भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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५६ तर्कसंग्रहः [ अनुमानपरिच्छेदः घटवदिति । ( अत्र ) कृतकत्वं हि नित्यत्वाभावेनाऽनित्यत्वेन व्याप्तम् । साध्याभावसाधकं हेत्वन्तरं यस्य, स सत्प्रतिपक्षः । यथा- शब्दो नित्यः श्रावणत्वाच्छब्दत्ववत्, शब्दोऽनित्यः कार्यत्वाद् घटवत् । हेत्वाभास है । जैसे—"शब्दो नित्यः कृतकत्वात्" इस अनुमान में कृतकत्व-हेतु विरुद्ध है । क्योंकि कृतकत्व-हेतु नित्यत्वाभावरूप अनित्य से व्याप्त है । जिस हेतु के साध्य का अभाव सिद्ध करने वाला हेत्वन्तर ( दूसरा हेतु ) विद्य- मान हो, वह सत्प्रतिपक्षनामक हेत्वाभास है । जैसे—"शब्दो नित्यः श्रावणत्वात् शब्दत्ववत्" इस अनुमान में श्रावणत्व-हेतु नित्यत्व का साधक है । किन्तु इसके विप- रीत "शब्दोऽनित्यः कार्यत्वात् घटवत्" इस अनुमान में प्रयुक्त कार्यत्वरूप हेत्वन्तर नित्यत्व-साध्य का अभावरूप अनित्य सिद्ध करने वाला भी विद्यमान है । इसलिये यहाँ के दोनों ही अनुमानों के दोनों ही हेतु परस्पर के प्रति सत्प्रतिपक्षत हो जाते हैं और दोनों ही अनुमिति रुक जाती है । न्यायबोधिनी विरुद्धं लक्षयति—साध्याभावव्याप्त इति । साध्याभावव्याप्तिः = साध्याभावनिरूपितव्यतिरेकव्याप्तिः=साध्यव्यापकीभूताभावप्रतियोगित्वम् । तथा च पक्षविशेष्यकसाध्याभावव्याप्यहेतुप्रकारकज्ञानात् पक्षविशेष्यकसाध्य- प्रकारकानुमितिप्रतिबन्धः फलम् । एवं सत्प्रतिपक्षेऽपि । विरुद्धसत्प्रतिपक्ष- योर्विशेषस्तु विरुद्धहेतोरेकत्वेन सत्प्रतिपक्षहेतोर्द्वित्वेन च ज्ञातव्यः । हिन्दी-कला साध्याभाव का व्याप्त हेतु विरुद्ध है । साध्याभाव की व्याप्ति का अर्थ है— साध्याभावनिरूपित व्यतिरेकव्याप्ति । अर्थात् साध्य का व्यापकीभूत जो अभाव, उसका प्रतियोगी होना साध्याभाव की व्याप्ति है । जैसे—"शब्दो नित्यः कृतकत्वात्" यहाँ कृतकत्व-हेतु नित्यत्व-साध्य का व्यापकीभूत कृतकत्वाभाव का प्रतियोगी है, इसलिए कृतकत्व-हेतु नित्यत्वसाध्य के प्रति विरुद्ध है । पक्ष में साध्याभावव्याप्यहेतुप्रकारक ज्ञान होने पर पक्षविशेष्यक साध्य- प्रकारक अनुमति का प्रतिबन्ध हो जाता है । यही इस हेत्वाभासज्ञान का फल है । सत्प्रतिपक्षस्थल में भी अनुमिति का प्रतिबन्ध ही फल है । फिर भी विरुद्ध और सत्प्रतिपक्ष में यह अन्तर है कि विरुद्ध में एक ही हेतु का प्रयोग होता है, और सत्प्रति- पक्ष में दो हेतुओं का प्रयोग होता है ।