भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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५८ तर्कसंग्रहः [ अनुमानपरिच्छेदः स्वरूपासिद्धो यथा-शब्दो गुणश्चाक्षुषत्वात्। अत्र चाक्षुषत्वं शब्दे नास्ति, शब्दस्य श्रावणत्वात्। सोपाधिको हेतुर्व्याप्यत्वासिद्धः। साध्यव्यापकत्वे सति साधना- व्यापकत्वमुपाधिः। साध्यसमानाधिकरणात्यन्ताभावाप्रतियोगित्वं साध्यव्यापकत्वम्। साधनवनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वं साधना- स्वरूपासिद्ध जैसे—"शब्दो गुणश्चाक्षुषत्वात्" यहाँ चाक्षुषत्व-हेतु शब्दरूप पक्ष में नहीं है। क्योंकि शब्द श्रावण होता है, चाक्षुष नहीं होता। उपाधियुक्त हेतु व्याप्यत्वासिद्ध है। जो साध्य का व्यापक होते हुए साधन का अव्यापक हो, वह उपाधि कहाता है। साध्यव्यापकत्व का अर्थ है—साध्यसमाना- धिकरण जो अत्यन्ताभाव, उसका अप्रतियोगी होना। एवं, साधन (हेतु) के अधिकरण में रहने वाला जो अत्यन्ताभाव, उसका प्रतियोगी होना, साधना- व्यापकत्व है। न्यायबोधिनी स्वरूपासिद्ध इति। स्वरूपासिद्धिर्नाम पक्षे हेत्वभावः। तथा च हेत्व- भावविशिष्टपक्षज्ञानात् पक्षविशेष्यकहेतुप्रकारकपरामर्शानुपपत्त्या परामर्श- प्रतिबन्धः फलम्। व्याप्यत्वासिद्ध इति। प्रकृते धूमव्यापकत्वमार्द्रेन्धनसंयोगे गृहीतं चेद् धूमे आर्देन्धनसंयोगव्याप्यत्वं गृहीतम्। एवं वह्ने र्व्यापकत्वमार्द्रेन्धनसंयोगे गृहीतं चेद् वह्नौ तदव्याप्यत्वं गृहीतम्। तदेव व्यभिचरितत्वम्। तथा चोपा- धिव्यभिचारित्वं साधने गृहीतं चेदुपाधिभूतार्द्रेन्धनसंयोगव्याप्यधूमव्यभि- चारित्वं गृहीतमेव। अनुमानप्रकारश्च—पूर्वानुमानहेतुं पक्षीकृत्य वह्निर्धूमव्यभिचारी, धूम- व्यापकार्द्रेन्धनसंयोगव्यभिचरितत्वात्, घटत्वादिवत्, यो यत्साध्यव्यापकव्य- हिन्दी-कला पक्ष में हेतु का अभाव होना स्वरूपासिद्धि है। स्वरूपासिद्धि की स्थिति में हेत्व- भावविशिष्टपक्ष का ज्ञान होने से पक्षविशेष्यक हेतुप्रकारक परामर्श नहीं उत्पन्न हो सकेगा। अतः परामर्श का प्रतिबन्ध ही इसका फल है। उपाधिसहित हेतु व्याप्यत्वासिद्ध होता है। साध्य का व्यापक होता हुआ जो साधन का अव्यापक हो, वह उपाधि है। साध्यव्यापकत्व और साधनाव्यापकत्व का स्वरूप और उदाहरण मूल में बता दिया गया है। न्यायबोधिनीकार उपाधि का प्रयोजन दर्शाते हैं, जैसा कि न्यायसिद्धान्तमुक्तावली में कहा है—"व्यभिचारस्यानु- मानमुपाधेस्तु प्रयोजनम्"। 'धूमवान् वह्नेः' यहाँ वह्नि-हेतु सोपाधिक होने से व्याप्यत्वासिद्ध है। यहाँ आर्देन्धनसंयोग उपाधि है और आर्देन्धनसंयोग में धूम (साध्य) की व्यापकता गृहीत

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