भारतकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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पृष्ठ 78

न्यायबोधिनी-कलासंवलितः ५९ व्यापकत्वम् । पर्वतो धूमवान् वह्निमत्त्वादित्यत्रार्द्रेन्धनसंयोग उपाधिः । यत्र धूमस्तत्रार्द्रेन्धनसंयोग इति साध्यव्यापकता । यत्र वह्निस्तत्रार्द्रेन्धनसंयोगो नास्ति, अयोगोलके आर्द्रन्धनसंयोगाभावा- दिति साधनाव्यापकता । एवं साध्यव्यापकत्वे सति साधनाव्याप- कत्वादार्द्रेन्धनसंयोग उपाधिः । सोपाधिकत्वाद्वह्निमत्त्वं व्याप्य- त्वासिद्धम् । जैसे— 'पर्वतो धूमवान् वह्निमत्त्वात्" इस अनुमान में आर्द्रन्धनसंयोग उपाधि है । क्योंकि यहां धूम साध्य है, और जहां-जहां धूम है, वहां-वहां आर्द्रन्धन-संयोग रहता है, इसलिए आर्द्रन्धनसंयोग धूमरूप साध्य का व्यापक हुआ । किन्तु यहां वह्नि साधन ( हेतु ) है, और वह वह्निरूप साधन जहाँ-जहाँ रहता है, वहां-वहां आर्द्रन्धन- संयोग नहीं रहता है, जैसे तपे हुए अयोगोलक ( लोहा ) में वह्नि तो है, परन्तु आर्द्रन्धनसंयोग नहीं है । इसलिये वह्निरूप साधन का आर्द्रन्धनसंयोग अव्यापक हुआ। इस प्रकार साध्य का व्यापक होने से और साधन का अव्यापक होने से उक्त अनुमान में आर्द्रन्धनसंयोग उपाधि है । इसीलिये उपाधियुक्त होने के कारण यहाँ वह्निमत्त्व हेतु व्याप्यत्वासिद्धनामक असिद्ध हेत्वाभास है । न्यायबोधिनी भिचारी, स सर्वोऽपि साध्यव्यभिचारीति रीत्या बोध्यः । एवंप्रकारेण प्रकृतानुमानहेतुभूते पक्षे साध्यव्यभिचारोत्थापकतया दूषकत्वमुपाधेः हिन्दी-कला होने पर धूम में आर्द्रन्धनसंयोग की व्यापकता गृहीत होगी । इसी प्रकार आर्द्रन्धन- संयोग में वह्नि ( साधन ) की अव्यापकता यदि गृहीत हुई तो वह्नि में आर्द्रन्धनसंयोग की अव्याप्यता गृहीत हो जायगी। यही व्यभिचार है। अर्थात् आर्द्रन्धनसंयोगरूप उपाधि का व्यभिचारित्व जब वह्नि-साधन में गृहीत हो गया तो उपाधिव्याप्य जो धूम, उसका व्यभिचारित्व वह्नि-हेतु में सुतरां गृहीत हो जायगा । क्योंकि जो व्यापक का व्यभिचारी होगा, वह व्याप्य का व्यभिचारी अवश्य होगा। इस प्रकार हेतु में व्यभिचार का अनुमान करा देना उपाधि का प्रयोजन सिद्ध हुआ । अनुमान का प्रकार यों होगा—वह्नि धूम का व्यभिचारी है, धूमव्यापकार्द्रन्धन- संयोग का व्यभिचारी होने से, घटत्वादि के समान। जो जिस साध्य के व्यापक का व्यभिचारी होता है, वह उस साध्य का भी व्यभिचारी होता है। इस प्रकार वादीद्वारा प्रयुक्त हेतु को पक्ष बनाकर उसमें साध्य-व्यभिचार के उद्भावन द्वारा वादी के हेतु को दोषयुक्त सिद्ध कर देना उपाधि का फल है। एवं वह्नि-हेतु में धूमाभाववद-