भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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न्यायबोधिनी-कलासंबलितः ५७ असिद्धस्त्रिविधः — आश्रयासिद्धः स्वरूपासिद्धो व्याप्यत्वा- सिद्धश्चेति । आश्रयासिद्धो यथा-गगनारविन्दं सुरभि, अरविन्दत्वात्, सरो- जारविन्दवत् । अत्र गगनारविन्दमाश्रयः, स च नास्त्येव । असिद्धनामक हेत्वाभास तीन प्रकार का होता है—आश्रयासिद्ध-स्वरूपासिद्ध और व्याप्यत्वासिद्ध । इसमें आश्रयासिद्ध जैसे—'गगनारविन्दं सुरभि, अरविन्दत्वात्, सरोजारविन्दवत्' इस अनुमान में गगनारविन्द आश्रय है, और वह है ही नहीं । अतः यहाँ का हेतु आश्रयासिद्ध हेत्वाभास है । न्यायबोधिनी साध्याभावव्याप्यप्रतिहेतुमतपक्षस्सत्प्रतिपक्ष इति यावत् । साध्याभाव- साधकहेतुः साध्यसाधकत्वेनोपन्यस्त इत्यसामर्थ्यसूचनमपि । आश्रयासिद्ध इति । आश्रयासिद्धिर्नाम पक्षतावच्छेदकविशिष्टपक्षा- प्रसिद्धिः । यथेति । अत्रारविन्दे गगनीयत्वाभावे निश्चिते गगनीयत्ववि- शिष्टारविन्दे सौरभ्यानुमितिप्रतिबन्धः फलम् । हिन्दी-कला मूलोक्त सत्प्रतिपक्षलक्षण का निष्कर्ष बताते हैं—"साध्याभावव्याप्यप्रतिहेतुमत- पक्षः सत्प्रतिपक्षः" इति । अर्थात् 'साध्यव्याप्यहेतुमान् पक्षः' ऐसा वादी द्वारा साध्य- सिद्धि के अनुकूल परामर्श उपस्थापित करने के अनन्तर जब प्रतिवादी द्वारा "साध्या- भावव्याप्य प्रतिहेतुमान् पक्षः" ऐसा साध्याभावसिद्धि के अनुकूल परामर्श उपस्थापित कर दिया जाय तो, वहाँ सत्प्रतिपक्ष हेत्वाभास हो जाता है । और दोनों ही परामर्श एक दूसरे के विरोधी होने के कारण दोनों ही अनुमिति प्रतिबन्धित हो जाती है । दोनों ही हेतु सत्प्रतिपक्षित हो जाते हैं । सत्प्रतिपक्ष में साध्याभावसाधक दूसरा हेतु होता है किन्तु विरुद्ध में साध्याभावसाधक हेतु को ही वादी ने अज्ञानतावश साध्यसाध- कत्वेन उपन्यस्त कर दिया, इससे उसकी असमर्थता सूचित होती है, यह भी सत्प्रति- पक्ष और विरुद्ध में अन्तर है । पक्षतावच्छेदकधर्म से विशिष्ट पक्ष की अप्रसिद्धि आश्रयासिद्धि है । जैसे, "गगनारविन्दं सुरभि अरविन्दत्वात्" यहाँ अरविन्द में गगनीयत्व का अभाव निश्चित होने से गगनीयत्वविशिष्ट अरविन्द में सौरभ्य की अनुमिति बाधित हो जाती है । यही आश्रयासिद्धिज्ञान का फल है ।