत्वात्” इस अनुमान में वाच्यत्व-साध्य केवलान्वयी है । क्योंकि जगत् के समस्त पदार्थ में वाच्यत्वधर्म रहता है । “उक्त अत्यन्ताभावाप्रतियोगित्वरूप केवलान्वयित्व की आकाशाभाव में तथा संयोगाभाव में अव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि आकाशाभाव आकाशाभावाभाव का प्रति- योगी ही होता है, एवं संयोगाभाव भी संयोगाभावाभाव का प्रतियोगी ही होता है ।” ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये । क्योंकि अत्यन्ताभावाप्रतियोगित्व का अर्थ 'स्वविरो-

न्यायबोधिनी-कलासंबलितः ४९ व्यतिरेकमात्रव्याप्तिकं केवलव्यतिरेकि । यथा पृथिवीतरेभ्यो भिद्यते गन्धवत्त्वात् , यदितरेभ्यो न भिद्यते न तद्गन्धवत् यथा जलम्, न चेयं तथा, तस्मान्न तथेति । अत्र यद्गन्धवत् तदितरभिन्न- मित्यन्वयदृष्टान्तो नास्ति, पृथिवीमात्रस्य पक्षत्वात् । जहाँ केवल व्यतिरेकव्याप्ति हो, वह लिङ्ग केवलव्यतिरेकि कहा जाता है। जैसे, “पृथिवी औरों से ( जलादिकों से ) भिन्न है; गन्धवान् होने से; जो औरों से भिन्न नहीं है, वह गन्धवान् नहीं होता है, जैसे जल; पृथिवी जल के समान गन्धशून्य नहीं है; इसलिये यह जलादि की तरह इतर से ( जलादि से ) अभिन्न नहीं है किन्तु भिन्न है। यहाँ जो गन्धवान् है वह इतर से भिन्न है—इसका अन्वयदृष्टान्त कोई नहीं है। क्योंकि पृथिवीमात्र पक्ष है, जिसमें साध्य अभी सन्दिग्धावस्था में ही है। जबकि निश्चित साध्यवान् ही अन्वयदृष्टान्त होता है। न्यायबोधिनी भावे चाव्याप्तमिति वाच्यम् । स्वविरोधिद्वृत्तिमदत्यन्ताभावाप्रतियोगित्व- स्यैव तदर्थत्वात् । तथा चानयोः एकजातीयसम्बन्धेन सर्वत्र विद्यमानत्वं केवलान्वयित्वमिति नव्याः । केवलव्यतिरेकिणो लक्षणमाह—व्यतिरेकेति । निश्चितान्वयव्याप्तिशू- न्यत्वे सति व्यतिरेकव्याप्तिमत्त्वं केवलव्यतिरेकित्वम् । यथा पृथिवीति । हिन्दी-कला द्विद्वृत्तिमदत्यन्ताभावाप्रतियोगित्व' है। गगनाभावाभाव गगनरूप होने से वृत्तिमान् अभाव नहीं है। कारण, गगन अवृत्ति पदार्थ है। एवं संयोगाभावाभाव संयोगाभाव का विरोधी नहीं है, क्योंकि उसी वृक्ष में एक भाग में कपि का संयोगाभाव है और दूसरे भाग में संयोगाभावाभाव अर्थात् कपि का संयोग भी है। इस प्रकार आकाशाभाव और संयोगाभाव दोनों ही केवलान्वयी बन जाते हैं, क्योंकि स्वविरोधी एवं वृत्तिमान् अत्यन्ताभाव के दोनों ही अप्रतियोगी हैं। एवं एकजातीयसम्बन्ध से अर्थात् स्वरूपसम्बन्ध से सर्वत्र विद्यमान रहना केवलान्वयित्व है, यह नव्यों का लक्षण है। जितने भी केवलान्वयी धर्म हैं, वे सभी स्वरूपसम्बन्ध से सर्वत्र विद्यमान रहते हैं। केवलव्यतिरेकी का लक्षण मूलकार करते हैं—“व्यतिरेकमात्रव्याप्तिकं केवल- व्यतिरेकि” इति। अर्थात् जिस हेतु में व्यतिरेकव्याप्ति ही हो अन्वयव्याप्ति न हो, वह केवलव्यतिरेकी लिङ्ग है। अर्थात् “निश्चयविषयीभूतअन्वयव्याप्ति से रहित होते हुए व्यतिरेकव्याप्तिमत्त्व” केवलव्यतिरेकित्व है। जैसे—“पृथिवी इतरेभ्यो भिद्यते गन्धवत्त्वात्” यहाँ गन्धवत्त्व-हेतु केवलव्यतिरेकी है। ४

५० तर्कसंग्रहः [ अनुमानपरिच्छेदः न्यायबोधिनी अत्र पृथिवीत्वावच्छिन्नं पक्षः, पृथिवीतरजलाद्यष्टभेदः साध्यम्, गन्धवत्त्वं हेतुः। अत्र यद्गन्धवत्तदितरभेदवदित्यन्वयदृष्टान्ताभावाद् गन्धव्यापकेतरभेद- सामानाधिकरण्यरूपान्वयव्याप्तिग्रहासम्भवः । किन्तु यत्र यत्र पृथिवीतरभेदा- भावस्तत्र तत्र गन्धाभावो यथा जलादिकमिति व्यतिरेकदृष्टान्ते जलादावि- तरभेदाभावरूपसाध्याभावव्यापकता गन्धाभावे गृह्यते । इममेवार्थं मनसि निधाय 'यदतरेभ्यो न भिद्यते न तद्गन्धवत् यथा जलमि'ति ग्रन्थेन मूल- कारो व्यतिरेकव्याप्तिमेव प्रदर्शितवान् । एवं प्रकारेण व्यतिरेकव्याप्तिग्रहानन्तरमितरभेदाभावव्यापकीभूताभाव- प्रतियोगिगन्धवती पृथिवीत्याकारकव्यतिरेकिपरामर्शात् पृथिवीत्वावच्छिन्नो- द्देश्यतान्निरूपितेतरभेदत्वावच्छिन्नविधेयताका 'पृथिवी इतरभेदवती' त्याका- रकानुमितिर्जायत इति तत्त्वम् । यथाश्रुतमूलार्थस्तु-यथा जलमिति। यत् = जलम्, इतरेभ्यो न भिद्यते = इतरभेदाभाववत्, न तद्गन्धवत् = जलमितरभेदाभावव्यापकगन्धाभाववत्, न चेयं तथेति । इयं पृथिवी न तथा = इतरभेदाभावव्यापकगन्धाभाववती न किन्तु तदभावात्मकगन्धवती । तस्मान्न तथेति । तस्मात् = गन्धाभावाभाव- हिन्दी-कला उक्त अनुमान में पृथिवीत्वावच्छिन्न पक्ष है, पृथिवी से इतर जो जलादि आठ द्रव्य हैं, उनका भेद साध्य है, और गन्धवत्त्व हेतु है। यहाँ पर जो “गन्धवान् है वह इतरभेदवान् है” ऐसा अन्वयदृष्टान्त नहीं होने से गन्धरूप हेतु का व्यापक जो इतरभेद- रूप साध्य, उसका सामानाधिकरण्यरूप अन्वयव्याप्ति का निश्चय होना असंभव है। किन्तु इसके विपरीत जहाँ जहाँ इतरभेदाभावरूप साध्याभाव है, वहाँ-वहाँ गन्धाभावरूप हेत्वभाव है, जैसे जलादि में । इस प्रकार जलादिरूप व्यतिरेकदृष्टान्त में इतरभेदा- भावरूप साध्याभाव की व्यापकता गन्धाभावरूप हेत्वभाव में गृहीत हो रही है। इस प्रकार साध्याभावव्यापकीभूताभावप्रतियोगित्वरूप केवलव्यतिरेकित्व गन्ध- वत्त्व-हेतु में घटित हो जाता है। इसलिये गन्धवत्त्व-हेतु केवलव्यतिरेकी है। इसी आशय को मन में रख कर मूलकार ने उक्त अनुमान में केवलव्यतिरेकव्याप्ति को ही प्रदर्शित किया । इस प्रकार से व्यतिरेकव्याप्ति का ग्रहण होने के अनन्तर “इतरभेदाभाव- व्यापकीभूताभावप्रतियोगिगन्धवती पृथिवी” इत्याकारक व्यतिरेकिपरामर्श होने से पृथिवीत्वावच्छिन्नोद्देश्यतान्निरूपित जो इतरभेदत्वावच्छिन्ना विधेयता, ( साध्यता ) तादृश साध्यतावाली “पृथिवी इतरभेदवती” इत्याकारक अनुमिति उत्पन्न हो जाती है । यही वस्तुस्थिति है । यहाँ की शेष न्यायबोधिनी पूर्व व्याख्यान से गतार्थ है।

न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ५१ सन्दिग्धसाध्यवान् पक्षः । यथा धूमवत्त्वे हेतौ पर्वतः । निश्चितसाध्यवान् सपक्षः । यथा तत्रैव महानसम् । निश्चितसाध्याभाववान् विपक्षः । यथा तत्रैव महाह्रदः । जिसमें साध्य का सन्देह हो, उसे पक्ष कहते हैं । जैसे धूमवत्त्व के हेतु होने पर पर्वत पक्ष है । जिसमें साध्य का निश्चय हो, वह सपक्ष है । जैसे धूमवत्त्व-हेतु के लिये महानस सपक्ष है । क्योंकि वहाँ धूमवत्त्व के साथ-साथ वह्नि का भी निश्चय है । जिसमें साध्य के अभाव का निश्चय हो, उसे विपक्ष कहते हैं । जैसे धूमवत्त्व-हेतु के लिये महाह्रद विपक्ष है । क्योंकि वहाँ धूमाभाव के साथ साथ वह्नयभाव भी निश्चित है । न्यायबोधिनी वत्त्वात्, न तथा = इतरभेदाभाववती न किन्तु इतरभेदाभावाभाववती इतर- भेदवतीत्यर्थः । पक्षलक्षणमाह—सन्दिग्धेति । साध्यप्रकारक सन्देहविशेष्यत्वं पक्षत्वम् । सन्देहश्च पर्वतो वह्निमान्न वेत्याकारः । इदं च लक्षणमनुमितेः पूर्वं साध्य- सन्देहो नियमेन जायत इत्यभिप्रायेण प्राचीनैः कृतम् । गगनविशेष्यकमेघप्र- कारक सन्देहाभावदशायामपि गृहमध्यस्थपुरुषस्य घनगर्जितश्रवणेन गगनं मेघवदित्याकारिकाया गगनत्वावच्छिन्नोद्देश्यता निरूपितमेघत्वावच्छिन्नवि- धेयताकाया अनुमितेर्दर्शनात्प्राचीन लक्षणं विहाय नवीनैरनुमित्युद्देश्यत्वं पक्षत्वमिति स्थिरीकृतम् । हिन्दी-कला ‘सन्दिग्ध साध्यवान् पक्षः’ इस मूलोक्त पक्षलक्षण को बोधिनीकार स्पष्ट करते हैं—साध्यप्रकारक जो सन्देह (पर्वतो वह्निमान् नवा इत्याकारक) उसका विशेष्य पक्ष है । यह जो पक्ष का सन्देह घटित लक्षण है, वह प्राचीनों का लक्षण है । इसका अभिप्राय यह है कि अनुमिति के पूर्व नियमतः साध्य का सन्देह होता ही है । किन्तु गगनविशेष्यक मेघप्रकारक सन्देह की अभावदशा में भी गृह के मध्य स्थित पुरुष को घनगर्जन सुनकर “गगनं मेघवत्” इत्याकारक गगनत्वावच्छिन्न उद्देश्यता- निरूपित मेघत्वावच्छिन्नविधेयताक अनुमिति होती देखी जाती है । इस कारण से प्राचीनों के उक्त लक्षण को छोड़कर नवीन नैयायिकों ने “अनुमित्युद्देश्यत्वं पक्षत्वम्” यही पक्षलक्षण निर्धारित किया। अर्थात् अनुमिति का जो उद्देश्य है, वह पक्ष है ।

५२ तर्कसंग्रहः [ अनुमानपरिच्छेदः सव्यभिचारविरुद्धसत्प्रतिपक्षासिद्धबाधिताः पञ्च हेत्वाभासाः । सव्यभिचारोऽनैकान्तिकः । स त्रिविधः—साधारणासाधा- रणानुपसंहारिभेदात् । तत्र साध्याभाववद्वृत्तिः साधारणोऽनैकान्तिकः । यथा- पर्वतो वह्निमान् प्रमेयत्वादिति । ( अत्र ) प्रमेयत्वस्य वह्नय- भाववति ह्रदे विद्यमानत्वात् । सव्यभिचा०-विरुद्ध-सत्प्रतिपक्ष-असिद्ध और बाधित ये पाँच हेत्वाभास हैं । जो हेतु अनैकान्तिक होता है, वह सव्यभिचार है । वह तीन प्रकार का होता है—साधारण-असाधारण और अनुपसंहारी के भेद से । उनमें साध्याभाव के अधिकरण में रहने वाला हेतु साधारणनामक अनैकान्तिक हेत्वाभास है । जैसे—“पर्वतो वह्नि- मान् प्रमेयत्वात्” इस अनुमान में प्रमेयत्व-हेतु साधारण अनैकान्तिक है । क्योंकि प्रमेयत्व-हेतु, वह्निरूपसाध्य का अभाव जिसमें है, ऐसे ह्रद में विद्यमान है । न्यायबोधिनी सपक्षलक्षणमाह—निश्चितेति । साध्यप्रकारकनिश्चयविशेष्यत्वं सपक्ष- त्वम् । निश्चयश्च महानसं वह्निमदित्याकारकः । विपक्षलक्षणमाह—निश्चितसाध्याभावेति । साध्याभावप्रकारकनिश्चय- विशेष्यत्वं विपक्षत्वम् । निश्चयश्च ह्रदो वह्नयभाववानित्याकारकः । एवं सद्धेतून्निरूप्य हेत्वाभासान्निरूपयति—सव्यभिचारेति । हेतुवदाभा- सन्त इति हेत्वाभासाः दुष्टहेतव इत्यर्थः । दोषाश्च व्यभिचारविरोधसत्प्रति- हिन्दी-कला मूलोक्त सपक्षलक्षण को न्यायबोधिनीकार स्पष्ट करते हैं—"साध्यप्रकारक- निश्चयविशेष्यत्वं सपक्षत्वम्”। अर्थात् जिसमें साध्यप्रकारक निश्चय हो, वह सपक्ष है। जैसे "महानसं वह्निमत्” ऐसा वह्निप्रकारक निश्चय महानसरूप विशेष्य में है, इस लिये महानस सपक्ष कहाता है । इसी तरह "साध्याभावप्रकारकनिश्चयविशेष्यत्व विपक्षत्व” है । अर्थात् जिसमें साध्याभाव का निश्चय हो, वह विपक्ष कहाता है । ऐसा निश्चय "ह्रदो वह्नयभाववान्” ऐसा निश्चय है । अतः इस निश्चय का विशेष्य जो ह्रद है, वह वह्निसाध्यक अनुमिति करने में विपक्ष कहाता है । मूलकार पूर्व में सद्धेतुओं का निरूपण करने के अनन्तर अब हेत्वाभासों का निरूपण करते हैं—सव्यभिचार विरुद्ध आदि । जो वस्तुतः हेतु न हों, परन्तु हेतु के समान भासित हों, वे हेत्वाभास हैं । अर्थात् दोषयुक्त हेतु हेत्वाभास हैं । हेतुदोष

न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ५३ न्यायबोधिनी पक्षासिद्धिबाधाः। एकज्ञानविषयप्रकृतहेतुतावच्छेदकवत्त्वसम्बन्धेन एतद्वि- शिष्टा हेतवो दुष्टहेतव इत्यर्थः। यद्विषयकत्वेन ज्ञानस्यानुमिति-तत्करणान्यतरप्रतिबन्धकत्वं तत्त्वं दोष- सामान्यस्य लक्षणम्। हेतौ दोषज्ञाने सत्यनुमितिप्रतिबन्धो जायते व्याप्तिज्ञान- प्रतिबन्धो वा। अतो वादिनिग्रहाय वादिनोद्भावितहेतौ दोषोद्भावनाय दुष्टहेतुनिरूपणमित्यर्थः। सव्यभिचारं विभज्य दर्शयति—साधारणेति। साधारणाद्यन्यतमत्वं सव्यभिचारसामान्यलक्षणम्। साधारणत्वं = साध्याभाववद्वृत्तित्वम्। वह्नि- हिन्दी-कला पांच प्रकार के होते हैं—व्यभिचार-विरोध-सत्प्रतिपक्ष-असिद्धि और बाध। एकज्ञान- विषयप्रकृतहेतुतावच्छेदकवत्त्वसम्बन्ध से दोषविशिष्ट जो हेतु, वे दुष्टहेतु हैं। तात्पर्य यह है कि जिस ज्ञान में दोष विषय होकर भासित होता है, उसमें हेतु भी विषय होता ही है। इसलिये एक ज्ञान का विषय होने से एकज्ञानविषयहेतुतावच्छेदक- वत्त्वरूप सम्बन्ध जब हेतु में गया, तब उस सम्बन्ध से दोषरूप सम्बन्धी भी उस हेतु में चला गया। इस प्रकार कहीं हेतु में साक्षात् दोषवत्ता न होने पर भी उक्त परम्परासम्बन्ध से दोषवत्ता चली जाती है, और वह बाधादिस्थलीय हेतु भी 'दुष्ट- हेतु' पद से व्यवहृत होता है। यद्विषयकत्वेन ज्ञान अनुमिति का या उसके करण (व्याप्तिज्ञान) का प्रतिबन्धक होता है, तत्त्व दोषसामान्य का लक्षण है। अर्थात् यद्विषयक ज्ञान अनुमिति या उसके करण का प्रतिबन्धक होता है, वह दोष (हेत्वाभास) है। चूंकि हेतु में दोषज्ञान होने पर अनुमिति का प्रतिबन्ध अथवा व्याप्तिज्ञान का प्रतिबन्ध हो जाता है, इसी- लिये वादी को निगृहीत करने के लिये वादीद्वारा उद्भावित जो स्वपक्षसाधक हेतु, उसमें दोषज्ञानपूर्वक दोष का उद्भावन किया जाय, एतदर्थ दुष्टहेतु का निरूपण किया जाता है। अर्थात् हेत्वाभास का निरूपण भी अप्रासङ्गिक या निरर्थक नहीं है। अतः उसका भी निरूपण यहाँ अवश्य कर्तव्य है। विभागपूर्वक सव्यभिचार को मूलकार प्रदर्शित करते हैं—साधारण, असाधारण और अनुपसंहारी तीन प्रकार का सव्यभिचार होता है। सव्यभिचार का ही दूसरा नाम अनैकान्तिक है। अतः 'अनैकान्तिकत्व' सव्यभिचार का लक्षण नहीं है। किन्तु 'साधारणादित्रितयान्यतमत्व' ही सव्यभिचारसामान्य का लक्षण है। पृथक्-पृथक् लक्षण यों है—हेतु का साध्याभाव के अधिकरण में रहना साधारण सव्यभिचार का लक्षण है। जैसे—'वह्निमान् प्रमेयत्वात्' यहाँ पर प्रमेयत्वहेतु में जब वह्न्यभावाधि- करणवृत्तित्वरूप व्यभिचार का ज्ञान हो जाता है, तब वहाँ साध्याभाववद्वृत्तित्वरूप

५४ तर्कसंग्रहः [ अनुमानपरिच्छेदः सर्वसपक्षविपक्षव्यावृत्तः पक्षमात्रवृत्तिरसाधारणः । यथा— शब्दो नित्यः शब्दत्वादिति । (अत्र) शब्दत्वं सर्वेभ्यो नित्येभ्योऽ- नित्येभ्यश्च व्यावृत्तं शब्दमात्रवृत्ति । अन्वयव्यतिरेकदृष्टान्तरहितोऽनुपसंहारी । यथा—सर्वमनित्यं प्रमेयत्वादिति । अत्र सर्वस्यापि पक्षत्वाद् दृष्टान्तो नास्ति । जो हेतु सभी सपक्षों और विपक्षों से व्यावृत्त हो अर्थात् उनमें न रहने वाला हो, किन्तु पक्षमात्र में रहे, वह असाधारणनामक अनैकान्तिक हेत्वाभास है। जैसे- "शब्दो नित्यः शब्दत्वात्" इस अनुमान में शब्दत्व-हेतु असाधारण अनैकान्तिक है। क्योंकि शब्दत्व-हेतु सपक्षभूत सभी नित्य पदार्थों से और विपक्षभूत सभी अनित्य पदार्थों से व्यावृत्त रहता हुआ शब्दरूप पक्षमात्र में रहता है । जो हेतु अन्वय-दृष्टान्त और व्यतिरेक-दृष्टान्त से रहित हो, वह अनुपसंहारी- नामक अनैकान्तिक हेत्वाभास है। जैसे—"सर्वमनित्यं प्रमेयत्वात्" इस अनुमान में प्रमेयत्व हेतु अनुपसंहारी अनैकान्तिक है । क्योंकि सभी पदार्थों के पक्षकोटि में आ- जाने से पक्षातिरिक्त कोई बचा नहीं, जो अन्वय-दृष्टान्त या व्यतिरेक-दृष्टान्त बन सके । न्यायबोधिनी मान् प्रमेयत्वादित्यत्र प्रमेयत्वहेतौ वह्न्यभाववद्वृत्तित्वरूपव्यभिचारे ज्ञाते वह्न्यभाववद्वृत्तित्वरूपव्याप्तिज्ञानप्रतिबन्धः फलम् । असाधारण इति । सर्वसपक्षव्यावृत्तत्वं निश्चितसाध्यवदवृत्तित्वम् । साध्यवदवृत्तित्वं च साध्यासामानाधिकरण्यम् । हेतौ साध्यासामानाधि- करण्ये निश्चिते साध्यसामानाधिकरण्यरूपव्याप्तिज्ञानप्रतिबन्धः फलम् । हिन्दी-कला व्याप्ति का ज्ञान प्रतिबन्धित हो जाता है, और व्याप्तिज्ञान के अभाव में अनुमिति नहीं हो पाती । इस प्रकार साधारणज्ञान का फल व्याप्तिज्ञान का प्रतिबन्ध कर देना है । सर्व सपक्ष-विपक्ष से जो हेतु व्यावृत्त हो और पक्षमात्र में रहे, वह असाधारण अनैकान्तिक है। सर्वसपक्षव्यावृत्तत्व का अर्थ है—निश्चितसाध्यवान् में हेतु का न रहना। साध्यवदवृत्तित्व का अभिप्राय है-साध्य के साथ सामानाधिकरण्य का अभाव । इस प्रकार हेतु में साध्य के साथ सामानाधिकरण्याभाव का निश्चय होने पर साध्य- सामानाधिकरण्यरूप व्याप्ति का ज्ञान प्रतिबन्धित हो जाता है। और यही इस हेत्वा- भास के ज्ञान का फल है ।

न्यायबोधिनी-कलासंवलित- ५५ साध्याभावव्याप्तो हेतुविरुद्धः । यथा शब्दो नित्यः कृतकत्वात् जो हेतु साध्य से व्याप्त न होकर साध्याभाव से व्याप्त हो, वह विरुद्धनामक न्यायबोधिनी अनुपसंहारिणं लक्षयति—अन्वयेति । उभयत्र दृष्टान्ताभावादन्वयव्याप्ति- ज्ञानव्यतिरेकव्याप्तिज्ञानोभयसामग्री नास्तीत्यर्थः । सर्वस्यैव पक्षत्वात्पक्षा- तिरिक्ताप्रसिद्धेरिति भावः । किंचिद्विशेष्यकनिश्चयाविषयसाध्यकत्वे सति किञ्चिद्विशेष्यकनिश्चयाविषयसाध्याभावकत्वमेवानुपसंहारित्वम् । एतदीय- ज्ञानस्य व्याप्तिसंशयजननद्वारा व्याप्तिज्ञानप्रतिबन्धः फलम् । वस्तुतस्तु अत्यन्ताभावाप्रतियोगिसाध्यादिकत्वमेवानुपसंहारित्वमिति बोध्यम् । हिन्दी-कला अनुमिति में अपेक्षित अन्वयदृष्टान्त या व्यतिरेकदृष्टान्त इन दोनों से रहित जो हेतु, वह अनुपसंहारी है । जैसे—'सर्वमनित्यं प्रमेयत्वात्' यहाँ सब कुछ पक्ष बन गया है । इसलिये पक्ष से इतर न कोई सपक्ष बच गया है कि अन्वयदृष्टान्त मिले और न कोई विपक्ष बच गया है कि कोई व्यतिरेकदृष्टान्त मिले । इस प्रकार दोनों दृष्टान्त का अभाव होने के कारण अन्वयव्याप्तिज्ञान या व्यतिरेकव्याप्ति- ज्ञान किसी की भी सामग्री नहीं मिल पाती है । क्योंकि सबके पक्ष बन जाने से पक्षातिरिक्त अप्रसिद्ध है । अनुपसंहारी का परिष्कृत लक्षण बोधिनीकार कहते हैं—किञ्चिद्विशेष्यक इत्यादि । अर्थात् किसी को विशेष्य बनाकर होने वाले निश्चय का अविषय साध्य हो, साथ ही किसी को विशेष्य बनाकर होने वाले निश्चय का अविषय साध्याभाव भी हो, तब वहाँ का हेतु अनुपसंहारी होता है । तात्पर्य यह है कि कहीं भी न साध्य का निश्चय हो और न साध्याभाव का निश्चय हो, उस स्थिति में वहाँ का हेतु अनुपसंहारी होगा । "सर्वम् अनित्यं प्रमेयत्वात्” यहाँ यही स्थिति है । क्योंकि सब के पक्ष बन जाने से सर्वत्र अनित्यत्व का सन्देह ही है, निश्चय कहीं नहीं है । इस हेत्वाभास के ज्ञान का फल व्याप्ति में संशय पैदा कर व्याप्तिज्ञान का प्रतिबन्ध कर देना है । वस्तुस्तु साध्य-हेतु आदि का अत्यन्ताभाव का अप्रतियोगी होना ही अनुपसंहारी का लक्षण है । इसके अनुसार 'सर्वमनित्यं प्रमेयत्वात्' के समान 'इदं वाच्यं ज्ञेयत्वात्' इत्यादि का अनुपसंहारी-हेत्वाभास में अन्तर्भाव हो जायगा । अनुपसंहारी के इस लक्षण की दृष्टि से 'साध्याभाववदवृत्तित्वम्' यही व्याप्ति का स्वरूप मानना युक्त है । क्योंकि केवलान्वयीस्थल में दुष्ट-हेतु होने के कारण उसमें व्याप्ति का न होना अभीष्ट ही है । अतः सिद्धान्तलक्षण बनाकर वहाँ व्याप्तिलक्षण ले जाने का प्रयास अनावश्यक है ।

५६ तर्कसंग्रहः [ अनुमानपरिच्छेदः घटवदिति । ( अत्र ) कृतकत्वं हि नित्यत्वाभावेनाऽनित्यत्वेन व्याप्तम् । साध्याभावसाधकं हेत्वन्तरं यस्य, स सत्प्रतिपक्षः । यथा- शब्दो नित्यः श्रावणत्वाच्छब्दत्ववत्, शब्दोऽनित्यः कार्यत्वाद् घटवत् । हेत्वाभास है । जैसे—"शब्दो नित्यः कृतकत्वात्" इस अनुमान में कृतकत्व-हेतु विरुद्ध है । क्योंकि कृतकत्व-हेतु नित्यत्वाभावरूप अनित्य से व्याप्त है । जिस हेतु के साध्य का अभाव सिद्ध करने वाला हेत्वन्तर ( दूसरा हेतु ) विद्य- मान हो, वह सत्प्रतिपक्षनामक हेत्वाभास है । जैसे—"शब्दो नित्यः श्रावणत्वात् शब्दत्ववत्" इस अनुमान में श्रावणत्व-हेतु नित्यत्व का साधक है । किन्तु इसके विप- रीत "शब्दोऽनित्यः कार्यत्वात् घटवत्" इस अनुमान में प्रयुक्त कार्यत्वरूप हेत्वन्तर नित्यत्व-साध्य का अभावरूप अनित्य सिद्ध करने वाला भी विद्यमान है । इसलिये यहाँ के दोनों ही अनुमानों के दोनों ही हेतु परस्पर के प्रति सत्प्रतिपक्षत हो जाते हैं और दोनों ही अनुमिति रुक जाती है । न्यायबोधिनी विरुद्धं लक्षयति—साध्याभावव्याप्त इति । साध्याभावव्याप्तिः = साध्याभावनिरूपितव्यतिरेकव्याप्तिः=साध्यव्यापकीभूताभावप्रतियोगित्वम् । तथा च पक्षविशेष्यकसाध्याभावव्याप्यहेतुप्रकारकज्ञानात् पक्षविशेष्यकसाध्य- प्रकारकानुमितिप्रतिबन्धः फलम् । एवं सत्प्रतिपक्षेऽपि । विरुद्धसत्प्रतिपक्ष- योर्विशेषस्तु विरुद्धहेतोरेकत्वेन सत्प्रतिपक्षहेतोर्द्वित्वेन च ज्ञातव्यः । हिन्दी-कला साध्याभाव का व्याप्त हेतु विरुद्ध है । साध्याभाव की व्याप्ति का अर्थ है— साध्याभावनिरूपित व्यतिरेकव्याप्ति । अर्थात् साध्य का व्यापकीभूत जो अभाव, उसका प्रतियोगी होना साध्याभाव की व्याप्ति है । जैसे—"शब्दो नित्यः कृतकत्वात्" यहाँ कृतकत्व-हेतु नित्यत्व-साध्य का व्यापकीभूत कृतकत्वाभाव का प्रतियोगी है, इसलिए कृतकत्व-हेतु नित्यत्वसाध्य के प्रति विरुद्ध है । पक्ष में साध्याभावव्याप्यहेतुप्रकारक ज्ञान होने पर पक्षविशेष्यक साध्य- प्रकारक अनुमति का प्रतिबन्ध हो जाता है । यही इस हेत्वाभासज्ञान का फल है । सत्प्रतिपक्षस्थल में भी अनुमिति का प्रतिबन्ध ही फल है । फिर भी विरुद्ध और सत्प्रतिपक्ष में यह अन्तर है कि विरुद्ध में एक ही हेतु का प्रयोग होता है, और सत्प्रति- पक्ष में दो हेतुओं का प्रयोग होता है ।

न्यायबोधिनी-कलासंबलितः ५७ असिद्धस्त्रिविधः — आश्रयासिद्धः स्वरूपासिद्धो व्याप्यत्वा- सिद्धश्चेति । आश्रयासिद्धो यथा-गगनारविन्दं सुरभि, अरविन्दत्वात्, सरो- जारविन्दवत् । अत्र गगनारविन्दमाश्रयः, स च नास्त्येव । असिद्धनामक हेत्वाभास तीन प्रकार का होता है—आश्रयासिद्ध-स्वरूपासिद्ध और व्याप्यत्वासिद्ध । इसमें आश्रयासिद्ध जैसे—'गगनारविन्दं सुरभि, अरविन्दत्वात्, सरोजारविन्दवत्' इस अनुमान में गगनारविन्द आश्रय है, और वह है ही नहीं । अतः यहाँ का हेतु आश्रयासिद्ध हेत्वाभास है । न्यायबोधिनी साध्याभावव्याप्यप्रतिहेतुमतपक्षस्सत्प्रतिपक्ष इति यावत् । साध्याभाव- साधकहेतुः साध्यसाधकत्वेनोपन्यस्त इत्यसामर्थ्यसूचनमपि । आश्रयासिद्ध इति । आश्रयासिद्धिर्नाम पक्षतावच्छेदकविशिष्टपक्षा- प्रसिद्धिः । यथेति । अत्रारविन्दे गगनीयत्वाभावे निश्चिते गगनीयत्ववि- शिष्टारविन्दे सौरभ्यानुमितिप्रतिबन्धः फलम् । हिन्दी-कला मूलोक्त सत्प्रतिपक्षलक्षण का निष्कर्ष बताते हैं—"साध्याभावव्याप्यप्रतिहेतुमत- पक्षः सत्प्रतिपक्षः" इति । अर्थात् 'साध्यव्याप्यहेतुमान् पक्षः' ऐसा वादी द्वारा साध्य- सिद्धि के अनुकूल परामर्श उपस्थापित करने के अनन्तर जब प्रतिवादी द्वारा "साध्या- भावव्याप्य प्रतिहेतुमान् पक्षः" ऐसा साध्याभावसिद्धि के अनुकूल परामर्श उपस्थापित कर दिया जाय तो, वहाँ सत्प्रतिपक्ष हेत्वाभास हो जाता है । और दोनों ही परामर्श एक दूसरे के विरोधी होने के कारण दोनों ही अनुमिति प्रतिबन्धित हो जाती है । दोनों ही हेतु सत्प्रतिपक्षित हो जाते हैं । सत्प्रतिपक्ष में साध्याभावसाधक दूसरा हेतु होता है किन्तु विरुद्ध में साध्याभावसाधक हेतु को ही वादी ने अज्ञानतावश साध्यसाध- कत्वेन उपन्यस्त कर दिया, इससे उसकी असमर्थता सूचित होती है, यह भी सत्प्रति- पक्ष और विरुद्ध में अन्तर है । पक्षतावच्छेदकधर्म से विशिष्ट पक्ष की अप्रसिद्धि आश्रयासिद्धि है । जैसे, "गगनारविन्दं सुरभि अरविन्दत्वात्" यहाँ अरविन्द में गगनीयत्व का अभाव निश्चित होने से गगनीयत्वविशिष्ट अरविन्द में सौरभ्य की अनुमिति बाधित हो जाती है । यही आश्रयासिद्धिज्ञान का फल है ।

५८ तर्कसंग्रहः [ अनुमानपरिच्छेदः स्वरूपासिद्धो यथा-शब्दो गुणश्चाक्षुषत्वात्। अत्र चाक्षुषत्वं शब्दे नास्ति, शब्दस्य श्रावणत्वात्। सोपाधिको हेतुर्व्याप्यत्वासिद्धः। साध्यव्यापकत्वे सति साधना- व्यापकत्वमुपाधिः। साध्यसमानाधिकरणात्यन्ताभावाप्रतियोगित्वं साध्यव्यापकत्वम्। साधनवनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वं साधना- स्वरूपासिद्ध जैसे—"शब्दो गुणश्चाक्षुषत्वात्" यहाँ चाक्षुषत्व-हेतु शब्दरूप पक्ष में नहीं है। क्योंकि शब्द श्रावण होता है, चाक्षुष नहीं होता। उपाधियुक्त हेतु व्याप्यत्वासिद्ध है। जो साध्य का व्यापक होते हुए साधन का अव्यापक हो, वह उपाधि कहाता है। साध्यव्यापकत्व का अर्थ है—साध्यसमाना- धिकरण जो अत्यन्ताभाव, उसका अप्रतियोगी होना। एवं, साधन (हेतु) के अधिकरण में रहने वाला जो अत्यन्ताभाव, उसका प्रतियोगी होना, साधना- व्यापकत्व है। न्यायबोधिनी स्वरूपासिद्ध इति। स्वरूपासिद्धिर्नाम पक्षे हेत्वभावः। तथा च हेत्व- भावविशिष्टपक्षज्ञानात् पक्षविशेष्यकहेतुप्रकारकपरामर्शानुपपत्त्या परामर्श- प्रतिबन्धः फलम्। व्याप्यत्वासिद्ध इति। प्रकृते धूमव्यापकत्वमार्द्रेन्धनसंयोगे गृहीतं चेद् धूमे आर्देन्धनसंयोगव्याप्यत्वं गृहीतम्। एवं वह्ने र्व्यापकत्वमार्द्रेन्धनसंयोगे गृहीतं चेद् वह्नौ तदव्याप्यत्वं गृहीतम्। तदेव व्यभिचरितत्वम्। तथा चोपा- धिव्यभिचारित्वं साधने गृहीतं चेदुपाधिभूतार्द्रेन्धनसंयोगव्याप्यधूमव्यभि- चारित्वं गृहीतमेव। अनुमानप्रकारश्च—पूर्वानुमानहेतुं पक्षीकृत्य वह्निर्धूमव्यभिचारी, धूम- व्यापकार्द्रेन्धनसंयोगव्यभिचरितत्वात्, घटत्वादिवत्, यो यत्साध्यव्यापकव्य- हिन्दी-कला पक्ष में हेतु का अभाव होना स्वरूपासिद्धि है। स्वरूपासिद्धि की स्थिति में हेत्व- भावविशिष्टपक्ष का ज्ञान होने से पक्षविशेष्यक हेतुप्रकारक परामर्श नहीं उत्पन्न हो सकेगा। अतः परामर्श का प्रतिबन्ध ही इसका फल है। उपाधिसहित हेतु व्याप्यत्वासिद्ध होता है। साध्य का व्यापक होता हुआ जो साधन का अव्यापक हो, वह उपाधि है। साध्यव्यापकत्व और साधनाव्यापकत्व का स्वरूप और उदाहरण मूल में बता दिया गया है। न्यायबोधिनीकार उपाधि का प्रयोजन दर्शाते हैं, जैसा कि न्यायसिद्धान्तमुक्तावली में कहा है—"व्यभिचारस्यानु- मानमुपाधेस्तु प्रयोजनम्"। 'धूमवान् वह्नेः' यहाँ वह्नि-हेतु सोपाधिक होने से व्याप्यत्वासिद्ध है। यहाँ आर्देन्धनसंयोग उपाधि है और आर्देन्धनसंयोग में धूम (साध्य) की व्यापकता गृहीत

न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ५९ व्यापकत्वम् । पर्वतो धूमवान् वह्निमत्त्वादित्यत्रार्द्रेन्धनसंयोग उपाधिः । यत्र धूमस्तत्रार्द्रेन्धनसंयोग इति साध्यव्यापकता । यत्र वह्निस्तत्रार्द्रेन्धनसंयोगो नास्ति, अयोगोलके आर्द्रन्धनसंयोगाभावा- दिति साधनाव्यापकता । एवं साध्यव्यापकत्वे सति साधनाव्याप- कत्वादार्द्रेन्धनसंयोग उपाधिः । सोपाधिकत्वाद्वह्निमत्त्वं व्याप्य- त्वासिद्धम् । जैसे— 'पर्वतो धूमवान् वह्निमत्त्वात्" इस अनुमान में आर्द्रन्धनसंयोग उपाधि है । क्योंकि यहां धूम साध्य है, और जहां-जहां धूम है, वहां-वहां आर्द्रन्धन-संयोग रहता है, इसलिए आर्द्रन्धनसंयोग धूमरूप साध्य का व्यापक हुआ । किन्तु यहां वह्नि साधन ( हेतु ) है, और वह वह्निरूप साधन जहाँ-जहाँ रहता है, वहां-वहां आर्द्रन्धन- संयोग नहीं रहता है, जैसे तपे हुए अयोगोलक ( लोहा ) में वह्नि तो है, परन्तु आर्द्रन्धनसंयोग नहीं है । इसलिये वह्निरूप साधन का आर्द्रन्धनसंयोग अव्यापक हुआ। इस प्रकार साध्य का व्यापक होने से और साधन का अव्यापक होने से उक्त अनुमान में आर्द्रन्धनसंयोग उपाधि है । इसीलिये उपाधियुक्त होने के कारण यहाँ वह्निमत्त्व हेतु व्याप्यत्वासिद्धनामक असिद्ध हेत्वाभास है । न्यायबोधिनी भिचारी, स सर्वोऽपि साध्यव्यभिचारीति रीत्या बोध्यः । एवंप्रकारेण प्रकृतानुमानहेतुभूते पक्षे साध्यव्यभिचारोत्थापकतया दूषकत्वमुपाधेः हिन्दी-कला होने पर धूम में आर्द्रन्धनसंयोग की व्यापकता गृहीत होगी । इसी प्रकार आर्द्रन्धन- संयोग में वह्नि ( साधन ) की अव्यापकता यदि गृहीत हुई तो वह्नि में आर्द्रन्धनसंयोग की अव्याप्यता गृहीत हो जायगी। यही व्यभिचार है। अर्थात् आर्द्रन्धनसंयोगरूप उपाधि का व्यभिचारित्व जब वह्नि-साधन में गृहीत हो गया तो उपाधिव्याप्य जो धूम, उसका व्यभिचारित्व वह्नि-हेतु में सुतरां गृहीत हो जायगा । क्योंकि जो व्यापक का व्यभिचारी होगा, वह व्याप्य का व्यभिचारी अवश्य होगा। इस प्रकार हेतु में व्यभिचार का अनुमान करा देना उपाधि का प्रयोजन सिद्ध हुआ । अनुमान का प्रकार यों होगा—वह्नि धूम का व्यभिचारी है, धूमव्यापकार्द्रन्धन- संयोग का व्यभिचारी होने से, घटत्वादि के समान। जो जिस साध्य के व्यापक का व्यभिचारी होता है, वह उस साध्य का भी व्यभिचारी होता है। इस प्रकार वादीद्वारा प्रयुक्त हेतु को पक्ष बनाकर उसमें साध्य-व्यभिचार के उद्भावन द्वारा वादी के हेतु को दोषयुक्त सिद्ध कर देना उपाधि का फल है। एवं वह्नि-हेतु में धूमाभाववद-

६० तर्कसंग्रहः [ अनुमानपरिच्छेदः यस्य साध्याभावः प्रमाणान्तरेण निश्चितः, स बाधितः । यथा- वह्निरनुष्णो द्रव्यत्वादिति । अत्रानुष्णत्वं साध्यं, तदभाव उष्णत्वं स्पर्शनप्रत्यक्षेण गृह्यत इति बाधितत्वम् । जिस हेतु के साध्य का अभाव प्रत्यक्षादि प्रमाणान्तर से पक्ष में निश्चित हो, वह हेतु बाधितनामक हेत्वाभास है । जैसे— "वह्निरनुष्णो द्रव्यत्वात्" इस अनुमान में द्रव्यत्व-हेतु बाधित है । क्योंकि यहाँ अग्नि में अनुष्णत्व (उष्णत्वाभाव) साध्य है, और उष्णत्वाभाव का अभाव उष्णत्व स्पर्शनप्रत्यक्ष से सभी को अग्नि में गृहीत होता है । इसलिये यहाँ का द्रव्यत्व-हेतु बाधितनामक हेत्वाभास होगा । ॥ इत्यनुमानपरिच्छेदः ॥ न्यायबोधिनी फलम् । तथाच धूमाभाववद्वृत्तित्वाभावरूपधूमव्यभिचारे गृहीते वह्नौ धूमाभाववद्वृत्तित्वरूपव्याप्तिज्ञानप्रतिबन्धः फलम् । न च व्याप्यत्वासिद्धेः व्यभिचारादभेद इति वाच्यम्, धूमाभाववद्वृत्ति- त्वाभावाभावत्वेन व्याप्यत्वासिद्धत्वं, धूमाभाववद्वृत्तित्वेन व्यभिचारित्व- मिति भेदात् । यस्येति । यस्य हेतोः साध्याभावः—साध्यबाधः, प्रमाणान्तरेण—प्रत्य- क्षादिप्रमाणेन पक्षे निश्चितः, स बाधित इत्यर्थः । तथा च प्रात्यक्षिकसाध्य- बाधनिश्चये जाते साध्यानुमितिप्रतिबन्धः फलम् । बाधितसाध्यकत्वाद् बाधितहेतुरित्युच्यते । ॥ इति न्यायबोधिन्यामनुमानपरिच्छेदः ॥ हिन्दी-कला वृत्तित्वाभावरूप धूम-व्यभिचार का ग्रहण होने पर धूमाभाववद्वृत्तित्वरूप व्याप्ति के ज्ञान का प्रतिबन्ध हो जाना व्याप्यत्वासिद्धि-हेत्वाभास का फल है । यहाँ यह आपत्ति नहीं दी जा सकती कि "व्याप्यत्वासिद्धि का व्यभिचार के साथ अभेद हो गया" क्योंकि धूमाभाववद्वृत्तित्वाभावाभावत्व रूप से व्याप्यत्वासिद्धि होती है । यही दोनों में भेद है । जिस हेतु का साध्याभाव अर्थात् साध्य का बाध प्रत्यक्षादि-प्रमाण से पक्ष में पहले से ही निश्चित है, वह हेतु बाधित कहाता है । अतः प्रत्यक्ष-प्रमाण से साध्य के बाध का निश्चय होने पर साध्या नुमिति का प्रतिबन्ध हो जाता है । यही बाधज्ञान का फल है । यद्यपि साध्य ही बाधित होता है, फिर भी उपचार से हेतु को बाधित कहा जाता है । इति तर्कसंग्रहन्यायबोधिन्याः 'हिन्दी-कलायाम्' अनुमानपरिच्छेदः ।

अथोपमानपरिच्छेदः उपमितिकरणमुपमानम् । संज्ञासंज्ञिसम्बन्धज्ञानमुपमितिः, तत्करणं सादृश्यज्ञानम् । तथाहि—कश्चिद् गवयपदार्थमजानन् कुतश्चिदारण्यकपुरुषात् 'गोसदृशो गवय' इति श्रुत्वा वनं गतो वाक्यार्थं स्मरन् गोसदृशं पिण्डं पश्यति । तदनन्तरमसौ गवयशब्द- वाच्य इत्युपमितिरुत्पद्यते । उपमितिनामक प्रमा का करण उपमान प्रमाण है । संज्ञा-संज्ञि के सम्बन्ध का ज्ञान उपमिति है । उसका करण ( असाधारण कारण ) सादृश्यज्ञान है । जैसे -- कोई व्यक्ति गवयपदार्थ को नहीं जानता हुआ किसी वनवासी व्यक्ति से यह सुनकर कि— गो के सदृश गवय होता है--वन में गया और वहाँ गोसदृश गवय होता है, इस वाक्यार्थ का स्मरण करता हुआ गोसदृश पिण्ड को देखता है । उसके बाद वह दृश्यमान जानवर 'गवयशब्दवाच्य है' ऐसी उपमिति उत्पन्न हो जाती है । ॥ इत्युपमानपरिच्छेदः ॥ न्यायबोधिनी उपमानं लक्षयति—उपमितिकरणमिति । उपमिति लक्षयति—संज्ञा- संज्ञीति । संज्ञा नाम पदम्, संज्ञी अर्थः, तयोः सम्बन्धः शक्तिः । तथा च पद- पदार्थसम्बन्धज्ञानमुपमितिरित्यर्थः । उपमानं नामातिदेशवाक्यार्थज्ञानम् । अतिदेशवाक्यार्थस्मरणं व्यापारः । उपमितिः फलम् । गोसदृशो गवयपद- वाच्य इत्याकारकवाक्याद् गोसादृश्यावच्छिन्नविशेष्यकगवयपदवाच्यत्वप्रका- रेण यज्ज्ञानं जायते, तदेव करणम् । ॥ इति न्यायबोधिन्यामुपमानपरिच्छेदः ॥ हिन्दी-कला उपमिति के करण को उपमान-प्रमाण कहते हैं । संज्ञा और संज्ञी के सम्बन्ध का ज्ञान ही उपमिति है । संज्ञा = पद और संज्ञी = अर्थ कहाता है । इन दोनों का अर्थात् पद और उसके अर्थ का सम्बन्ध शक्ति है । इस प्रकार पद-पदार्थ के सम्बन्ध ( शक्ति ) का ज्ञान उपमिति है । "गोसदृशो गवयपदवाच्यः" इस अतिदेशवाक्य के अर्थ का ज्ञान उपमान है । उक्त अतिदेशवाक्यार्थ का ज्ञान होने के अनन्तर उक्त वाक्यार्थ का स्मरण व्यापार है और गवयपदवाच्यत्व ( शक्ति ) ज्ञानरूप उपमिति इस प्रमाण का फल है । इस प्रकार "गोसदृशो गवयपदवाच्यः" इत्याकारक अतिदेशवाक्य से गोसा- दृश्यावच्छिन्नविशेष्यक गवयपदवाच्यत्वप्रकारक जो ज्ञान पैदा होता है, वही उपमिति- प्रमा का करण है । इति तर्कसंग्रहन्यायबोधिन्याः 'हिन्दी-कलायाम्' उपमानपरिच्छेदः ।

अथ शब्दपरिच्छेदः आप्तवाक्यं शब्दः । आप्तस्तु यथार्थवक्ता । वाक्यं पदसमूहः, यथा—गामानयेति । शक्तं पदम् । अस्मात्पदादयमर्थो बोद्धव्य इतीश्वरसङ्केतः शक्तिः । आप्तजन का वाक्य शब्द-प्रमाण है । जो यथार्थ ( सत्य ) बोले, वह आप्त है । पदों के समूह को वाक्य कहते हैं, जैसे - ‘गाम् आनय’ इत्यादि वाक्य है । क्योंकि यहाँ पर ‘गाम्’ यह सुबन्त-पद और ‘आनय’ यह तिङन्त-पद एक साथ प्रयुक्त हैं । पदार्थ का बोध कराने में जो शक्तिमान् है, उसे पद कहते हैं । “इस पद से इस अर्थ का बोध करना चाहिये” इस प्रकार का ईश्वरीय-संकेत शक्ति है । न्यायबोधिनी शब्दं लक्षयति—आप्तेति । आप्तोच्चरितत्वे सति वाक्यत्वं शब्दस्य लक्षणम् । ( प्रमाणशब्दत्वं लक्ष्यतावच्छेदकम् ) । वाक्यत्वमात्रोक्तावनाप्तो- च्चरितवाक्येऽतिव्याप्तिरत आप्तोच्चरितत्वनिवेशः तावन्मात्रोक्तौ जबगड- दशादावतिव्याप्तिरतो वाक्यत्वम् । आप्तत्वं च प्रयोगहेतुभूतयथार्थज्ञान- वत्त्वम् । तथा च प्रयोगहेतुभूतयथार्थज्ञानजन्यशब्दत्वमिति पर्यवसन्नोऽर्थः । वस्तुतस्तु पदज्ञानं करणम् । वृत्तिज्ञानसहकृतपदज्ञानजन्यपदार्थोपस्थि- हिन्दी-कला ‘आप्तोच्चरितत्वे सति वाक्यत्व’ शब्दप्रमाण का लक्षण है । यहाँ केवल शब्द लक्ष्य नहीं है, किन्तु प्रमाणशब्द लक्ष्य है और प्रमाणशब्दत्व लक्ष्यता का अवच्छेदक है । यदि केवल वाक्यत्व शब्दप्रमाण का लक्षण माना जाय तो अनाप्तजन से उच्चारित शब्द में लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । अतः आप्तोच्चरितत्व-विशेषण दिया । यदि उक्त विशेषणमात्र लक्षण माना जाय और ‘वाक्यत्व’ यह विशेष्यभाग न दिया जाय तो जबगडदश् आदि में लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । क्योंकि उक्त सूत्र पाणिनि ( आप्तपुरुष ) से उच्चरित है। किन्तु वाक्यरूप न होने से शब्दप्रमाण के अन्तर्गत नहीं है । आप्त का लक्षण है—प्रयोगहेतुभूतयथार्थज्ञानवत्त्व । अर्थात् शब्द का प्रयोग यथार्थज्ञान के बाद ही होता है । इसलिये शब्दप्रयोग का हेतु जो यथार्थज्ञान, वह जिसे हो, वह आप्त है। इस प्रकार शब्दप्रमाण का पर्यवसित लक्षण है—प्रयोगहेतुभूतयथार्थज्ञानजन्य शब्दत्व । उक्त लक्षण प्राचीन मतानुसार है । नव्यों के अनुसार तो पद करण नहीं होता किन्तु पदज्ञान ही शाब्दबोध का करण होता है । इसलिये इस मत में पदज्ञान शब्दप्रमाण है । वृत्तिज्ञानसहकृत

न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ६३ न्यायबोधिनी तिष्ठयापारः । वाक्यार्थज्ञानं शाब्दबोधः फलम् । वृत्तिर्नाम शक्तिलक्षणान्य- तररूपा । शक्तिर्नाम घटादिविशेष्यकघटादिपदजन्यबोधविषयत्वप्रकारक ईश्वरसङ्केतः । ईश्वरसङ्केतो नाम ईश्वरेच्छा. सैव शक्तिरित्यर्थः । शक्ति- निरूपकत्वमेव पदे शक्तत्वम् । विषयतासम्बन्धेन शक्त्याश्रयत्वमर्थे शक्यत्वम् । शक्यसम्बन्धो लक्षणा । सा द्विविधा गौणी शुद्धा चेति । गौणी नाम सादृश्यविशिष्टे लक्षणा । यथा सिंहो माणबक इत्यादौ सिंहपदस्य सिंहसा- दृश्यविशिष्टे लक्षणा । शुद्धा त्रिविधा—जहल्लक्षणा अजहल्लक्षणा जहद- जहल्लक्षणा चेति । लक्ष्यतावच्छेदकरूपेण लक्ष्यमात्रबोधप्रयोजिका लक्षणा जहल्लक्षणा । यथा गङ्गायां घोष इत्यत्र गङ्गापदवाच्यप्रवाहसम्बन्धस्य तीरे सत्त्वात्तादृशशक्यसम्बन्धरूपलक्षणाज्ञानाद् गङ्गापदात्तीरोपस्थितिः । लक्ष्यतावच्छेदकरूपेण लक्ष्यशक्योभयबोधप्रयोजिका लक्षणा अजहल्लक्षणा । हिन्दी-कला पदज्ञान से जनित जो पदार्थोपस्थिति, वही व्यापार है । और वाक्यार्थज्ञानरूप शाब्द- बोध इस प्रमाण का फल है । शक्ति-लक्षणा अन्यतर को वृत्ति कहते हैं । साहित्यिकों की व्यञ्जनावृत्ति न्याय में अमान्य है । “अस्मात् पदात् अयमर्थो बोद्धव्यः” यह ईश्वरीय संकेत ही शक्ति है । उसका परिष्कृत स्वरूप न्यायबोधिनीकार बताते हैं—शक्तिर्नाम इत्यादि । घटादिरूप अर्थ- विशेष्यक एवं घटादिपदजन्यबोधविषयत्वप्रकारक जो ईश्वर का संकेत, वह शक्ति है । ईश्वरेच्छा ही ईश्वरसंकेत है, और वह पद की अर्थगत शक्ति है । अर्थगत शक्ति का निरूपक होने के कारण पद को शक्त कहते हैं । एवं विषयतासम्बन्ध से ईश्वरेच्छारूप शक्ति का आश्रय होने के कारण पदार्थ को शक्य या शक्यार्थ कहते हैं । शक्य का सम्बन्ध लक्षणावृत्ति है । वह दो प्रकार की होती है, गौणी लक्षणा और शुद्धा लक्षणा । सादृश्यविशिष्ट में लक्षणा गौणी लक्षणा है । जैसे, सिंहो माण- वकः’ इत्यादिस्थल में सिंह पद की सिंहसादृश्यविशिष्ट में लक्षणा गौणी लक्षणा है । शुद्धा लक्षणा के तीन भेद हैं—जहल्लक्षणा-अजहल्लक्षणा और जहदजहल्ल- क्षणा । लक्ष्यतावच्छेदकरूप से लक्ष्यमात्र का बोध कराने वाली लक्षणा जहल्लक्षणा है । जैसे "गङ्गायां घोषः” यहाँ गङ्गपद का वाच्यार्थ जो प्रवाह, उसका सम्बन्ध तीर में होने से तादृशशक्यसम्बन्धरूप लक्षणा के ज्ञान से गङ्गापद मे तीर की उप- स्थिति होकर अनन्तर “गङ्गा तीर में घोष है” ऐसा शाब्दबोध हो जायगा । यह जह- ल्लक्षणा का उदाहरण है लक्ष्यतावच्छेदकरूप से लक्ष्य और शक्य उभय का बोध कराने वाली लक्षणा

६४ तर्कसंग्रहः [ शब्दपरिच्छेदः आकाङ्क्षा योग्यता सन्निधिश्च वाक्यार्थज्ञाने हेतुः । पदस्य पदान्तरव्यतिरेकप्रयुक्तान्वयाननुभावकत्वमाकाङ्क्षा । आकाङ्क्षा-योग्यता और सन्निधि ये तीनों ही वाक्यार्थज्ञान के प्रति हेतु हैं । एक पद का दूसरे पद के अभाव के कारण अन्वयबोध न कराना आकाङ्क्षा है । न्यायबोधिनी यथा—काकेभ्यो दधि रक्ष्यतामित्यत्र काकपदस्य दध्युपघातके लक्षणा । लक्ष्यतावच्छेदकं दध्युपघातकत्वम्, तेन रूपेण दध्युपघातकानां सर्वेषां काकबिडालकुक्कुटसारमेयादीनां शक्यलक्ष्याणां बोधात् । जहदजहल्ल- क्षणा—यथा तत्त्वमसीत्यत्र सर्वज्ञत्वकिञ्चिज्ज्ञत्वपरित्यागेन व्यक्तिमात्रबोध- नात् वेदान्तिनां मते । सा च शक्यतावच्छेदकपरित्यागेन व्यक्तिमात्रबोध- प्रयोजिका । आकाङ्क्षां लक्षयति—पदस्येति । अव्यवहितोत्तरत्वादिसम्बन्धेन यत्पदे यत्पदप्रकारकज्ञानव्यतिरेकप्रयुक्तो यादृशशाब्दबोधाभावस्तादृशशाब्दबोधे तत्पदे तत्पदवत्त्वमाकाङ्क्षा । यथा घटमित्यादिस्थलेऽव्यवहितोत्तरत्वादि- हिन्दी-कला अजहल्लक्षणा है । जैसे, "काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्" यहाँ पर काकपद की दध्युपघा- तक में लक्षणा है । यहाँ लक्ष्यतावच्छेदक दध्युपघातकत्व है । अतः दध्युपघातकत्व- रूप से जितने भी दध्युपघातक हैं; काक सहित बिडाल-कुक्कुट-कुत्ता आदि, इन सभी शक्य एवं लक्ष्यों का बोध हो जाता है । यह अजहल्लक्षणा है जहदजहल्लक्षणा वह है, जहाँ शक्यार्थ का ही कुछ अंश छोड़ दिया जाय और कुछ अंश न छोड़ा जाय, अर्थात् गृहीत कर लिया जाय । जैसे, 'तत्त्वमसि' इस वेदान्त- वाक्य में 'तत्' पद का शक्य अर्थ है—'सर्वज्ञत्वविशिष्ट आत्मा' तथा 'त्वम्' पद का शक्य अर्थ है—'किञ्चिज्ज्ञत्वविशिष्ट आत्मा' । किन्तु जहदजहल्लक्षणावृत्ति से सर्वज्ञत्व एवं किञ्चिज्ज्ञत्वधर्म का परित्याग कर आत्ममात्र का बोध होता है और जीव और ब्रह्म का अभेदबोध संपन्न हो जाता है । शक्यतावच्छेदक का परित्याग कर व्यक्तिमात्र के बोध की प्रयोजिका जहदजहल्लक्षणा है, यह तात्पर्य हुआ । "पदस्य पदान्तरव्यतिरेकप्रयुक्तान्वयाननुभावकत्वम् आकाङ्क्षा" यह मूलोक्त आकाङ्क्षालक्षण है । अर्थात् एक पद दूसरे पद के बिना अन्वयबोध न करा सके, यही उन पदों में परस्पर आकाङ्क्षा है । इसे न्यायबोधिनीकार नव्यन्याय की भाषा में परिष्कृत करते हैं—अव्यवहितोत्तरत्वसम्बन्ध से जिस पद में यत्पदप्रकारक ज्ञान न होने के कारण यादृशशाब्दबोध नहीं हो पाता, तादृशशाब्दबोध के प्रति उस पद में ऽव्यवहितोत्तरत्वसम्बन्ध से तत्पद का वैशिष्ट्य आकाङ्क्षा है ।

न्यायबोधिनी-कलासंबलितः ६५ अर्थाबाधो योग्यता । पदानामविलम्बेनोच्चारणं सन्निधिः । तथा च आकाङ्क्षाविरहितं वाक्यमप्रमाणम् । यथा—गौरश्वः पुरुषो हस्तीति न प्रमाणम्—आकाङ्क्षाविरहात् । वह्निना सिञ्च- तीति न प्रमाणम्—योग्यताविरहात् । प्रहरे प्रहरेऽसहोच्चारितानि गामानयेत्यादिपदानि न प्रमाणम्—सान्निध्याभावात् । वाक्यार्थ का बाधित न होना योग्यता है। बिना विलम्ब किये पदों का उच्चारण करना सन्निधि है । इसलिये आकाङ्क्षारहित वाक्य अप्रमाण है। जैसे—"गौः अश्वः पुरुषो हस्ती" यह वाक्य अप्रमाण है, क्योंकि यहाँ पदों में परस्पर आकाङ्क्षा नहीं है । "वह्निना सिञ्चति" यह वाक्य प्रमाण नहीं है, क्योंकि वह्निद्वारा सेचन क्रिया के बाधित होने से वहाँ योग्यता नहीं है । पहर-पहर पर बोले गये, इसीलिये एक साथ नहीं उच्चारित हुए "गाम्—आनय" इत्यादि पद प्रमाण नहीं हैं, क्योंकि इन पदों में सान्निध्य का अभाव है । न्यायबोधिनी सम्बन्धेन अम्-पदं घटपदवदित्याकारक 'अम्'पदविशेष्यकघटपदप्रकारकज्ञान-' सत्त्वे घटीयं कर्मत्वमिति बोधो जायते । अम्-घट इति विपरीतोच्चारणे तु तादृशज्ञानाभावात् तादृशशाब्दबोधो न जायतेऽतस्तादृशाकाङ्क्षाज्ञानं शाब्दबोधे कारणम् । अर्थाबाध इति । बाधाभावो योग्यतेत्यर्थः । अग्निना सिञ्चतीत्यत्र सेककरणत्वस्य जलादिधर्मस्य वह्नौ बाधनिश्चयसत्त्वान्न तादृशवाक्याच्छा- हिन्दी-कला जैसे 'घटम्' इत्यादि स्थल में अव्यवहितोत्तरत्वसम्बन्ध से 'अम्' यह विभक्तिपद 'घट' इस नामपद से विशिष्ट होने के कारण अम्-पदविशेष्यक घटपदप्रकारक ज्ञान होने से 'घटीयं कर्मत्वम्' अर्थात् 'घटगत कर्मता' ऐसा बोध हो जाता है । किन्तु इसके विपरीत 'अम् घट' ऐसा उच्चारण करने पर घटपद के अव्यवहित उत्तर में अम्-पद का ज्ञान नहीं होने से 'घटीयं कर्मत्वम्' यह शाब्दबोध नहीं उत्पन्न होता है । इसलिये उक्त प्रकार का आकाङ्क्षा-ज्ञान शाब्दबोध के प्रति कारण है । विशेष स्पष्टीकरण 'संस्कृत-कला' में द्रष्टव्य है । वाक्यार्थज्ञान के प्रति दूसरा कारण योग्यताज्ञान है । अर्थ में बाध का अभाव योग्यता है । जहाँ अर्थ बाधित होगा, वहाँ शाब्दबोध नहीं होगा । जैसे, 'अग्निना ५

६६ तर्कसंग्रहः [ शब्दपरिच्छेदः वाक्यं द्विविधम्—वैदिकं लौकिकं च । वैदिकमीश्वरोक्तत्वात् सर्वमेव प्रमाणम् । लौकिकं त्वाप्तोक्तं प्रमाणम् । अन्यदप्रमाणम् । वाक्यार्थज्ञानं शाब्दज्ञानम् । तत्करणं तु शब्दः । वाक्य दो प्रकार के होते हैं—वैदिक-वाक्य और लौकिक-वाक्य । वैदिक-वाक्य ईश्वरोक्त होने के कारण सभी प्रमाण है । किन्तु लौकिक-वाक्य आप्तजनद्वारा कहा हुआ ही प्रमाण है, शेष ( अनाप्तजनद्वारा कथित ) वाक्य अप्रमाण है । वाक्य के अर्थ का बोध शाब्दज्ञान या शाब्दबोध कहाता है । और शाब्दज्ञान का करण ( असाधारण कारण ) शब्द प्रमाण है । ॥ इति शब्दपरिच्छेदः ॥ न्यायबोधिनी ब्दबोधः । सन्निधिं निरूपयति—पदानामिति । असहोच्चारितानि = विल- म्बोच्चारितानि । वैदिकमिति । वेदवाक्यमित्यर्थः । इदमुपलक्षणम् । वेदमूलस्मृत्यादी- न्यपि ग्राह्याणि । लौकिकं त्विति । वेदवाक्यभिन्नमित्यर्थः । ( आप्तत्वं च प्रयोगहेतुभूतयथार्थज्ञानवत्त्वम् ) । ॥ इति न्यायबोधिन्यां शब्दपरिच्छेदः ॥ हिन्दी-कला सिञ्चति' यहां पर सेक-करणत्व का अग्नि में बाधनिश्चय है, क्योंकि वह जल का धर्म है, इसलिये उक्तवाक्य से शाब्दबोध नहीं हो सकेगा । प्रमाणभूत आप्तवाक्य दो प्रकार का है—वैदिक और लौकिक । वैदिकवाक्य का अर्थ है—वेदवाक्य । किन्तु 'वैदिक' यह कहना उपलक्षण मात्र है, इससे वेद- मूलक स्मृति-पुराणादिवाक्य भी प्रमाण के अन्तर्गत हैं । वेदवाक्य तो ईश्वरोक्त होने के कारण सब प्रमाण हैं । किन्तु लौकिक वाक्य वे ही प्रमाण हैं, जो आप्तजन द्वारा उक्त हैं । आप्त वह है, जो शब्दप्रयोग के लिए अपेक्षित यथार्थज्ञान वाला हो । इति तर्कसंग्रहन्यायबोधिन्याः 'हिन्दी-कलायाम्' शब्दपरिच्छेदः । ••••०••••

अथावशिष्टपरिच्छेदः अयथार्थानुभवस्त्रिविधः—संशय-विपर्यय-तर्कभेदात् । एकस्मिन्धर्मिणि विरुद्धनानाधर्मवैशिष्ट्यावगाहिज्ञानं संशयः । यथा—स्थाणुर्वा पुरुषो वेति । मिथ्याज्ञानं विपर्ययः । यथा—शुक्तौ 'रजतम्' इति । अयथार्थानुभव तीन प्रकार का होता है—संशय-विपर्यय और तर्क के भेद से । एक धर्मी में विरुद्ध नानाधर्म के वैशिष्ट्य (सम्बन्ध) का अवगाहन करने वाला ज्ञान संशय है । जैसे—"यह स्थाणु है या पुरुष है" इस प्रकार का अनिश्च- यात्मक ज्ञान संशय कहाता है । मिथ्याज्ञान को विपर्यय कहते हैं । जैसे—शुक्ति में हुआ रजत का ज्ञान मिथ्या- ज्ञान (भ्रमज्ञान) होने से विपर्यय है । न्यायबोधिनी यथार्थानुभवं निरूप्यायथार्थानुभवं विभजते—संशयेत्यादिना । एकेति । एकधर्मावच्छिन्नविशेष्यतानिरूपितभावाभावप्रकारकज्ञानं संशय इत्यर्थः । भावद्वयकोटिकसंशयाप्रसिद्धेः (पुरुषो वा) स्थाणुर्वेत्यत्र स्थाणुत्वस्थाणुत्वाभावपुरुषत्वपुरुषत्वाभावकोटिक एव संशय इत्यर्थः । मिथ्याज्ञानमिति । अयथार्थज्ञानमित्यर्थः । विपर्ययो नाम भ्रमः । हिन्दी-कला अब तक यथार्थानुभव का निरूपण हुआ । बुद्धि के दूसरे भेद अयथार्थानुभव का विभाग मूलकार करते हैं—अयथार्थानुभव तीन प्रकार का होता है—संशय-विपर्यय और तर्क के भेद से । मूलोक्त संशयलक्षण का परिष्कृत स्वरूप यों है—एकधर्मा- वच्छिन्ना जो विशेष्यता, उससे निरूपिता जो भावाभावनिष्ठा प्रकारता, तादृश- प्रकारताशाली जो ज्ञान, वह संशय है । जैसे, तमो द्रव्यं न वा' इस संशय में एक तम विशेष्य है, तथा द्रव्यत्व और द्रव्यत्वाभाव ये दो प्रकार हैं । इसलिये एक ही विशेष्य में भावाभावरूप दो विशेषणों का ज्ञान होने से यह संशय है । इस प्रकार संशय में एक कोटि भाव की होती है और दूसरी कोटि अभाव की । अतः भावद्वयकोटिक संशय के अप्रसिद्ध होने से "स्थाणुर्वा पुरुषो वा" इस स्थल में स्थाणुत्व और पुरुषत्वकोटिक संशय न होकर स्थाणुत्व-स्थाणुत्वाभाव एवं पुरुषत्व- पुरुषत्वाभावरूप भावाभावकोटिक ही संशय होता है, ऐसा अभिप्राय है । विपर्यय का अर्थ है—मिथ्याज्ञान अर्थात् भ्रम ।